नई दिल्ली घोषणापत्र 2026 को सिर्फ 45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले एक आम कूटनीतिक दस्तावेज के रूप में देखना इसकी वास्तविक अहमियत को कम करके आंकना होगा। वास्तव में, यह दस्तावेज पिछले आधा दशक में BRICS समूह की बदलती प्राथमिकताओं और इसकी वैचारिक यात्रा का एक विस्तृत लेखा-जोखा है। साल 2021 में जहां इस समूह का पूरा ध्यान कोरोना महामारी के बाद आर्थिक-सामाजिक सुधारों, स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग और डिजिटल विकास पर केंद्रित था, वहीं 2026 तक आते-आते इसके एजेंडे में काफी बड़ा बदलाव आया है। आज यह समूह आतंकवाद, सैन्य संघर्षों, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, परमाणु प्रतिष्ठानों के संरक्षण, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान प्रणालियों के विकास, वैश्विक सप्लाई चेन की मजबूती और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियमन जैसे अत्यंत गंभीर मुद्दों पर बात कर रहा है।
यह नया घोषणापत्र स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि समय के साथ समूह की भाषा और कूटनीति में कितना बदलाव आया है। साल 2025 में जारी हुए रियो घोषणापत्र की तुलना में इस नए दस्तावेज की भाषा कहीं अधिक संतुलित और व्यावहारिक नजर आती है। इससे यह साफ हो जाता है कि BRICS अब केवल वैश्विक मुद्दों पर बड़े-बड़े साझा बयान जारी करने वाला एक मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह सदस्य देशों के बीच आर्थिक, वित्तीय और सामरिक सहयोग के लिए मजबूत और व्यावहारिक प्रणालियां बनाने की दिशा में सक्रियता से कदम बढ़ा रहा है।
आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता
इस नई दिल्ली घोषणापत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आतंकवाद से जुड़ा हुआ है, जिसे भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। इस दस्तावेज में 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए बेहद कायराना आतंकवादी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई है। इस भीषण हमले में आतंकवादियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की बेरहमी से जान ले ली थी। इस वैश्विक मंच से इस हमले की सीधी निंदा होना भारत के आतंकवाद विरोधी रुख को मजबूत करता है।
कूटनीतिक रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि इस घोषणापत्र में पाकिस्तान का सीधे तौर पर नाम शामिल नहीं किया गया है। इसके बावजूद, इसमें सीमा पार से होने वाले आतंकवाद, आतंकी संगठनों को मिलने वाली वित्तीय मदद यानी टेरर फंडिंग और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराने वाले देशों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करने की जरूरत पर विशेष बल दिया गया है। समूह ने अपने इस साझा रुख को फिर से दोहराया है कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इसके साथ ही, आतंकवाद का समर्थन करने वाले नेटवर्क को पूरी तरह तबाह करने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने की प्रतिबद्धता जताई गई है। यह संदेश उन सभी देशों के लिए बेहद स्पष्ट है जो आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति के रूप में बढ़ावा देते रहे हैं।
2021 से 2026 तक: समूह की दिशा में आया बड़ा बदलाव
इस समूह के वर्तमान स्वरूप और इसकी कूटनीतिक समझ को बेहतर ढंग से समझने के लिए पिछले छह वर्षों के इसके सफर का बारीकी से विश्लेषण करना जरूरी है। यह सफर दिखाता है कि कैसे वैश्विक परिस्थितियों के बदलने के साथ इस संगठन ने अपनी प्राथमिकताओं को नया आकार दिया है।
2021: वैश्विक महामारी से उबरने का दौर
साल 2021 में पूरी दुनिया कोरोना वायरस महामारी के संकट से जूझ रही थी। इस दौरान भारत की अध्यक्षता में आयोजित बैठकों में BRICS का पूरा ध्यान स्वास्थ्य संकट से निपटने, आर्थिक सुधारों को तेज करने, सामाजिक सुरक्षा को बेहतर बनाने, डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने पर केंद्रित था। इसी साल आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए एक विशेष आतंकवाद रोधी कार्ययोजना को भी स्वीकार किया गया था। इस दौर में समूह का प्राथमिक उद्देश्य इसके पांच संस्थापक देशों के बीच आपसी सहयोग को मजबूत करना था।
