वियतनाम के 81वें राष्ट्रीय दिवस के पावन अवसर पर उत्तर कोरिया और वियतनाम के बीच कूटनीतिक रिश्तों को एक नई दिशा देने की कोशिश तेज हो गई है। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन ने वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम को एक विशेष कूटनीतिक पत्र प्रेषित किया है। इस पत्राचार के माध्यम से किम जोंग-उन ने दोनों देशों के मध्य दशकों पुरानी आत्मीयता, पारस्परिक विश्वास और रणनीतिक सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की अपनी दृढ प्रतिबद्धता व्यक्त की है। उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए द्वारा सार्वजनिक किए गए इस पत्र के बाद से अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का ध्यान प्योंगयांग और हनोई के बीच तेजी से प्रगाढ़ होते संबंधों पर टिक गया है।
द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प
सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन ने अपने पत्र में इस बात पर विशेष बल दिया है कि पिछले वर्ष अक्टूबर महीने में प्योंगयांग में आयोजित द्विपक्षीय शिखर बैठक के दौरान जिन महत्वपूर्ण सहमतियों पर मुहर लगी थी, यह नया कूटनीतिक कदम उन्हीं फैसलों को आगे बढ़ाने का एक प्रभावी जरिया है। उस समय राष्ट्रपति तो लाम और किम जोंग-उन के बीच जिन रणनीतिक विषयों पर सहमति बनी थी, दोनों देश अब उन्हें धरातल पर उतारने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरिया और वियतनाम अपने ऐतिहासिक संबंधों को आधुनिक दौर की आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्जीवित करने के लिए एक सुव्यवस्थित रणनीति के तहत कदम बढ़ा रहे हैं।
अक्टूबर 2025 का ऐतिहासिक दौरा और उच्च स्तरीय बैठकों का सिलसिला
दोनों राष्ट्रों के आपसी कूटनीतिक इतिहास में अक्टूबर 2025 का समय एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा। उस दौरान वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम ने उत्तर कोरिया की आधिकारिक यात्रा की थी। यह दौरा इस दृष्टिकोण से ऐतिहासिक था क्योंकि पिछले 18 वर्षों के लंबे समयांतराल में किसी भी शीर्ष वियतनामी राष्ट्राध्यक्ष की यह पहली प्योंगयांग यात्रा थी। इस उच्च स्तरीय मुलाकात ने दोनों देशों के बीच वर्षों से बंद पड़े औपचारिक संवाद के रास्तों को दोबारा खोल दिया, जिसके पश्चात कूटनीतिक स्तर पर बैठकों और संपर्कों की गति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इसी संवाद श्रृंखला के अंतर्गत, इस वर्ष मई महीने में वियतनाम के विदेश मंत्री ले होआई चुंग ने उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग का आधिकारिक दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने उत्तर कोरिया की विदेश मंत्री चो सोन-हुई के साथ द्विपक्षीय हितों, क्षेत्रीय परिस्थितियों और साझा सहयोग से जुड़े विविध मुद्दों पर अत्यंत विस्तार से विचार-विमर्श किया। इसके ठीक बाद जून महीने में दोनों देशों के वरिष्ठ सुरक्षा मंत्रियों की एक महत्वपूर्ण बैठक प्योंगयांग में संपन्न हुई। इस बैठक में मुख्य रूप से सार्वजनिक सुरक्षा, आंतरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच तकनीकी और रणनीतिक तालमेल को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
कूटनीतिक अलगाव से बाहर निकलने की कोशिश और ऐतिहासिक धरातल
उत्तर कोरिया और वियतनाम के बीच बने आत्मीय संबंधों का इतिहास काफी गहरा और ऐतिहासिक है। दोनों देशों के बीच वैचारिक समानताएं और कठिन दौर में एक-दूसरे के प्रति प्रदर्शित की गई एकजुटता इस रिश्ते की मुख्य ताकत रही है। यद्यपि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों, क्षेत्रीय संकटों और वैश्विक प्रतिबंधों के कारण बीते कुछ वर्षों में प्योंगयांग और हनोई के बीच औपचारिक संपर्क सीमित हो गए थे, परंतु अब दोनों ही सरकारें इस साझेदारी के रणनीतिक महत्व को नए सिरे से समझ रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने और पश्चिमी देशों द्वारा बनाए गए कूटनीतिक दबाव से बाहर निकलने के उद्देश्य से उत्तर कोरिया अपने पुराने और परखे हुए मित्र राष्ट्रों के साथ रिश्ते प्रगाढ़ करने को प्राथमिकता दे रहा है। सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन का यह पत्र साफ संकेत प्रदान करता है कि आने वाले दिनों में उत्तर कोरिया और वियतनाम के बीच न केवल राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर, बल्कि आर्थिक तथा सुरक्षा के स्तर पर भी सहयोग अधिक प्रगाढ़ और व्यापक होने वाला है।
वियतनाम और अमेरिका के संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दूसरी तरफ, वियतनाम और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच के संबंधों का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। लंबे समय तक फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के अधीन रहने के बाद, वियतनाम ने वर्ष 1945 में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता हो ची मिन्ह के नेतृत्व में अपनी स्वाधीनता की घोषणा की थी। हालांकि, वर्ष 1954 के जेनेवा समझौते के पश्चात देश को अस्थायी रूप से दो भागों में विभाजित कर दिया गया, जिसमें उत्तर में हो ची मिन्ह की साम्यवादी सरकार और दक्षिण में गैर-साम्यवादी शासन की स्थापना हुई।
एशिया महाद्वीप में साम्यवाद के प्रभाव को रोकने के ध्येय से अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम को व्यापक सैन्य और वित्तीय समर्थन देना शुरू किया। इसके विपरीत, उत्तर वियतनाम और वियत कांग लड़ाकों को सोवियत संघ तथा चीन से बड़ा समर्थन मिल रहा था। वर्ष 1964 में घटी टोंकिन की खाड़ी की घटना के बाद अमेरिका ने इस संघर्ष में बड़े पैमाने पर अपनी सेनाएं उतारीं और उत्तरी क्षेत्रों में भीषण बमबारी का दौर शुरू किया। यह युद्ध दोनों पक्षों के लिए अत्यंत क्रूर साबित हुआ, जिसमें लाखों लोगों की जान गई और भारी जनहानि हुई।
युद्ध की विभीषिका के कारण अमेरिकी जनता के भीतर भारी आक्रोश व्याप्त हुआ, जिससे वहां युद्ध विरोधी व्यापक प्रदर्शन शुरू हो गए। अंततः, वर्ष 1973 में हुए पेरिस शांति समझौते के बाद अमेरिकी सेनाओं की वियतनाम से पूरी तरह वापसी हुई। युद्ध के बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच संबंध पूरी तरह विच्छेद रहे। हालांकि, 1990 के दशक में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा शुरू किए गए राजनयिक प्रयासों के बाद वाशिंगटन और हनोई के रिश्ते सामान्य हो पाए। वर्तमान समय में दोनों देशों के बीच पुरानी शत्रुता समाप्त हो चुकी है और वे आपसी सहयोग एवं व्यापारिक साझेदारी के नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं।



















