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चौक पूरने से लेकर थाली बजाकर विदाई तक, छत्तीसगढ़ में इस तरह जीवंत होती है पितृ पक्ष की लोक परंपराछत्तीसगढ़
27 सित॰ 2026, 12:20 pm (1 मिनट पहले)· 0

चौक पूरने से लेकर थाली बजाकर विदाई तक, छत्तीसगढ़ में इस तरह जीवंत होती है पितृ पक्ष की लोक परंपरा

छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि लोक संस्कृति और पारिवारिक जुड़ाव का उत्सव है, जहां तिथि के अनुसार पितरों का स्वागत और पारंपरिक सात्विक भोजन से श्राद्ध किया जाता है।

छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर पितृ पक्ष केवल कर्मकांड और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। बिलासपुर और राज्य के अन्य हिस्सों में इसे एक ऐसे महापर्व के रूप में मनाया जाता है जो हमारे पुरखों के प्रति आदर, पारिवारिक जुड़ाव और प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने का माध्यम बनता है। इन पावन दिनों में यहां के हिंदू परिवार अपने उन प्रियजनों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं जो अब इस संसार में नहीं हैं। वे अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि के अनुसार उन्हें अपने घरों में आमंत्रित करते हैं, उनके मनपसंद व्यंजनों का भोग लगाते हैं और पूरे आदर-सत्कार के साथ उन्हें विदा करते हैं। बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव का मानना है कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। उनके अनुसार, "यह हमारे खान-पान, रहन-सहन और सामाजिक ताने-बाने का एक बेहद खूबसूरत हिस्सा है।" इस दौरान छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के कई रंग देखने को मिलते हैं जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हैं।

तिथि के अनुसार निमंत्रण और स्वागत की रस्म

श्राद्ध पक्ष के दौरान प्रत्येक दिवंगत पूर्वज की पुण्यतिथि का विशेष ध्यान रखा जाता है। छत्तीसगढ़ में यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज इन दिनों धरती पर आते हैं, इसलिए उनका स्वागत बहुत ही भव्य और आत्मीय तरीके से होना चाहिए। जिस दिन किसी पूर्वज की तिथि होती है, उस दिन सुबह-सवेरे ही घर की साफ-सफाई की जाती है। घर के मंदिर और मुख्य द्वार पर विशेष चौक पूरने की परंपरा है। कई घरों में इस अवसर पर दीवारों और चौखट को चूने से लीपकर पवित्र किया जाता है, तो कई परिवारों में शुद्ध आटे से सुंदर चौक बनाए जाते हैं। यह चौक केवल एक सजावट नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि परिवार अपने पूर्वजों के आगमन के लिए पूरी तरह तैयार है और उनके स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा है। सुबह की नियमित पूजा के बाद घर के द्वार को खुला रखा जाता है ताकि पितर आसानी से प्रवेश कर सकें।

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चावल, तोरई और बोबरा: श्राद्ध का विशेष सात्विक भोजन

पितृ पक्ष में भोजन तैयार करने के कड़े नियम होते हैं और इस दौरान पूरी तरह सात्विक भोजन ही बनाया जाता है। बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव ने इस परंपरा के भोजन के बारे में विस्तार से बताया है। चूंकि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और यहां चावल मुख्य खाद्य पदार्थ है, इसलिए श्राद्ध के भोजन में चावल से बने व्यंजनों का बहुत बड़ा स्थान होता है। इस मौसम में मिलने वाली हरी सब्जियों, विशेषकर तोरई को बेहद सादे ढंग से पकाया जाता है। तोरई की सब्जी को बनाते समय उसमें किसी भी प्रकार का तड़का या छौंक नहीं लगाया जाता और मसालों का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है। इसके साथ ही एक बिना नमक की सब्जी भी विशेष रूप से तैयार की जाती है। मीठे पकवानों में आटे और गुड़ के मेल से बनने वाला 'बोबरा' छत्तीसगढ़ का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक व्यंजन है, जिसे पितरों को अर्पित करना बेहद शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त, परिवार के दिवंगत सदस्यों को उनके जीवनकाल में जो भी भोजन सबसे अधिक प्रिय था, उसे भी अत्यधिक श्रद्धा भाव के साथ तैयार किया जाता है और भोग लगाया जाता है।