2022: युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट की शुरुआत
साल 2022 आते-आते वैश्विक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया, जिससे अचानक खाद्य और ऊर्जा संकट गहरा गया। इस दौरान जारी किए गए बीजिंग घोषणापत्र में इन संकटों से निपटने के उपायों पर विशेष चर्चा की गई। इसी समय IMF और विश्व बैंक जैसी पारंपरिक वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग तेज होने लगी ताकि विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंचों पर अधिक महत्व मिल सके। यहीं से इस समूह ने खुद को ग्लोबल साउथ के हितों के संरक्षक के रूप में मजबूती से स्थापित करना शुरू कर दिया।
2023: विस्तार की मजबूत नींव
जोहान्सबर्ग में हुए 2023 के शिखर सम्मेलन को इस समूह के इतिहास में एक मील के पत्थर के रूप में याद किया जाएगा। इस बैठक में समूह के विस्तार का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इसका उद्देश्य यह संदेश देना था कि यह संगठन केवल कुछ चुनिंदा देशों का क्लब नहीं है, बल्कि यह दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की एक सशक्त आवाज बन रहा है। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी वैश्विक संस्थाओं में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती ताकतों की भूमिका बढ़ाने के प्रयासों का पुरजोर समर्थन किया गया।
2024: कजान में बहुध्रुवीय दुनिया की नई तस्वीर
साल 2024 में कजान शिखर सम्मेलन के दौरान समूह के विस्तार की योजना धरातल पर उतरी। ईरान, UAE, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे नए देशों के शामिल होने से इस संगठन का रणनीतिक ढांचा पूरी तरह बदल गया। नए सदस्यों के बीच कई तरह के क्षेत्रीय और राजनीतिक मतभेद थे, जो समूह के सामने एक नई चुनौती लेकर आए। इस दौर में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने, सीमा पार भुगतान प्रणालियों को सरल बनाने, वित्तीय सुधारों को लागू करने और एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ सुरक्षात्मक कदम उठाने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई।
2025: रियो में राजनीतिक रुख हुआ स्पष्ट
ब्राजील के रियो में हुए 2025 के सम्मेलन के घोषणापत्र में समूह का राजनीतिक दृष्टिकोण पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक और स्पष्ट दिखाई दिया। इस घोषणापत्र में ईरान पर हुए सैन्य हमलों की सीधी निंदा की गई और परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई। इसके अलावा, आर्थिक सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग, सीमा पार लेनदेन को बढ़ावा देने और वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों को आगे बढ़ाया गया।
2026: नई दिल्ली में संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति
साल 2026 के इस नई दिल्ली घोषणापत्र में कूटनीति का एक नया और परिपक्व रूप देखने को मिलता है। साल 2025 में जहां ईरान पर हुए हमलों के लिए सीधे तौर पर नाम लेकर निंदा की गई थी, वहीं इस बार किसी भी देश का सीधा नाम लेने से परहेज किया गया है। अमेरिका या ईरान का नाम लिए बिना, इस घोषणापत्र में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की गई है और सभी पक्षों से शांति, संयम और कूटनीतिक बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की गई है।
यह कूटनीतिक बदलाव समूह की विस्तृत सदस्यता और सदस्यों के विभिन्न हितों को ध्यान में रखकर किया गया है। वर्तमान में पश्चिम एशिया के कई महत्वपूर्ण देश इस समूह का हिस्सा हैं, जिनके अपने अलग-अलग रणनीतिक हित हैं। ऐसी स्थिति में समूह ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय व्यापक अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों पर सहमति बनाने को प्राथमिकता दी है, जिससे इसकी वैश्विक स्वीकार्यता और मजबूत हुई है।



















