उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जम्बू एक बेहद लोकप्रिय और पारंपरिक सुगंधित जड़ी-बूटी के रूप में अपनी खास पहचान रखता है। मध्य हिमालयी क्षेत्रों में उगने वाले इस पौधे का इस्तेमाल सदियों से स्थानीय रसोई में मुख्य मसाले के तौर पर किया जाता रहा है। जम्बू की अनोखी खुशबू और तीखा सोंधा स्वाद पहाड़ी दालों, तरह-तरह की सब्जियों और पारंपरिक झोल को एक खास पहचान प्रदान करता है। उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में घर में तैयार होने वाले मसालों में जम्बू को बेहद ऊंचा दर्जा हासिल है। हालांकि, ताजी जम्बू की पत्तियों का इस्तेमाल केवल सीमित दिनों के लिए ही किया जा सकता है, क्योंकि नमी के कारण ये जल्दी खराब होने लगती हैं। यही वजह है कि इन्हें सही तरीके से सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा काफी समय से चली आ रही है।
चयन और सफाई की सही विधि
बागेश्वर निवासी किशन मलड़ा ने जम्बू की पत्तियों को सुखाने और उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने की पूरी प्रक्रिया साझा की है। उनके अनुसार, जम्बू को लंबे समय तक इस्तेमाल के योग्य बनाने के लिए सबसे पहले सही और स्वस्थ पत्तियों का चुनाव करना बहुत जरूरी है। केवल वही ताजी पत्तियां चुनी जानी चाहिए जो पूरी तरह से हरी हों और जिनमें कीड़ों का हमला, काले दाग या सड़न के लक्षण न दिखें। खराब या कीड़े लगी पत्तियों को मिलाने से पूरा मसाला खराब हो सकता है।
पौधे से पत्तियां तोड़ने के बाद उन्हें साफ और ताजे पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए ताकि उन पर जमी धूल, मिट्टी और अन्य अशुद्धियां पूरी तरह निकल जाएं। धोने के बाद पत्तियों में मौजूद अतिरिक्त पानी को तुरंत हटाना जरूरी होता है। इसके लिए सूती कपड़े या किसी बड़ी छलनी की मदद ली जा सकती है। पत्तियों को सुखाने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है कि उनकी बाहरी सतह पर पानी की बूंदें न रहें। यदि बहुत अधिक गीली पत्तियों को सुखाने के लिए रखा जाएगा तो उनमें फफूंद लगने या सड़ने की आशंका बहुत बढ़ जाती है।
छाया में सुखाने की वैज्ञानिक तकनीक
जम्बू की पत्तियों को सुखाने के दौरान सबसे बड़ी सावधानी यह रखनी होती है कि इन्हें कभी भी सीधे तेज धूप में न रखा जाए। तेज धूप की गर्मी पत्तियों में मौजूद प्राकृतिक तेल, सुगंध और गहरे हरे रंग को नष्ट कर देती है। इसलिए जम्बू को हमेशा किसी छायादार, साफ और हवादार स्थान पर ही सुखाना चाहिए।
सुखाने के लिए पत्तियों को किसी साफ कपड़े, चटाई या ट्रे पर बेहद पतली परत में फैलाकर रखा जाता है। पत्तियों को एक के ऊपर एक ढेर बनाकर रखने से नीचे की पत्तियों में नमी रुकी रह सकती है, जिससे वे काली पड़ सकती हैं। सुखाने के दौरान दिन में दो से तीन बार पत्तियों को हल्के हाथों से पलटते रहना चाहिए ताकि सभी हिस्सों में हवा समान रूप से लगे। मौसम के तापमान और हवा में नमी के स्तर के आधार पर जम्बू की पत्तियों को पूरी तरह सूखने में कुछ दिनों का समय लग सकता है। जब पत्तियां पूरी तरह कुरकुरी हो जाएं और उनमें नमी का नामोनिशान न रहे, तभी उन्हें भंडारण के लिए आगे बढ़ाया जाता है।
भंडारण और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के नियम
