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एंबेसडर कार से जब भक्त के द्वार पहुंचे नीम करौली बाबा, बीस साल पुराने वादे से जुड़ी है कैंची धाम की गाथाउत्तराखंड
12 सित॰ 2026, 2:21 pm (1 घंटे पहले)· 0

एंबेसडर कार से जब भक्त के द्वार पहुंचे नीम करौली बाबा, बीस साल पुराने वादे से जुड़ी है कैंची धाम की गाथा

फिल्म हनुमान अंश के अंत के बाद शुरू होती है नीम करौली बाबा के नैनीताल और कैंची धाम की यात्रा, जिसमें भक्त पूर्णानंद तिवारी को दिया गया बीस साल पुराना वचन सच साबित हुआ।

आध्यात्मिक गुरु बाबा नीम करौली महाराज के पावन जीवन और उनकी लीलाओं पर केंद्रित फिल्म हनुमान अंश ने दर्शकों के बीच गहरा प्रभाव छोड़ा है। पर्दे पर बाबा के तपस्वी जीवन, मानवीय सेवा और उनके चमत्कारों की झलक देखने के बाद श्रद्धालु उनके जीवन के अगले पड़ावों के बारे में जानने को बेहद उत्सुक हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में बाबा का आगमन केवल एक संत का प्रवास नहीं था, बल्कि इसने नैनीताल से लेकर कैंची तक की पूरी आध्यात्मिक तस्वीर बदल दी। फिल्म की पटकथा जहां समाप्त होती है, असल में वहीं से कैंची धाम के उद्भव, हनुमानगढ़ी के निर्माण और भक्तों के साथ उनके अटूट वचनों की एक अद्भुत और ऐतिहासिक यात्रा का आरंभ होता है।

नैनीताल के जंगलों में पहली भेंट और बीस साल का वचन

नैनीताल स्थित प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के व्यवस्थापक एमपी सिंह के अनुसार, बाबा नीम करौली के इस अलौकिक सफर के सबसे महत्वपूर्ण साक्षी उनके अनन्य भक्त स्वर्गीय पूर्णानंद तिवारी रहे हैं। यह प्रसंग साल 1942 के आसपास का है, जब पूर्णानंद तिवारी नैनीताल से कैंची की दिशा में पैदल लौट रहे थे। भवाली मार्ग पर भूमियाधार के समीप जोखिया का इलाका उस दौर में बेहद बीहड़ और घने जंगलों से घिरा हुआ था। एकांत वन मार्ग पर अचानक पूर्णानंद तिवारी के कानों में उनका नाम गूंजा। घने पेड़ों के बीच एक तेजस्वी संत खड़े थे, जिन्होंने उन्हें नाम लेकर पुकारा। अजनबी जंगल में अपना नाम सुनकर पूर्णानंद तिवारी हतप्रभ रह गए।

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उस घने जंगल में बाबा ने न केवल उन्हें आगे का सुरक्षित मार्ग दिखाया, बल्कि उनके साथ आत्मीय संवाद भी किया। इस आलौकिक अनुभव से अभिभूत होकर पूर्णानंद तिवारी ने श्रद्धापूर्वक बाबा से अपने घर पधारने और दोबारा दर्शन देने का अनुनय किया। उस समय बाबा ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा था कि वे ठीक बीस साल बाद उनके घर आएंगे। पूर्णानंद तिवारी उस वक्त इस बात की गहराई को पूरी तरह समझ नहीं पाए थे, किंतु यह संक्षिप्त कथन आगे चलकर उनके पारिवारिक जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई साबित होने वाला था।

