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उत्तराखंड के ज्योलीकोट में दूषित पानी बना कहर, दो की मौत और आठ गांवों में संक्रमण से हड़कंपउत्तराखंड
6 सित॰ 2026, 6:08 pm (32 मिनट पहले)· 2

उत्तराखंड के ज्योलीकोट में दूषित पानी बना कहर, दो की मौत और आठ गांवों में संक्रमण से हड़कंप

नैनीताल जिले के ज्योलीकोट क्षेत्र में गंदे पानी के सेवन से पीलिया और डायरिया फैलने के कारण एक किशोर और एक युवा मां की मौत हो गई है। हालात की गंभीरता को भांपते हुए स्वास्थ्य विभाग ने क्षेत्र में पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है।

उत्तराखंड के नैनीताल जिले का रमणीक ज्योलीकोट इलाका इन दिनों एक गंभीर स्वास्थ्य आपदा की चपेट में है। जून के आखिरी हफ्ते से शुरू हुआ उल्टी, दस्त और टाइफाइड का दौर अब जानलेवा पीलिया यानी जॉन्डिस में तब्दील हो चुका है, जिससे स्थानीय निवासियों में भारी दहशत का माहौल है। इस खतरनाक संक्रमण के चलते दो अलग-अलग परिवारों की खुशियां पूरी तरह उजड़ चुकी हैं। एक तरफ जहां महज सोलह साल के एक प्रतिभावान छात्र की असमय मृत्यु हुई है, वहीं दूसरी ओर छब्बीस साल की एक युवा मां के निधन से दो मासूम बच्चियों के सिर से ममता का आंचल छिन गया है। इस वीभत्स स्थिति को देखते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पंत ने तुरंत प्रभाव से इलाके में पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी का ऐलान कर दिया है और तमाम चिकित्सा दलों को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया गया है।

उपचार के लिए भटकता रहा परिवार, नहीं बच सका इकलौता बेटा

सड़ियाताल के रहने वाले सोलह साल के रितेश जीना को अठारह अगस्त से लगातार टाइफाइड के साथ-साथ उल्टी और दस्त की गंभीर शिकायत थी। शुरुआती दिनों में स्थानीय स्तर पर ही उसका उपचार कराया जाता रहा, लेकिन अट्ठारह अगस्त को अचानक उसकी सेहत बद से बदतर हो गई। घबराए हुए परिजन उसे तत्काल हल्द्वानी के कई निजी चिकित्सालयों में लेकर दौड़े। वहां के चिकित्सकों ने उसकी नाज़ुक हालत को देखते हुए उसे दिल्ली के एलबीएस और एम्स अस्पताल के लिए रेफर कर दिया, जहां विशेषज्ञों ने यकृत यानी लिवर ट्रांसप्लांट की सख्त आवश्यकता बताई।

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रितेश के ताऊ बीएस जीना ने मीडिया को जानकारी दी कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का कुल खर्च एक करोड़ रुपये से भी अधिक बताया गया था, जिसे वह साधारण परिवार जुटाने में पूरी तरह असमर्थ था। रितेश के पिता उद्यान विभाग में उपनल कर्मी के रूप में अपनी सेवाएं देते हैं। इसके बाद उसे दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां शनिवार देर शाम उसने आखिरकार दम तोड़ दिया। बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने के दौरान संक्रमण उसके शरीर में इतना अधिक फैल चुका था कि लिवर के साथ उसके फेफड़े और किडनी ने भी काम करना बंद कर दिया था। घर के इकलौते चिराग के बुझ जाने से पूरे परिवार पर दुखों का भारी पहाड़ टूट पड़ा है।

दो मासूमों के सिर से उठा मां का साया, परिवार के पांच अन्य लोग भी चपेट में

इस त्रासदी का दूसरा दिल दहला देने वाला मामला ज्योलीकोट क्षेत्र की छब्बीस साल की नीमा जोशी से जुड़ा है। नीमा के पति नीरज जोशी वन विभाग में एक अस्थायी कर्मचारी हैं और उनकी गोद में चार और डेढ़ साल की दो बेहद छोटी बेटियां हैं। परिजनों के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में जब हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में उनकी जांच कराई गई, तो उनमें लिवर में संक्रमण और पीलिया की पुष्टि हुई। हालत अत्यंत नाजुक होने पर उन्हें उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित राममूर्ति अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। नीमा के इस तरह अचानक दुनिया से चले जाने से दोनों नन्हीं बच्चियों के सिर से मां का साया हमेशा के लिए उठ गया है। सबसे डराने वाली बात यह है कि मृतका के परिवार के पांच अन्य सदस्य भी इस समय इसी भयंकर पीलिया की बीमारी से पीड़ित हैं।

आठ गांवों में पांव पसार चुका है संक्रमण, घर-घर जाकर सर्वे में जुटे स्वास्थ्यकर्मी

