उत्तराखंड के प्रसिद्ध जनवादी कवि, गीतकार और लोकगायक स्वर्गीय गिरीश चंद्र तिवारी 'गिर्दा' को उनकी पुण्यतिथि पर नैनीताल की सड़कों पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। शनिवार को आयोजित इस विशेष स्मरण कार्यक्रम के दौरान तल्लीताल से लेकर माल रोड होते हुए सीआरएसटी इंटर कॉलेज तक एक विशाल जन चेतना रैली निकाली गई। इस अवसर पर जुटे लोगों और कार्यकर्ताओं ने गिर्दा के लिखे अमर जनगीतों को गाते हुए जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय निवासियों के मालिकाना हक का संदेश दोहराया। 22 अगस्त 2010 को इस संसार से विदा लेने वाले गिर्दा की स्मृतियों को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनके द्वारा रचे गए गीत केवल कविताएं नहीं थीं, बल्कि वे उत्तराखंड के लोक आंदोलनों की बुलंद आवाज और जनसंघर्ष की ऊर्जा थे।
पेपर लीक और सामाजिक समस्याओं पर गिर्दा की पत्नी का वक्तव्य
श्रद्धांजलि सभा में स्वर्गीय गिरीश चंद्र तिवारी 'गिर्दा' की पत्नी हेमलता तिवारी ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि गिर्दा के गीतों में हमेशा आम जनता के दर्द और उनकी आकांक्षाओं की गूंज हुआ करती थी। उनके गीत आंदोलनकारियों को विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करते रहने का आत्मबल प्रदान करते थे। वर्तमान समय की सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों पर बात करते हुए हेमलता तिवारी ने कहा कि आज देश और प्रदेश में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसे मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि आज गिर्दा हमारे बीच जीवित होते, तो वे निश्चित रूप से इन ज्वलंत समस्याओं के समाधान के लिए जन आंदोलन की रूपरेखा तैयार करते और अपनी रचनाओं के जरिए सत्ता से तीखे सवाल पूछते।
हेमलता तिवारी ने राज्य सरकार के रवैये पर निराशा जताते हुए स्पष्ट किया कि गिर्दा के निधन के बाद सरकार की तरफ से उनके परिवार को किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं दी गई है। इसके साथ ही उन्होंने उत्तराखंड राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जिस परिकल्पना के साथ पृथक राज्य का गठन किया गया था, वह सपना आज भी अधूरा है। राज्य बनने के दशकों बीत जाने के बाद भी दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार और अन्य आधारभूत जनसुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।
पहाड़ के अधिकारों और गैरसैंण राजधानी की बुलंद मांग
कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचे केंद्रीय युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष आशीष नेगी ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि गिर्दा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पर्वतीय युवाओं के दिलों में पहाड़ के प्रति निस्वार्थ प्रेम और जिम्मेदारी का अहसास जगाया था। गिर्दा का स्पष्ट संदेश था कि उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लगातार संघर्षरत रहना होगा। आशीष नेगी ने कहा कि पृथक राज्य आंदोलन के दौरान जिस समृद्ध और आत्मनिर्भर उत्तराखंड का ढांचा सोचा गया था, उसे अब तक जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा सका है।
आशीष नेगी ने पर्वतीय विकास के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा कि गैरसैंण को राज्य की स्थायी राजधानी बनाना, पर्वतीय जिलों में प्रशासनिक और संस्थागत तंत्र को मजबूत करना और राज्य के अंतिम गांव तक विकास का लाभ पहुंचाना हमेशा से आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग रही है। उन्होंने नैनीताल स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय को हल्द्वानी स्थानांतरित किए जाने के प्रशासनिक निर्णयों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकार के फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता में बैठे लोग लगातार पहाड़ी इलाकों की अनदेखी कर रहे हैं। नेगी के अनुसार, यदि आज गिर्दा जीवित होते तो नैनीताल से हाई कोर्ट को हटाने के फैसले के खिलाफ उनकी हुड़की की थाप पूरी घाटी में गूंजती और उनकी सुरीली लेकिन धारदार आवाज सरकार को फैसला बदलने पर मजबूर कर देती।
प्रशासनिक उपेक्षा, अंकिता भंडारी मामला और भविष्य के संघर्ष की जरूरत
उत्तराखंड राज्य निर्माण की मूल अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए आशीष नेगी ने याद दिलाया कि शुरुआती सोच विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की थी। इसके लिए राज्य को छोटी प्रशासनिक इकाइयों में बांटने की बात कही गई थी, जिसमें चार कमिश्नरी, गैरसैंण को राजधानी बनाना, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का अधिकार, 23 जिले और अधिक संख्या में छोटे विकास खंड (ब्लॉक) शामिल थे। इन संरचनाओं का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि योजनाएं और वित्तीय संसाधन सीधे गांवों तक पहुंच सकें। लेकिन आज के समय में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो चुकी है और पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दे को उठाते हुए आशीष नेगी ने बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और उत्पीड़न अत्यंत चिंताजनक हैं। उत्तराखंड क्रांति दल इस पूरे मामले में अंकिता भंडारी को पूर्ण न्याय दिलाने के लिए कटिबद्ध है और लगातार संघर्ष कर रहा है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ सभी को एक साथ आकर मजबूती से खड़ा होना होगा। आशीष नेगी ने युवाओं से अपील की कि वे व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़कर त्याग और समर्पण की भावना के साथ उत्तराखंड के जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए नए सिरे से एकजुट हों, क्योंकि आने वाली पीढ़ी को एक बार फिर से अपनी पहचान और अधिकारों के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा करना पड़ सकता है।





