मातृ नवमी पर पूर्वज माताओं का विशेष स्मरण

पितृ पक्ष के पंद्रह दिनों में 'नवमी तिथि' को अत्यधिक महत्वपूर्ण और संवेदनशील माना गया है। इस दिन को विशेष रूप से मातृ नवमी के रूप में मनाया जाता है, जो परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों को समर्पित होता है। चाहे वह माताएं हों, दादियां हों या परिवार की अन्य महिला सदस्य, जिन्होंने हमेशा परिवार को संभाल कर रखा, उन्हें इस दिन बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। उनकी तिथि और परिवार की स्थापित मान्यताओं के अनुसार उन्हें आमंत्रित किया जाता है। महिलाएं सुबह से उठकर उनके पसंदीदा पकवान तैयार करती हैं। पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और उन्हें भोजन अर्पित करने के बाद, परिवार के सभी सदस्य मिलकर उस भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह खूबसूरत परंपरा न केवल हमारी पूर्वज महिलाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी दादी-नानी और माताओं के योगदान को याद रखने की सीख देती है।

प्रकृति के प्रति संवेदना: कौवों और पक्षियों को भोजन-पानी

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति केवल मनुष्यों के बीच के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार जीव-जंतुओं और प्रकृति तक है। पितृ पक्ष के दौरान पक्षियों, विशेषकर कौवों को भोजन और जल अर्पित करने की एक बहुत पुरानी परंपरा है। हिंदू मान्यताओं में कौवे को यम का दूत और पितरों का रूप माना जाता है। इसलिए, घर में भोजन करने से पहले या पूजा के तुरंत बाद, पत्तलों और दोनों में भोजन का एक हिस्सा निकालकर घर की छत या किसी ऊंचे स्थान पर रख दिया जाता है। इसके साथ ही उनके पीने के लिए साफ पानी भी रखा जाता है। यह अनुष्ठान इस बात को दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ के लोगों का प्रकृति के प्रति कितना गहरा लगाव है। वे केवल अपने परिवार का पेट नहीं भरते, बल्कि अपने आस-पास के मूक प्राणियों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाते हैं।

नदी-तालाबों पर पुरोहित के साथ तर्पण

श्राद्ध की पूरी प्रक्रिया में जल स्रोतों जैसे नदियों और तालाबों का एक अत्यंत पवित्र स्थान है। छत्तीसगढ़ में जल को जीवन और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। तर्पण करने के लिए परिवार के पुरुष सदस्य अपने पुरोहित या पंडित के साथ सुबह-सुबह किसी स्थानीय नदी या तालाब के घाट पर एकत्रित होते हैं। वहां पूजा की सामग्री जैसे जौ, अक्षत (चावल) और सफेद फूलों को जल में मिलाकर पितरों को अर्घ्य दिया जाता है। इस अनुष्ठान को करने वाले परिवार के वरिष्ठ सदस्य को अनिवार्य रूप से सफेद सूती वस्त्र धारण करने होते हैं, जो सादगी और शोक के प्रतीक हैं। पंडित के मंत्रोच्चार के बीच बहते जल या जलाशय में अंजलि से जल अर्पित कर पूर्वजों की आत्मा की शांति की कामना की जाती है। यह दृश्य बेहद शांत और आध्यात्मिक होता है, जहां पूरा परिवार अपने पुरखों को नमन करता है।

