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कैंपस की दीवारों को नारों से मुक्त रखने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने की डिजिटल मंच अपनाने की अपीलपश्चिम बंगाल
2 सित॰ 2026, 3:21 pm (36 मिनट पहले)· 3

कैंपस की दीवारों को नारों से मुक्त रखने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने की डिजिटल मंच अपनाने की अपील

जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति चिरंजीव भट्टाचार्य ने छात्रों से अपील की है कि वे परिसर की दीवारों पर नारे लिखने के बजाय अपनी राय व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करें।

जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर लगातार लिखे जा रहे राजनीतिक नारों और पेंटिंग्स को लेकर संस्थान के प्रशासन ने छात्रों से विशेष आग्रह किया है। विश्वविद्यालय के कुलपति चिरंजीव भट्टाचार्य ने एक खुला पत्र जारी करके विद्यार्थियों और शिक्षकों से दीवारों पर नारे उकेरने के बजाय डिजिटल माध्यमों का प्रयोग करने का सुझाव दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी बात और विचार रखने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक बेहतर जरिया साबित हो सकते हैं, जिससे परिसर का शांत और स्वच्छ वातावरण भी प्रभावित नहीं होगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धरोहर के बीच संतुलन

कुलपति की ओर से जारी सार्वजनिक पत्र में कहा गया है कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाना बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय की पहचान हमेशा से स्वतंत्र चिंतन और रचनात्मक विचारों की रही है, जिसे बनाए रखना हर किसी की जिम्मेदारी है। प्रशासन चाहता है कि इस समृद्ध परंपरा को कायम रखते हुए परिसर की स्वच्छता, अनुशासन और सुंदर वातावरण की सुरक्षा की जाए।

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पत्र के माध्यम से कुलपति चिरंजीव भट्टाचार्य ने छात्रों और शिक्षकों से सामूहिक अपील की है कि वे मिलकर विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने में अपना योगदान दें। उनका मानना है कि अपनी राय व्यक्त करने के अनेक आधुनिक और प्रभावी साधन उपलब्ध हैं, इसलिए दीवारों को नुकसान पहुंचाए बिना भी अपनी बात मजबूती से रखी जा सकती है।

कैंपस में आपत्तिजनक नारों को लेकर उपजा विवाद

विश्वविद्यालय के कला संकाय की दीवारों पर लिखे गए कुछ नारों को लेकर हाल के दिनों में बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन नारों की तीव्र आलोचना करते हुए इन्हें देश विरोधी करार दिया था। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिए थे कि परिसर की दीवारों से इस प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री को तुरंत हटाया जाए।

विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कड़ा संज्ञान लेते हुए दीवारों पर लिखे नारों पर सफेद पेंट करवा दिया था। हालांकि, प्रशासन की इस कार्रवाई के कुछ ही समय बाद परिसर की दीवारों पर फिर से नए नारे लिखे हुए पाए गए। मुख्यमंत्री ने ऐसे नारों की तुलना कचरे से करते हुए कहा था कि जादवपुर विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में इस तरह की प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

किन नारों पर जताया गया था कड़ा एतराज?

कैंपस की दीवारों पर मुख्य रूप से 'किशनजी को लाल सलाम' और 'कश्मीर आजादी चाहता है' जैसे नारों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी। उल्लेखनीय है कि किशनजी एक शीर्ष माओवादी नेता था, जिसे वर्ष 2011 में सुरक्षा बलों द्वारा एक पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया था। यह घटना पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के कुछ ही महीनों बाद घटित हुई थी।

इन नारों के दोबारा सामने आने के बाद ही विश्वविद्यालय प्रशासन को यह कदम उठाना पड़ा है। कुलपति ने छात्रों से अपील की है कि वे अपनी ऊर्जा और विचारों को रचनात्मक दिशा में लगाएं और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करके परिसर की सुंदरता और शांति व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें।

सवाल-जवाब

जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति ने छात्रों से क्या अपील की है?
कुलपति चिरंजीव भट्टाचार्य ने छात्रों से परिसर की दीवारों पर नारे लिखने के बजाय अपनी राय व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करने की अपील की है।
किन नारों को लेकर विश्वविद्यालय में विवाद खड़ा हुआ था?
कैंपस की दीवारों पर 'किशनजी को लाल सलाम' और 'कश्मीर आजादी चाहता है' जैसे नारों को लेकर विवाद हुआ था।
प्रशासन ने दीवारों पर लिखे नारों पर क्या कार्रवाई की थी?
विश्वविद्यालय प्रशासन ने विवादित नारों को सफेद पेंट करवाकर हटवा दिया था, हालांकि दीवारों पर फिर से नए नारे लिख दिए गए।
माओवादी नेता किशनजी की मृत्यु कब हुई थी?
माओवादी नेता किशनजी को वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·22 मिनट पहले

जादवपुर विश्वविद्यालय का यह विवाद केवल परिसर की सुंदरता का नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष और प्रशासनिक नियंत्रण का गंभीर मुद्दा बन गया है। जब दीवारें साफ होने के बावजूद दोबारा नारे लिखे जाते हैं, तो यह साफ है कि प्रशासनिक आदेशों से वैचारिक असंतोष को दबाया नहीं जा सकता। राजनीतिक दबाव और छात्रों की आक्रामक अभिव्यक्ति के बीच यह खींचतान आने वाले दिनों में शैक्षणिक संस्थानों में विरोध प्रदर्शनों के नए तौर-तरीकों और नीतिगत टकरावों को जन्म देगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·22 मिनट पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला अब केवल प्रशासनिक नियमों और परिसर की सुंदरता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था और वैचारिक ध्रुवीकरण के एक संवेदनशील मोड़ पर आ गया है। जब विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेशों और राजनीतिक चेतावनियों के बावजूद दीवारों पर 'किशनजी को लाल सलाम' और 'कश्मीर आजादी चाहता है' जैसे अतिवादी नारे बार-बार वापस लौटते हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नियंत्रण की विफलता और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती को दर्शाता है। एक क्राइम संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि यह स्थिति आने वाले दिनों में पुलिस और प्रशासन के लिए बड़े नीतिगत टकराव और सुरक्षात्मक चुनौतियों का कारण बन सकती है।

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