जब जम्बू की पत्तियां पूरी तरह सूख जाएं, तो उन्हें अपनी पसंद के अनुसार सहेज कर रखा जा सकता है। कुछ लोग सूखी पत्तियों को हाथों से हल्का मसलकर या कूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट लेते हैं, जबकि कई लोग पत्तियों को साबुत रूप में ही रखना पसंद करते हैं। तैयार सूखे जम्बू को हमेशा एक साफ, सूखे और एयरटाइट डिब्बे में ही बंद करके रखना चाहिए।
भंडारण के डिब्बे में नमी की एक भी बूंद नहीं होनी चाहिए, क्योंकि नमी के संपर्क में आते ही सूखे जम्बू की गुणवत्ता और सुगंध तेजी से घटने लगती है। कांच के बर्तन या अच्छी गुणवत्ता वाले प्लास्टिक के डिब्बे इसके लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। डिब्बे को हमेशा घर के किसी ठंडे, सूखे और अंधेरे कोने में रखना चाहिए। सीधी धूप और गर्मी से दूर रखने पर जम्बू की प्राकृतिक सोंधी खुशबू कई महीनों तक ज्यों की त्यों बनी रहती है।
पहाड़ी व्यंजनों में जम्बू के इस्तेमाल और तड़के का तरीका
उत्तराखंड के पारंपरिक घरों में सूखे जम्बू का सबसे मुख्य उपयोग दाल में तड़का यानी छौंक लगाने के लिए किया जाता है। जब सूखे जम्बू को गर्म तेल या शुद्ध देसी घी में डाला जाता है, तो इसकी दिलकश खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। सामान्य अरहर या तुअर की दाल में भी जम्बू का तड़का लगाने से उसमें ठेठ पहाड़ी स्वाद आ जाता है।
विशेष रूप से मसूर, गहत यानी कुलथ और भट्ट यानी काले सोयाबीन की दाल में जम्बू का तड़का बेहद अनिवार्य माना जाता है। जम्बू की मात्रा का चयन हमेशा अपने स्वाद के अनुसार करना चाहिए। चूंकि इसका स्वाद काफी तीव्र और सोंधा होता है, इसलिए शुरुआत में कम मात्रा का उपयोग करना ही बेहतर होता है। दाल के अलावा, पहाड़ी रसोई में आलू, लौकी, कद्दू और अन्य मौसमी सब्जियों के तड़के में भी इसे डाला जाता है। उत्तराखंड के पारंपरिक झोल और घर पर बनाए जाने वाले विशेष पहाड़ी मसाला मिक्स में भी सूखे जम्बू को मिलाकर रखा जाता है।
भंडारण के दौरान रखी जाने वाली जरूरी सावधानियां
सूखे जम्बू को लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। डिब्बे से जम्बू निकालते समय कभी भी गीले हाथों का इस्तेमाल न करें। हमेशा एक साफ और सूखी चम्मच का ही उपयोग करें। डिब्बे का ढक्कन इस्तेमाल के तुरंत बाद कसकर बंद कर देना चाहिए ताकि बाहर की नमी और हवा अंदर न जा सके। यदि कभी डिब्बे में नमी, अजीब बदबू या फफूंद के लक्षण दिखाई दें, तो उस मसाले का इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए। यदि सही तरीके से सुखाकर सूखे डिब्बे में रखा जाए तो जम्बू आसानी से 6 से 12 महीने तक अपनी ताज़गी और स्वाद बनाए रखता है।
ग्रामीण महिलाओं और किसानों के लिए कमाई का जरिया
जम्बू केवल उत्तराखंड के भोजन का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला ही नहीं है, बल्कि यह पहाड़ियों में रहने वाले छोटे किसानों और ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका का एक बेहतरीन जरिया भी बन सकता है। पहाड़ी खाद्य पदार्थों और शुद्ध मसालों की मांग अब देश के बड़े शहरों और विदेशी बाजारों में भी तेजी से बढ़ रही है।
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और किसान जम्बू की वैज्ञानिक खेती करके और उसकी पत्तियों को साफ-सुथरे तरीके से सुखाकर छोटे-छोटे आकर्षक पैकेटों में बंद करके बाजार में बेच सकते हैं। सही सुखाने की तकनीक, स्वच्छता और सुंदर ब्रांडिंग के जरिए इस स्थानीय जड़ी-बूटी को एक सफल कुटीर उद्योग का रूप दिया जा सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिलेगी।


















