उत्तराखंड के बागेश्वर शहर की पहचान सरयू और गोमती नदियों के संगम से जुड़ी है, और यहां खड़े कुछ पुराने पुल आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं जब पहाड़ों में सड़कें बिछाने का काम जोर पकड़ रहा था. गोमती नदी पर बना गोमती मोटर पुल इन्हीं में से एक है, जिसकी उम्र करीब 60 से 64 साल के बीच आंकी जाती है. आज भी यह पुल शहर और आसपास के गांवों के बीच आवाजाही का मुख्य जरिया बना हुआ है.
1962 की जंग और सड़कों की नई सोच
जिला नागरिक समिति के सदस्य संजय शाह जगाती के मुताबिक, गोमती मोटर पुल 1960 के दशक में उस समय तैयार हुआ, जब पहाड़ी इलाकों में सड़क और यातायात ढांचे को मजबूत करने की कवायद तेज हो चली थी. उनका कहना है कि 1962 में हुई भारत-चीन जंग के बाद सीमा से सटे और पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क संपर्क बढ़ाने की जरूरत को गंभीरता से महसूस किया गया, और इसी सोच के चलते बागेश्वर जैसे पहाड़ी इलाकों में सड़क और पुल परियोजनाओं को रफ्तार मिली. गोमती मोटर पुल को भी इसी दौर की देन माना जाता है.
बाजार तक पहुंच हुई आसान
पुल बनने से पहले आसपास के गांवों से बागेश्वर के बाजार तक सामान और लोगों को पहुंचाना आसान नहीं था. पुल तैयार होने के बाद यह दूरी काफी हद तक सिमट गई, जिससे स्थानीय कारोबार को भी बढ़ावा मिला. व्यापारियों के लिए यह रास्ता माल ढुलाई और खरीद-बिक्री, दोनों के लिहाज से अहम बन गया.
राजमार्ग 309A पर आज की अहमियत
मौजूदा वक्त में यह पुल राष्ट्रीय राजमार्ग 309A की एक जरूरी कड़ी है. बागेश्वर शहर से गुजरने वाले इस रास्ते पर हर दिन बड़ी संख्या में छोटे-बड़े वाहन दौड़ते हैं. पिछले कुछ दशकों में वाहनों की तादाद में जबरदस्त इजाफा हुआ है. एक वक्त था जब पुल पर आवाजाही सीमित हुआ करती थी, लेकिन अब बसें, ट्रक, मालवाहक गाड़ियां और निजी वाहन लगातार इस पर से गुजरते रहते हैं.
बढ़ते बोझ के बीच सुरक्षा पर सवाल
भारी वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या ने इस पुराने ढांचे पर दबाव भी बढ़ा दिया है. साठ साल से ज्यादा वक्त से बिना रुके इस्तेमाल में होने के चलते पुल की मजबूती और सुरक्षा को लेकर अलग-अलग मौकों पर चर्चा होती रही है. जानकारों की राय में किसी भी पुराने पुल को सुरक्षित बनाए रखने के लिए समय-समय पर तकनीकी जांच और जरूरत पड़ने पर मरम्मत का काम बेहद जरूरी होता है. लगातार बढ़ते ट्रैफिक को देखते हुए पुल की मौजूदा स्थिति का तकनीकी मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी माना जाता है, ताकि आगे किसी तरह का खतरा न बने.
गोमती के पुराने पुल से सरयू के झूला पुल तक
मौजूदा गोमती मोटर पुल से पहले इसी नदी पर एक और पुराना पुल हुआ करता था, जिसका ऐतिहासिक महत्व था. वक्त गुजरने के साथ वह ढांचा कमजोर पड़ता गया और आखिरकार 1970 के दशक में उसे हटाना पड़ा. उसके बाद से मौजूदा मोटर पुल ही इलाके की पूरी यातायात व्यवस्था संभाल रहा है. इसके अलावा बागेश्वर में सरयू नदी पर 1913 में बना झूला पुल भी शहर की विरासत का हिस्सा है. सदी भर से ज्यादा पुराना यह पुल बागेश्वर की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा माना जाता है. इस तरह गोमती मोटर पुल और सरयू का पुराना झूला पुल, दोनों मिलकर बागेश्वर के बदलते दौर और विकास की अलग-अलग कहानियां बयां करते हैं.





















