उत्तराखंड के पर्वतीय ग्रामीण अंचलों में कृषि का कामकाज आज भी प्राचीन और पारंपरिक शैलियों पर ही निर्भर बना हुआ है। खेतों से फसल की कटाई के लिए यहां की महिलाएं बरसों से दराती का ही उपयोग करती चली आ रही हैं। गेहूं, धान, मंडुवा और झंगोरा जैसी तमाम प्रमुख फसलों की कटाई में दराती सबसे बड़ा साधन साबित होती है। इसके अलावा मवेशियों के वास्ते हरी घास जुटाने के लिए भी इसी छोटे से औजार का सहारा लिया जाता है। सुबह तड़के ही ग्रामीण इलाकों की महिलाएं हाथ में दराती थामकर सीढ़ीनुमा खेतों की तरफ रुख करती हैं और घंटों परिश्रम कर फसल समेटती हैं। हालांकि आज कृषि क्षेत्र में आधुनिक मशीनों का दौर आ चुका है, फिर भी पहाड़ी भूगोल के चलते यहां दराती की अनिवार्यता आज भी बरकरार है।
बागेश्वर क्षेत्र के स्थानीय वासी किशन मलड़ा बताते हैं कि पर्वतीय प्रदेशों की कृषि योग्य भूमि मैदानी भागों की तरह बिल्कुल समतल नहीं होती है। यहां के अधिकांश खेत सीढ़ीनुमा यानी टे,स जैसे होते हैं और उनका कुल क्षेत्रफल भी काफी सीमित होता है। ऐसे छोटे और विषम खेतों तक भारी-भरकम कृषि मशीनों को पहुंचाना तथा उनका संचालन करना बेहद कठिन कार्य है। खेतों के बीच से गुजरने वाले तंग रास्ते और तीखी ढलानें मशीनों के आने-जाने में भारी बाधा उत्पन्न करती हैं। यही मुख्य वजह है कि पर्वतीय अंचल के किसान परिवार आज भी अपने खेतों के अधिकांश कार्य पारंपरिक रूप से हाथों के माध्यम से ही पूरे करते हैं। फसल की कटाई के संदर्भ में दराती एक ऐसा उपयोगी उपकरण है जिसे इन कठिन परिस्थितियों वाले खेतों में बड़ी सुगमता से चलाया जा सकता है।
पहाड़ी बस्तियों और गांवों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी खेती-किसानी से लेकर पशुपालन तक रीढ़ की हड्डी समान रही है। खेतों में लहलहाती फसल काटना, जंगलों और पहाड़ों से मवेशियों के लिए घास लाना और अन्य कृषि कार्यों को संभालना महिलाओं की दिनचर्या का अहम हिस्सा है। आज के समय में भी ग्रामीण परिवेश में महिलाएं दराती लेकर खेतों में श्रम करती हुई आसानी से देखी जा सकती हैं। सुबह घर-गृहस्थी के तमाम आवश्यक कार्य niptane के बाद वे खेतों का रुख करती हैं। वहां वे अपने हाथों से फसलों को काटने के साथ-साथ पशुधन के लिए चारे का भी पूरा बंदोबस्त करती हैं। यही कारण है कि दराती उनके दैनिक जीवन और कामकाज का एक अत्यंत अनिवार्य साधन बनी हुई है।
उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में मंडुवा और झंगोरा जैसी पारंपरिक फसलें आज भी बड़े पैमाने पर उपजाई जाती हैं। जब इन परंपरागत फसलों की कटाई का समय आता है, तब दराती का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इसी प्रकार गेहूं और धान की पकी हुई फसलों को समेटने के लिए भी तमाम ग्रामीण परिवार पूरी तरह से हाथ के इन पारंपरिक औजारों पर ही टिके हुए हैं। पहाड़ों की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यहां खेत बेहद छोटे और आपस में दूर-दूर बिखरे होते हैं, जिसके कारण हर छोटे-बड़े खेत तक किसी भी प्रकार की मशीन को ले जाना संभव नहीं हो पाता। ऐसी विवशता में किसान केवल दराती के बूते ही अपनी फसल की कटाई का काम पूरा करते हैं। यह श्रमसाध्य जरूर है, किंतु पर्वतीय कृषि व्यवस्था में इसकी उपयोगिता आज भी अडिग है।
