उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित बाबा नीम करौली महाराज का कैंची धाम आज वैश्विक स्तर पर विख्यात हो चुका है। हर साल लाखों की तादाद में देश और दुनिया भर से श्रद्धालु इस पवित्र स्थल पर दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं और पर्यटकों की इस भारी आवाजाही ने मंदिर परिसर के आसपास की जमीनों को बेहद मूल्यवान बना दिया है। इसी भारी मांग और बढ़ती कीमतों के बीच अब मंदिर के ठीक सामने स्थित बेशकीमती भूखंड को लेकर एक हैरान करने वाला फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसके तार सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी से जुड़े हैं।
1983 में दिवंगत हुए व्यक्ति का 2026 में दर्ज हुआ वारिस
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत के समक्ष तहसील श्री कैंचीधाम के अंतर्गत पट्टी पाडली स्थित गमल्ला निगलाट क्षेत्र की जमीन को लेकर एक लिखित शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत में बेहद चौंकाने वाला दावा किया गया कि ओम प्रकाश नाम के एक शख्स ने खुद को स्वर्गीय केशवदत्त का कानूनी वारिस बताते हुए खतौनी में अपना नाम दर्ज करवा लिया। स्थानीय ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि ओम प्रकाश नाम का कोई भी व्यक्ति न तो उस क्षेत्र में निवास करता है और न ही वह वहां का मूल निवासी है।
कुमाऊं कमिश्नर द्वारा कराई गई प्रारंभिक छानबीन में यह तथ्य उजागर हुआ कि जिस भूस्वामी केशवदत्त की मिल्कियत को लेकर यह फेरबदल हुआ, उनका देहांत वर्ष 1983 में ही हो चुका था। यानी करीब 43 वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके व्यक्ति के नाम पर दर्ज भूमि पर वर्ष 2026 में वारिस का नाम चढ़ा दिया गया। आरोप है कि राजस्व विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत अथवा लापरवाही के सहारे जाली आधार कार्ड और फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार कर इस वरासत को अंजाम दिया गया।
आधार कार्ड में दर्ज उम्र और रजिस्ट्री के ब्योरे में भारी विसंगति
जमीन की रजिस्ट्री और नामांतरण प्रक्रिया से जुड़े अभिलेखों की शुरुआती पड़ताल में एक और बड़ा झोल देखने को मिला है। रजिस्ट्री में जो आधार कार्ड संलग्न किया गया है, वह कथित तौर पर उत्तर प्रदेश के किसी व्यक्ति का प्रतीत होता है। उस आधार कार्ड के विवरण के मुताबिक संबंधित व्यक्ति की शारीरिक उम्र लगभग 40 से 50 वर्ष के बीच आंकी जा रही है। इसके ठीक उलट, जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े दस्तावेजों में उसी व्यक्ति की उम्र 73 वर्ष दर्शाई गई है। उम्र में 20 से 30 साल के इस भारी अंतर ने संदेह को और गहरा कर दिया है तथा पूरी वरासत प्रक्रिया को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
ग्रामीणों ने कई रसूखदारों पर लगाए मिलीभगत के गंभीर आरोप
इस संवेदनशील भूखंड से जुड़े विवाद में स्थानीय ग्रामीणों ने सीधे तौर पर कई लोगों की सांठगांठ होने का आरोप लगाया है। ग्रामीणों द्वारा सौंपी गई शिकायत में नरेश पांडे, संध्या बोरा, रामगढ़ निवासी कर्नल विवेक भट्ट, संजय बोहरा, ग्राम डोब की प्रधान पुष्पा देवी और गोलापार निवासी हिमांशु के नामों का उल्लेख किया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन लोगों ने मिलकर जाली पहचान पत्रों के सहारे जमीन हथियाने का सुनियोजित ताना-बाना बुना। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि इस प्रकरण में नामजद लोगों की वास्तविक भूमिका और उन पर लगाए गए आरोपों की प्रमाणिकता निष्पक्ष आधिकारिक जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
कुमाऊं कमिश्नर ने नैनीताल डीएम को दिए एफआईआर दर्ज करने के सख्त निर्देश
मामले की गंभीरता, मंदिर परिसर की संवेदनशीलता और फर्जीवाड़े के स्तर को देखते हुए कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने नैनीताल के जिलाधिकारी को इस पूरे लैंड फ्रॉड की विस्तृत और गहन जांच करने का आदेश जारी किया है। कमिश्नर ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मामले में प्रस्तुत आधार कार्ड, मृत्यु प्रमाण पत्र और वरासत से जुड़े सभी कागजातों की फॉरेंसिक और आधिकारिक जांच कराई जाए। यदि जांच में दस्तावेज कूटचरित या फर्जी पाए जाते हैं, तो जालसाजी और धोखाधड़ी के इस खेल में शामिल सभी संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ तत्काल भारतीय कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
कैंची धाम के आसपास जमीनों के आसमान छूते भाव और राजस्व रिकॉर्ड की पड़ताल
बाबा नीम करौली महाराज की तपोस्थली और प्रसिद्ध हनुमान मंदिर होने के नाते कैंची धाम में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इस आध्यात्मिक केंद्र के चारों तरफ होटल, रिसॉर्ट, होमस्टे और दुकानों के निर्माण की होड़ मची हुई है। लगातार बढ़ते पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों के चलते यहां की जमीनें अत्यधिक मूल्यवान हो चुकी हैं। भारी मुनाफा कमाने की इसी होड़ ने भूमाफियाओं और जालसाजों को सक्रिय कर दिया है, जिसके चलते मंदिर के इर्द-गिर्द हो रही जमीन की खरीद-फरोख्त पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि किसी भी भूखंड का सौदा करते समय केवल रजिस्ट्री दस्तावेज देख लेना पर्याप्त नहीं होता है। सुरक्षित संपत्ति खरीद के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि जमीन पूर्व में किसके नाम दर्ज थी, उसका वास्तविक मूल मालिक कौन था, दाखिल-खारिज यानी म्यूटेशन की प्रक्रिया विधिवत पूरी हुई है या नहीं, जमीन की राजस्व श्रेणी क्या है और सरकारी खतौनी में वर्तमान स्थिति क्या दर्शाई गई है। कैंची धाम के सामने जिन भूखंडों को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, उनके खसरा नंबरों के आधार पर पुराने राजस्व रिकॉर्ड खंगालने पर ही जमीन के स्वामित्व का पूरा सच सामने आ सकेगा।





