गोत्र और कुनबे के लोगों को ही आमंत्रण: पारिवारिक एकता

छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष के दौरान भोजन कराने की सामाजिक व्यवस्था भी बहुत अनोखी है। आम दिनों के भंडारों या भोज की तरह इसमें पूरे मोहल्ले या बाहरी लोगों को आमंत्रित नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, इस दिन केवल अपने सगे-संबंधियों, रक्त संबंधों और एक ही गोत्र से जुड़े परिवार के सदस्यों को ही आमंत्रित किया जाता है। जब किसी पूर्वज की पुण्यतिथि आती है, तो उनके अपने कुनबे और परिवार के लोग एक छत के नीचे जमा होते हैं। वे सब मिलकर श्राद्ध का भोजन करते हैं। यह नियम केवल धार्मिक कारणों से नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा सामाजिक उद्देश्य भी है। इससे रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में अलग-थलग हो चुके परिवार के सदस्य एक साथ आते हैं, दुख-सुख साझा करते हैं और उनके बीच आपसी प्रेम व सामंजस्य मजबूत होता है।

थाली और घंटी बजाकर पितरों की विदाई

पितृ पक्ष के अंतिम दिन, जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है, पूर्वजों की विदाई की एक अत्यंत अनूठी और पारंपरिक रस्म निभाई जाती है। इस दिन घर में फिर से विशेष पकवान बनाए जाते हैं और सुबह की धूप-दीप के बाद पितरों को अंतिम भोग लगाया जाता है। इसके बाद शुरू होती है विसर्जन की यात्रा। घर के सदस्य हाथों में पीतल की थाली पीटते हुए और घंटियां बजाते हुए घर से बाहर निकलते हैं और नदी या तालाब की ओर बढ़ते हैं। थाली और घंटी की यह ध्वनि इस बात का संकेत होती है कि पितर अब वापस अपने लोक की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। जलाशय के किनारे पहुंचकर एक बार फिर संक्षिप्त पूजा-पाठ किया जाता है और पूजा में उपयोग की गई फूल-पत्ती तथा अन्य सामग्रियों को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। इस विदाई के साथ ही पितृ पक्ष का समापन होता है।

आस्था और लोक संस्कृति का अनूठा संगम

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन और संस्कृति में रची-बसी यह परंपरा सदियों से अपनी पहचान बनाए हुए है। बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव का कहना है कि यह केवल पारलौकिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की जड़ों को मजबूत करने वाली व्यवस्था है। इसमें एक ओर जहां धर्म और अध्यात्म का समावेश है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय व्यंजनों का स्वाद, पर्यावरण के प्रति दया भाव और बिखरते हुए परिवारों को जोड़ने का अद्भुत प्रयास भी दिखाई देता है। अपने पूर्वजों को उनकी तिथि पर आदर सहित याद करना, उनकी पसंद का सादा और स्वास्थ्यवर्धक भोजन बनाना, और पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधना छत्तीसगढ़ की इसी महान लोक संस्कृति की पहचान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है।

सवाल-जवाब

छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष के भोजन में किस सब्जी का विशेष स्थान है?
पितृ पक्ष के सात्विक भोजन में तोरई की सब्जी का विशेष स्थान है, जिसे बिना तड़के और मसालों के सादे ढंग से बनाया जाता है।
'बोबरा' क्या है और इसका क्या महत्व है?
बोबरा छत्तीसगढ़ का एक पारंपरिक मीठा पकवान है जो आटे और गुड़ से बनता है। इसे श्राद्ध के अवसर पर पितरों को विशेष रूप से अर्पित किया जाता है।
मातृ नवमी का छत्तीसगढ़ में क्या महत्व है?
मातृ नवमी के दिन परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों, जैसे माताओं और दादियों को याद किया जाता है और उनकी पसंद के भोजन का भोग लगाया जाता है।
पितृ पक्ष के अंतिम दिन पितरों को विदाई कैसे दी जाती है?
अंतिम दिन परिवार के सदस्य घर में पकवान चढ़ाते हैं और फिर घंटी व थाली बजाते हुए नदी या तालाब जाकर सामग्रियों का विसर्जन करते हैं।
श्राद्ध के भोज में किन्हें आमंत्रित करने की परंपरा है?
इस भोज में पूरे मोहल्ले को नहीं, बल्कि केवल अपने परिवार के करीबी सदस्यों, रक्त संबंधियों और गोत्र से जुड़े लोगों को ही आमंत्रित किया जाता है।
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