ज्योलीकोट न्याय पंचायत के कुल बारह में से आठ गांव इस समय दूषित जल जनित बीमारियों की सीधी मार झेल रहे हैं। इनमें बेलवाखान, भल्यूटी, सड़ियाताल, छेड़ा, गंजा, चोपड़ा, कृष्णापुर और गेठिया जैसे इलाके शामिल हैं। इसके अलावा वीरभट्टी क्षेत्र में भी विशेष सतर्कता बरती जा रही है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पंत ने सभी आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों को घर-घर जाकर एक्टिव केस सर्च सर्वे चलाने के सख्त निर्देश दिए हैं।

  • घर-घर जांच: परिवार के प्रत्येक सदस्य के स्वास्थ्य की बारीकी से पड़ताल की जा रही है।
  • त्वरित रेफरल: बुखार, उल्टी या दस्त के लक्षण मिलते ही मरीज को फौरन पास की पीएचसी, एसडीएच या जिला अस्पताल भेजा जा रहा है।
  • एम्बुलेंस सेवा: गंभीर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 108 एंबुलेंस सेवा चौबीस घंटे तैनात रखी गई है।
  • राहत सामग्री: प्रभावित क्षेत्रों में लगातार घर-घर जाकर ओआरएस के पैकेट और जिंक की गोलियां वितरित की जा रही हैं।

प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भड़के ग्रामीण, पानी उबालकर पीने की सलाह

लगातार बिगड़ते हालातों और दो बहुमूल्य जिंदगियों के जाने के बाद स्थानीय ग्रामीणों में स्वास्थ्य एवं पेयजल विभाग के प्रति भारी आक्रोश देखा जा रहा है। ब्लॉक प्रमुख डॉ. हरीश बिष्ट ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जून के आखिरी हफ्ते में जब शुरुआती मामले सामने आने लगे थे, तब प्रशासन ने इस पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। समय रहते जल स्रोतों की साफ-सफाई और क्लोरीनेशन न किए जाने की वजह से यह साधारण डायरिया देखते ही देखते पीलिया के रूप में जानलेवा बन गया। दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग ने आम जनता से पुरजोर अपील की है कि वे पीने के पानी को हमेशा अच्छी तरह उबालकर ही इस्तेमाल करें, बासी या खुले में रखे हुए खानपान से परहेज करें, बार-बार साबुन से अपने हाथ धोएं और कोई भी लक्षण दिखते ही किसी भी तरह के अंधविश्वास या घरेलू नुस्खों के चक्कर में पड़ने के बजाय तुरंत सरकारी अस्पताल में अपनी जांच कराएं।

सवाल-जवाब

ज्योलीकोट क्षेत्र में यह स्वास्थ्य संकट किस वजह से फैला?
जून के आखिरी हफ्ते से पेयजल स्रोतों की उचित सफाई और क्लोरीनेशन न होने के कारण दूषित पानी पीने से यह संकट फैला।
इस संक्रमण की चपेट में आने से किन लोगों की मौत हुई है?
इस गंभीर संक्रमण के कारण 16 वर्षीय छात्र रितेश जीना और 26 वर्षीय युवा मां नीमा जोशी की मृत्यु हो गई है।
क्षेत्र में क्या कदम उठाए गए हैं?
सीएमओ डॉ. रश्मि पंत ने क्षेत्र में पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है और स्वास्थ्य कर्मियों को घर-घर सर्वे करने का निर्देश दिया है।
कितने गांव इस संक्रमण से प्रभावित हैं?
ज्योलीकोट न्याय पंचायत के 12 में से 8 गांव इस दूषित पानी जनित बीमारी की सीधी चपेट में हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने आम नागरिकों को क्या चेतावनी दी है?
विभाग ने लोगों को पानी उबालकर पीने, खुले और बासी खाद्य पदार्थों से बचने तथा तुरंत सरकारी अस्पताल में जांच कराने की सलाह दी है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 मिनट पहले

यह महज एक स्वास्थ्य आपदा नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर आपराधिक मामला है। दूषित जलापूर्ति से हुई इन मौतों की उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच होनी चाहिए। यदि जल संरक्षण और पाइपलाइन सुरक्षा में आपराधिक कोताही या भ्रष्टाचार साबित होता है, तो संबंधित जल संस्थान और दोषी अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियाँ न दोहराई जा सकें।

Rohan Verma@rohan-verma·3 मिनट पहले

यह त्रासदी केवल जलापूर्ति की विफलता नहीं, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर की दीर्घकालिक अनदेखी का परिणाम है। जब तक जल स्रोतों की नियमित क्लोरीनीकरण और पाइपलाइन लीकेज की मॉनिटरिंग को अनिवार्य कानूनी बाध्यता नहीं बनाया जाता, तब तक इस तरह के संकट ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जान लेते रहेंगे। स्वास्थ्य विभाग की यह इमरजेंसी घोषणा केवल तात्कालिक कदम है, असली चुनौती जल आपूर्ति तंत्र के ऑडिट और जवाबदेही तय करने की है।

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