मनोरा पहाड़ी पर हनुमानगढ़ी की स्थापना और लोक आस्थाएं

जोखिया की उस मुलाकात के बाद बाबा नीम करौली महाराज ने रानीखेत, अल्मोड़ा और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक भ्रमण किया। पर्वतीय घाटियों में तपस्या और विचरण करते हुए वे वर्ष 1950 के आसपास नैनीताल पहुंचे। उस दौर में नैनीताल की मनोरा पहाड़ी एक उपेक्षित और डरावना स्थान मानी जाती थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि उस पहाड़ी पर उस समय छोटे बच्चों का कब्रिस्तान हुआ करता था, जिसके चलते आम लोग शाम ढलते ही वहां जाने से कतराते थे और इलाके में भय का वातावरण रहता था।

बाबा ने उसी भयभीत कर देने वाले स्थान को अपनी साधना स्थली चुना। उन्होंने अपने कुछ निष्ठावान अनुयायियों की सहायता से वहां एक साधारण कुटिया तैयार की और संकटमोचन हनुमान जी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई। एमपी सिंह बताते हैं कि बाबा ने वहां केवल हनुमान मंदिर ही नहीं बनवाया, बल्कि बाद में शिव मंदिर और राम मंदिर की भी स्थापना करवाई। धीरे-धीरे वह डरावनी पहाड़ी एक भव्य आध्यात्मिक केंद्र बन गई, जिसे आज पूरी दुनिया हनुमानगढ़ी के नाम से जानती है।

हनुमानगढ़ी को लेकर इस क्षेत्र में कई चमत्कारिक प्रसंग आज भी सुने जाते हैं। मान्यता है कि कुमाऊं के सिद्ध संत हैड़ाखान बाबा ने दशकों पूर्व यह भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में कोई अंजनी का लाल इस निर्जन पहाड़ी को जाग्रत करेगा। इसके अलावा बाबा के जीवन से जुड़े अभिलेखों में उल्लेख मिलता है कि मनोरा पहाड़ी पर उन्होंने एक बार विशाल भंडारे का आयोजन किया था। उस भंडारे में अचानक सैकड़ों छोटे बच्चों का समूह प्रसाद ग्रहण करने आ पहुंचा। स्थानीय जनश्रुति मानती है कि वे बच्चे उसी पहाड़ी पर दफन आत्माएं थीं, जिन्हें बाबा के पावन स्पर्श और महाप्रसाद से मोक्ष की प्राप्ति हुई।

शिप्रा तट पर सोमवारी महाराज की धूनी और कैंची धाम की नींव

नैनीताल के हनुमानगढ़ी क्षेत्र में करीब दस वर्षों तक साधना और लोक कल्याण का कार्य करने के बाद, वर्ष 1960 के आसपास बाबा नीम करौली ने भूमियाधार का रुख किया। इसके दो साल बाद, यानी वर्ष 1962 में बाबा पहली बार कैंची क्षेत्र में पहुंचे। कैंची घाटी उस समय जंगलों और शिप्रा नदी के तीव्र प्रवाह के बीच बिल्कुल एकांत और शांत क्षेत्र थी।

कैंची पहुंचते ही बाबा ने अपने निष्ठावान भक्त पूर्णानंद तिवारी को साथ लिया और शिप्रा नदी के तट पर महान संत सोमवारी महाराज की प्राचीन धूनी की खोज करने की इच्छा प्रकट की। सोमवारी महाराज उत्तराखंड के एक उच्च कोटि के सिद्ध संत थे, जिनकी धूनी शिप्रा के तट पर जंगलों में कहीं लुप्त हो चुकी थी। बाबा के निर्देश पर घने कंटीले जंगलों को काटा गया और रास्ता साफ किया गया। जब वह पावन धूनी मिल गई, तो बाबा ने उसी पवित्र स्थल पर अपना आश्रम स्थापित करने का निर्णय लिया। यही पावन स्थल आज विश्व विख्यात कैंची धाम के रूप में जाना जाता है, जहां हर वर्ष देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु मानसिक शांति और बाबा के आशीर्वाद की तलाश में पहुंचते हैं।