पहाड़ी गांवों में दराती का उपयोग केवल फसल काटने तक ही सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह पशुपालन से जुड़े परिवारों के लिए भी बेहद कारगार औजार है। मवेशी पालने वाले ग्रामीण परिवारों की महिलाएं जंगल के रास्तों, खेतों की सीमाओं और आसपास के जंगली इलाकों से घास काटकर अपने सिर पर लादकर घर लाती हैं। विशेष तौर पर बरसात के मौसम और कड़ाके की ठंड शुरू होने से ठीक पहले पशुओं के वास्ते पूरे साल का चारा सुरक्षित करने में दराती की आवश्यकता बहुत अधिक बढ़ जाती है। इस औजार का आकार छोटा होने के कारण इसे अपने साथ कहीं भी ले जाना बेहद सुविधाजनक होता है। पहाड़ों की जोखिम भरी ढलानों और बेहद संकरे रास्तों के बीच भी इससे घास की कटाई बहुत आसानी से की जा सकती है।
इन तमाम पारंपरिक तौर-तरीकों के बीच अब ग्रामीण इलाकों में आधुनिक कृषि यंत्रों की जानकारी और उनका चलन धीरे-धीरे पैर पसार रहा है। क्षेत्र के कई प्रगतिशील किसान अपने श्रम और समय की बचत करने के उद्देश्य से छोटे कृषि उपकरणों का उपयोग भी करने लगे हैं। इन सब बदलावों के बावजूद पहाड़ी अंचलों में दराती का वास्तविक महत्व जरा भी कम नहीं हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यहां के खेतों की अनूठी भौगोलिक स्थिति है, जो मशीनीकरण में बाधा बनती है। इसके अतिरिक्त दूसरी बड़ी व्यावहारिक वजह यह है कि हर साधारण किसान के लिए बाजार से महंगी मशीनें खरीदना या उन्हें किराए पर लेकर चलाना आर्थिक रूप से संभव नहीं होता है। ऐसे में छोटे और बिखरे खेतों में केवल हाथ से ही काम करना सबसे अधिक व्यावहारिक और किफायती साबित होता है।
दराती महज एक साधारण कृषि उपकरण भर नहीं है, बल्कि यह पर्वतीय ग्रामीण संस्कृति और जीवनशैली की एक अनूठी पहचान है। खेतों के बीच मेहनत करती हुई महिलाओं के हाथों में चमकती दराती पहाड़ के कठिन परिश्रम और उनकी आत्मनिर्भरता की जीवंत तस्वीर पेश करती है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के तहत महिलाएं इसी प्रकार खेती और पशुपालन के क्षेत्र में अपने परिवार का संबल बनती आई हैं। हालांकि आधुनिक दौर में रोजगार और उच्च शिक्षा की तलाश में युवा पीढ़ी गांवों से पलायन कर शहरों का रुख कर रही है, इसके बावजूद ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक कृषि का सिलसिला बदस्तूर जारी है। जब भी फसल पककर तैयार होती है, खेतों में दराती चलाती हुई महिलाओं की आकृतियां पहाड़ की आबोहवा में साफ नजर आती हैं।
उत्तराखंड के बागेश्वर जैसे पर्वतीय जनपदों में खेती-किसानी के तौर-तरीके समय के साथ बेशक बदल रहे हैं, लेकिन पुश्तैनी औजारों की जरूरत और प्रासंगिकता आज भी समाप्त नहीं हुई है। जिन इलाकों में भूमि समतल और बड़ी है, वहां आधुनिक मशीनों का प्रयोग भले ही सुगम हो, लेकिन पहाड़ी गांवों के अत्यंत छोटे और सीढ़ीनुमा खेतों में आज भी हाथ के औजारों का कोई विकल्प नहीं है। फसल की कटाई से लेकर पालतू पशुओं के वास्ते चारा इकट्ठा करने तक ग्रामीण परिवार आज भी पूरी तरह दराती पर ही निर्भर रहते हैं। इसी वजह से तकनीकी रूप से बदलते इस आधुनिक दौर में भी पहाड़ों की पारंपारिक कृषि व्यवस्था में दराती ने अपनी मजबूत जगह कायम रखी है।





















