राजस्थान के जालौर जिले में स्थित भीनमाल शहर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और प्राचीन धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है। नगर के मध्य भाग में स्थित वराह श्याम मंदिर यहाँ की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र माना जाता है। लगभग छह शताब्दियों पुराने इस मंदिर का सीधा संबंध भगवान विष्णु के तीसरे अवतार यानी वराह रूप से है। वराह जयंती और अन्य प्रमुख धार्मिक पर्वों के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का बड़ा जमावड़ा देखने को मिलता है। मंदिर की अनोखी बनावट और यहाँ स्थापित भगवान वराह श्याम की भव्य प्रतिमा कला और संस्कृति के प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है।
पौराणिक कथा और वराह अवतार का महत्व
सनातनी परंपरा और हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान विष्णु के दशावतारों की कथाएं वर्णित हैं, जिनमें वराह अवतार को तीसरा स्थान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब पृथ्वी अनियंत्रित होकर जलमग्न हो गई थी, तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया था। उन्होंने जल में समाई पृथ्वी को अपने विशाल दांतों के सहारे सुरक्षित बाहर निकाला था। भीनमाल के इस मंदिर में भगवान विष्णु के उसी संकटमोचन और पृथ्वी रक्षक स्वरूप की नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। यही कारण है कि यह स्थल स्थानीय लोगों के लिए अपार धार्मिक महत्व रखता है।
जैसलमेर के पीले पत्थर से तराशी गई भव्य प्रतिमा की खासियत
मंदिर परिसर का सबसे मुख्य और अद्भुत आकर्षण यहाँ विराजमान भगवान वराह श्याम की आदमकद प्रतिमा है। करीब 8 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी यह दुर्लभ मूर्ति जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थर से तैयार की गई है। इस प्रतिमा में शिल्प कला का बेहतरीन नमूना देखने को मिलता है। भगवान वराह अपनी दाईं भुजा पर पृथ्वी देवी, जिन्हें मेदिनी भी कहा जाता है, को धारण किए हुए दिखाई देते हैं। मूर्ति के निचले हिस्से में चरणों के समीप नाग और नागिन का युगल उकेरा गया है। इसके अतिरिक्त, मुख्य प्रतिमा के आसपास इंद्राणी और नारद मुनि की आकृतियाँ भी स्थापित हैं। मंदिर की दीवारों और बाहरी परिसर में शेषशायी विष्णु, चक्रधारी विष्णु तथा विभिन्न यक्ष देवी-देवताओं की दुर्लभ मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं, जो इसे एक ऐतिहासिक कलाकृति का दर्जा देती हैं।
नगर की शांति और सामाजिक समरसता का प्रतीक
इस ऐतिहासिक मंदिर के प्रबंधन से जुड़े वराह श्याम मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्याम खेतावत ने बताया, "भगवान वराह श्याम से भीनमाल वासियों की अगाध आस्था जुड़ी हुई है और उन्हीं की कृपा से नगर में सुख-समृद्धि कायम रहती है।" यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भीनमाल की सामाजिक एकता की भी मिसाल है। यहाँ वर्षभर कई बड़े आयोजन किए जाते हैं, जिनमें वराह जयंती, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और देवझूलनी ग्यारस प्रमुख हैं। इन उत्सवों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भीनमाल नगर के सभी 36 समाजों के लोग मिलकर इन आयोजनों में भाग लेते हैं और आपसी भाईचारे के साथ धार्मिक मेलों का संचालन करते हैं।



















