पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में कोजागरी लक्ष्मी पूजा के अवसर पर एक परिवार ने अनूठी मिसाल पेश की है। शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर जहां अमूमन घरों और पंडालों में मां लक्ष्मी की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर आराधना की जाती है, वहीं कृष्णगंज के शिवनिवास हलदरपाड़ा इलाके में रहने वाले एक दंपती ने अपनी आठ वर्षीय बेटी को ही देवी स्वरूप मानकर उसकी विधिवत पूजा-अर्चना की। यह कदम केवल पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे समाज में बेटियों को बराबरी का दर्जा दिलाने, महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने और हाल की हिंसक घटनाओं के बीच बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का गहरा सामाजिक संदेश छिपा हुआ था।
मिट्टी की पारंपरिक प्रतिमा के स्थान पर बेटी का देवी रूप में वंदन
नदिया के कृष्णगंज ब्लॉक अंतर्गत शिवनिवास हलदरपाड़ा निवासी देबाशीष विश्वास और उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मी विश्वास ने इस वर्ष कोजागरी लक्ष्मी पूजा को एक अलग रूप में मनाने का संकल्प लिया। दंपती ने अपनी आठ साल की नन्हीं बेटी श्रुति को मां लक्ष्मी की भांति पारंपरिक वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित किया। इसके बाद बालिका को पूजा के लिए निर्धारित एक विशेष आसन पर आसीन कराया गया। घर पर स्थानीय पुजारी को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने पूर्ण विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ बच्ची को देवी मानकर अनुष्ठान संपन्न कराया। जब आसपास के ग्रामीणों और पड़ोसियों को इस अनोखे आयोजन की जानकारी मिली, तो वे भी इस दृश्य को देखने विश्वास परिवार के आवास पर पहुंचे। इस पहल ने समूचे इलाके में चर्चा बटोरी और लोगों ने इसे लैंगिक भेदभाव समाप्त करने की दिशा में एक सशक्त पहल माना।
हाल की घटनाओं और महिला सुरक्षा पर परिवार की गहरी चिंता
विश्वास दंपती का यह कदम राज्य के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हुई गंभीर अपराधों की पृष्ठभूमि में सामने आया है। कोलकाता स्थित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ घटित जघन्य हत्याकांड, कुलतली में उमा के साथ हुआ दुष्कर्म और हत्या, तथा कृष्णानगर में लक्ष्मी पूजा के ही दिन एक युवती के साथ बर्बरता, दुष्कर्म और उसके बाद शव को जला दिए जाने जैसी घटनाओं ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इन घटनाओं से महिलाओं की हिफाजत और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं। ऐसे तनावपूर्ण और चिंताजनक परिवेश में देबाशीष और लक्ष्मी विश्वास ने अपनी पुत्री की पूजा कर यह सार्वजनिक आग्रह किया कि बेटियों को कमतर आंकने की मानसिकता को त्यागना होगा और समाज को महिलाओं की सुरक्षा व गरिमा के प्रति संवेदनशील बनना होगा।
दंपती का आह्वान: हर घर में बेटियों को मिले देवी समान आदर
श्रुति की माता लक्ष्मी विश्वास का कहना है कि प्रत्येक परिवार को अपनी संतान, विशेषकर बेटी को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप मानना चाहिए। उनका मानना है कि महिलाएं सृष्टि में मातृशक्ति की आधारशिला हैं और उन्हें अपनी पुत्री का इस पावन रूप में वंदन करने पर गर्व महसूस हो रहा है। वहीं पिता देबाशीष विश्वास ने साझा किया कि बेटी के आगमन के बाद से उनके पारिवारिक जीवन में उल्लेखनीय सकारात्मक परिवर्तन और सुधार आया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुत्र और पुत्री में किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जाना चाहिए और दोनों को समान अवसर व आदर मिलना आवश्यक है। परिवार का यह प्रयास इसी समानतावादी सोच को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का माध्यम बना।
पुरोहित का समर्थन और संघर्षरत युवाओं के लिए विशेष प्रार्थना
इस धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न कराने वाले स्थानीय पुरोहित तरुण बनर्जी ने विश्वास परिवार के इस कदम को समाज में चेतना जागृत करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि कन्याएं मां का ही रूप होती हैं और यदि उन्हें स्नेह, सम्मान तथा बराबरी के साथ बड़ा किया जाए तो इसका दूरगामी असर आने वाली पीढ़ियों के दृष्टिकोण पर पड़ेगा। पूजा के दौरान देबाशीष विश्वास ने सामाजिक उत्तरदायित्व का परिचय देते हुए उन योग्य युवाओं के लिए भी विशेष प्रार्थना की, जिन्होंने किसी कारणवश अपनी नौकरियां खो दी हैं। उन्होंने अपने अधिकारों और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के जीवन में पुनः स्थिरता, समृद्धि और खुशहाली लौटने की ईश्वर से कामना की।
त्योहारों से आगे बढ़कर दैनिक जीवन में समानता की पुकार
विश्वास परिवार के इस आयोजन को प्रत्यक्ष देखने पहुंचे स्थानीय निवासियों ने दंपती के इस दृष्टिकोण की सराहना की। परिवार को पूरा विश्वास है कि इस तरह के प्रयासों से बेटियों के प्रति समाज के नजरिए में बुनियादी बदलाव आएगा और बच्चों तथा महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी। दंपती ने रेखांकित किया कि बेटियों को आदर देना केवल साल में एक दिन किसी पर्व, उत्सव या धार्मिक रीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रोजमर्रा के पारिवारिक व सामाजिक जीवन में भी उन्हें पूरी बराबरी, सुरक्षा और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।


