एंबेसडर कार का आगमन और बीस साल पुराने वादे की पूर्ति

इस पूरे आध्यात्मिक इतिहास में सबसे अविश्वसनीय और हृदयस्पर्शी घटना पूर्णानंद तिवारी के साथ जुड़े बीस साल पुराने वादे की है। पूर्णानंद तिवारी के सुपुत्र उमेश तिवारी इस ऐतिहासिक घटना का विवरण देते हुए बताते हैं कि वर्ष 1942 में जब उनके पिता की पहली मुलाकात बाबा से हुई थी, तब उनका परिवार दो अत्यंत जटिल कानूनी मुकदमों में उलझा हुआ था। उस पहली ही भेंट में बाबा ने उनसे कहा था कि वे एक मुकदमा तो अगले ही दिन जीत जाएंगे, जबकि दूसरे मुकदमे का फैसला बीस साल बाद उनके पक्ष में आएगा।

हैरानी की बात यह रही कि ठीक अगले दिन अदालत ने पहला मुकदमा पूर्णानंद तिवारी के पक्ष में सुना दिया। इसके बाद पूरे दो दशक बीत गए। वर्ष 1962 में उनकी एक आटा चक्की से जुड़े पुराने मुकदमों की अंतिम सुनवाई हुई और फैसला एक बार फिर पूर्णानंद तिवारी के पक्ष में आया। मुकदमा जीतने के कुछ ही दिनों बाद, मई 1962 की एक दोपहर अचानक उनके पैतृक घर के आंगन में एक एंबेसडर कार आकर रुकी। उस दौर में पहाड़ों पर एंबेसडर कार का पहुंचना अपने आप में दुर्लभ घटना थी।

उस एंबेसडर कार से स्वयं बाबा नीम करौली महाराज उतरे और सीधे उनके घर के भीतर चले आए। बाबा ने मुस्कुराते हुए पूर्णानंद तिवारी को वर्ष 1942 के उस बीहड़ जंगल की मुलाकात और बीस साल बाद घर आने के अपने वचन का स्मरण कराया। उमेश तिवारी बताते हैं कि अपने नेत्रों के सम्मुख संत का यह दिव्य स्वरूप और सटीक वचनबद्धता देखकर उनके पिता भावविभोर हो गए। इसके बाद पूर्णानंद तिवारी ने अपना पूरा जीवन बाबा के चरणों में समर्पित कर दिया और कैंची धाम के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सवाल-जवाब

नीम करौली बाबा और पूर्णानंद तिवारी की पहली मुलाकात कब और कहां हुई थी?
उनकी पहली मुलाकात वर्ष 1942 के आसपास नैनीताल और कैंची के बीच भूमियाधार के समीप जोखिया के घने जंगलों में हुई थी।
बाबा नीम करौली ने पूर्णानंद तिवारी को क्या वचन दिया था?
बाबा ने उनसे कहा था कि वे उनके घर पर ठीक बीस साल बाद दर्शन देने आएंगे, जिसे उन्होंने 1962 में पूरा किया।
नैनीताल में हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना किस स्थान पर की गई थी?
हनुमानगढ़ी की स्थापना वर्ष 1950 में मनोरा पहाड़ी पर की गई थी, जहां पहले बच्चों का पुराना कब्रिस्तान हुआ करता था।
कैंची धाम के निर्माण की शुरुआत किस प्रकार हुई थी?
वर्ष 1962 में बाबा ने शिप्रा नदी के किनारे संत सोमवारी महाराज की लुप्त हो चुकी धूनी को खोजकर वहां आश्रम की स्थापना की थी।
बाबा नीम करौली 1962 में पूर्णानंद तिवारी के घर किस वाहन से पहुंचे थे?
मई 1962 में बाबा नीम करौली एक एंबेसडर कार से पूर्णानंद तिवारी के घर पहुंचे थे।
पूर्णानंद तिवारी के मुकदमों को लेकर बाबा ने क्या कहा था?
बाबा ने कहा था कि वे एक मुकदमा अगले दिन जीतेंगे और दूसरा बीस साल बाद, जो पूरी तरह सच साबित हुआ।
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