पहाड़ी अंचल उत्तराखंड में आधुनिक जीवनशैली और नए दौर के मनोरंजन के बीच पारंपरिक कलाओं को संजोए रखना आसान नहीं रहा है। इसके बावजूद कुमाऊं क्षेत्र में कई ऐसे निष्ठावान लोक साधक मौजूद हैं जो पुरखों की विरासत को न केवल जिंदा रखे हुए हैं बल्कि उसी के दम पर अपनी गृहस्थी भी चला रहे हैं। अल्मोड़ा जिले के रहने वाले अभि राम इसी परंपरा की एक मजबूत मिसाल हैं। उन्होंने छोटी उम्र में जिस वाद्य यंत्र को कौतूहल और शौक के तौर पर हाथ में लिया था, वही हुड़का आज उनके परिवार के गुजर-बसर का मुख्य जरिया बन चुका है।
कुमाऊं और गढ़वाल की सांस्कृतिक आत्मा है हुड़का
उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन में हुड़का केवल एक ताल वाद्य नहीं, बल्कि समूची लोक परंपरा की रीढ़ माना जाता है। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही मंडलों में इसका विशेष सांस्कृतिक महत्व रहा है। यह आकार में छोटा और सुगठित वाद्य यंत्र होता है, जिसे कलाकार एक हाथ से थामकर दूसरे हाथ की उंगलियों और हथेली के सधे हुए प्रहार से बजाता है। पुराने समय से ही जागर गायकी, देवी-देवताओं के आह्वान, धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक उत्सवों में हुड़के की गूंज अनिवार्य हिस्सा रही है। पहाड़ी लोकगीतों के साथ जब हुड़के की लयबद्ध थाप जुड़ती है, तो वह पूरे परिवेश को एक अलौकिक और पारंपरिक रंग में रंग देती है।
पारंपरिक निर्माण और वादन की बारीकियां
हुड़का बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक शिल्प और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है। इसके मूल ढांचे को तैयार करने के लिए विशेष लकड़ी को तराशकर मध्य भाग से खोखला किया जाता है। इसके दोनों खुले सिरों पर प्राकृतिक चमड़े की महीन झिल्ली चढ़ाई जाती है। ध्वनि और ताल को नियंत्रित करने के लिए इस पर रस्सियों या मजबूत डोरियों का कसाव दिया जाता है। वादन के दौरान कलाकार रस्सी के तनाव को हाथ से घटाता-बढ़ाता है, जिससे अलग-अलग पिच और सुर निकलते हैं। उंगलियों और हथेली के संयुक्त तालमेल से निकलने वाली यह धुन वर्षों के कठिन अभ्यास और साधना के बिना संभव नहीं होती।
शौक से आजीविका तक का सफर
अभि राम के मुताबिक उनके संगीत सफर की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो गई थी। बचपन में खेल-खेल में शुरू हुआ यह अभ्यास धीरे-धीरे उनकी पहचान में तब्दील हो गया और आगे चलकर परिवार की रोटी का सहारा बना। आज वह कुमाऊं अंचल के प्रसिद्ध कौथिगों, स्थानीय मेलों, पर्वों और मांगलिक प्रसंगों में पहुंचकर हुड़का वादन करते हैं। उनकी प्रस्तुति शुरू होते ही पूरा मंच और दर्शक दीर्घा लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर हो जाती है। आधुनिक संगीत उपकरणों के उभार से पारंपरिक लोक कलाकारों के सामने मंच और आमदनी की चुनौतियां जरूर बढ़ी हैं, लेकिन पहाड़ी परंपराओं में आज भी हुड़के की मांग और प्रतिष्ठा कायम है।
बदलते दौर में सांस्कृतिक पहचान बचाने का संघर्ष
डिजिटल युग और आधुनिक वाद्य यंत्रों की चकाचौंध के बीच पहाड़ी लोक वाद्य धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं। ऐसे नाजुक दौर में अभि राम जैसे समर्पित कलाकार लोक संस्कृति की मशाल थामे खड़े हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक लंबा कालखंड हुड़के की संगत में बिताया है। उनकी उंगलियों की हर थाप में केवल तालबद्ध संगीत ही नहीं झलकता, बल्कि कुमाऊं की समृद्ध लोकगाथाएं, धार्मिक मान्यताएं और पहाड़ के गौरवशाली अतीत की जीवंत गूंज भी सुनाई देती है।





















