उत्तराखंड की शांत पर्वतमालाओं में बाबा नीब करौरी महाराज का आध्यात्मिक प्रभाव सदियों से महसूस किया जाता रहा है। यद्यपि वर्तमान समय में कैंची धाम दुनिया भर में प्रसिद्ध है, परंतु बहुत कम लोगों को यह ज्ञात है कि कैंची धाम से पहले नैनीताल के समीप स्थित भूमियाधार बाबा का मुख्य साधना केंद्र हुआ करता था। बांज और देवदार के घने जंगलों से घिरा यह सुरम्य स्थल आज भी भक्तों के लिए अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है।
भूमियाधार में आश्रम निर्माण और प्रारंभिक वर्ष
भौगोलिक दृष्टि से भूमियाधार नैनीताल जिले के अंतर्गत भवाली, भीमताल और नैनीताल को जोड़ने वाले संगम मार्ग पर बसा हुआ है। ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय स्मृतियों के अनुसार, भूमियाधार में आश्रम की औपचारिक नींव 1960 के दशक के आरंभिक दौर में, लगभग 1962 के आसपास रखी गई थी। हालांकि महाराज जी का इस पहाड़ी अंचल में आना-जाना इस औपचारिक स्थापना से काफी वर्ष पूर्व ही प्रारंभ हो चुका था।
क्षेत्र के एक वरिष्ठ स्थानीय निवासी किशोरी लाल के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1951-52 के समय केवल 9 वर्ष की अल्पायु में पहली बार महाराज जी के साक्षात दर्शन किए थे। उन्होंने बताया कि उस दौर में स्थानीय बुजुर्गों ने पूज्य बाबाजी के स्पष्ट मार्गदर्शन और निर्देश पर ही यहां हनुमान मंदिर की आधारशिला रखी थी। प्रकृति के एकांत में बसा यह शांत वातावरण महाराज जी की गहन साधना के लिए अत्यंत अनुकूल सिद्ध हुआ।
जंगल की प्राकृतिक जलधारा और कैंची धाम तक आपूर्ति
भूमियाधार की आध्यात्मिक यात्रा में यहां मौजूद एक प्राकृतिक जलस्रोत की विशेष और ऐतिहासिक भूमिका रही है। मान्यताओं के अनुसार, जब भी बाबा नीब करौरी महाराज इस क्षेत्र में प्रवास करते थे, वे मंदिर के ठीक ऊपर जंगल में स्थित एक स्वच्छ प्राकृतिक जलधारा का ही पानी पिया करते थे। उनकी इस प्राकृतिक जल के प्रति विशेष रुचि का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब वे बाद में कैंची धाम में स्थायी रूप से रहने लगे, तब भी भक्तगण भूमियाधार से घोड़ों पर लादकर उनके पीने के लिए यही जल कैंची धाम पहुंचाया करते थे।
आधुनिक दौर में श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था का आधुनिकीकरण किया गया है। वर्तमान में उस मुख्य प्राकृतिक स्रोत से पाइपलाइन बिछाकर पानी को सीधे मंदिर परिसर के समक्ष लाया गया है। इसी पाइपलाइन के माध्यम से आज पूरे भूमियाधार गांव में जलापूर्ति भी सुनिश्चित की जाती है, जिससे ग्रामीणों की दैनिक आवश्यकताएं पूरी होती हैं।
महामारी से रक्षा और औषधीय जल की जनश्रुति
पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक स्रोतों का पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है, परंतु भूमियाधार के जल के साथ भक्तों का गहरा आध्यात्मिक विश्वास भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय समाज का मानना है कि इस जल का नियमित सेवन करने से गंभीर शारीरिक व्याधियां और असाध्य रोग दूर हो जाते हैं। बाबा नीम करौली महाराज के जीवन पर शोध करने वाले अध्येता कुणाल माधव मिश्रा रेखांकित करते हैं कि महाराज जी के जीवनकाल में जलस्रोतों से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं।
इन्हीं प्रसंगों में से एक प्रसिद्ध घटना तब की है जब भूमियाधार अंचल में एक भयानक महामारी फैली हुई थी। चारों तरफ भय का वातावरण था और असहाय ग्रामीणों ने अपनी रक्षा के लिए बाबाजी की शरण ली। उस समय महाराज जी ने ग्रामीणों को इसी जंगल के प्राकृतिक जल में तुलसी दल मिलाकर वितरित करने का निर्देश दिया था। इस चरणामृत रूपी जल के प्रभाव से महामारी का भीषण संकट पूरी तरह टल गया। आज भी ग्रामीण इस घटना को बाबा की दया और जनसेवा के अनूठे उदाहरण के रूप में याद करते हैं।
कैंची धाम आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए प्रमुख पड़ाव
दूरी के लिहाज से भूमियाधार भवाली कस्बे से लगभग 10 किलोमीटर और प्रसिद्ध कैंची धाम से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यही कारण है कि देश-विदेश से जब भी श्रद्धालु कैंची धाम पहुंचते हैं, तो वे बाबा के प्रारंभिक साधना स्थल भूमियाधार की यात्रा करना नहीं भूलते। घने जंगलों की नीरवता, मंदिर परिसर में गूंजती घंटियां और महाराज जी की तपोभूमि की पावन स्मृतियां श्रद्धालुओं को शांति प्रदान करती हैं। भक्त इस पवित्र जल को मात्र एक प्राकृतिक स्रोत नहीं, बल्कि बाबाजी का प्रत्यक्ष प्रसाद मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं।






















