अफ्रीकी महाद्वीप में अब तक के सबसे घातक और तेजी से फैलते इबोला प्रकोप से जूझ रहे कांगो में एक बड़ा वित्तीय विवाद सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं की ओर से भेजे गए करीब 700 मिलियन डॉलर (लगभग 70 करोड़ डॉलर) के मानवीय राहत फंड का कोई पुख्ता लेखा-जोखा नहीं मिल पा रहा है। इस भारी अनियमितता को लेकर अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (अफ्रीका सीडीसी) और कांगो की सरकार ने सीधे तौर पर उन अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय राहत संगठनों से जवाब मांगा है जो जमीन पर राहत कार्यों का संचालन कर रहे हैं। यह संकट ऐसे समय में गहराया है जब यह खतरनाक वायरस कांगो के आठ प्रांतों में अपने पैर पसार चुका है और पड़ोसी देशों युगांडा तथा केन्या की सीमाओं को भी पार कर चुका है।
सहायता राशि का बड़ा हिस्सा कागजों में गायब
अफ्रीका सीडीसी के महानिदेशक डॉ. जीन कसेया ने हाल ही में सार्वजनिक किए गए वित्तीय आंकड़ों में बताया कि जब से इस महामारी की घोषणा हुई है, तब से अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं द्वारा कुल 962 मिलियन डॉलर की सहायता राशि जारी की जा चुकी है। हालांकि, जमीन पर काम करने वाले संगठनों के पास केवल 200 मिलियन डॉलर के करीब का ही हिसाब मौजूद है। बाकी बचे हुए लगभग 700 मिलियन डॉलर की राशि कहां खर्च हुई या उसका क्या हुआ, इसका कोई विस्तृत रिकॉर्ड सरकार या शीर्ष स्वास्थ्य निकाय को नहीं सौंपा गया है।
कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राहत कार्यों में जुटी संस्थाओं की एक विशेष बैठक बुलाई थी। इस बैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनिसेफ और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम जैसी संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख एजेंसियों के अलावा सेव द चिल्ड्रन और मेडिसिन्स डू मोंडे जैसे अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों को आमंत्रित किया गया था। डॉ. जीन कसेया के अनुसार, बैठक के लिए अधिकृत कुल संगठनों में से केवल एक-तिहाई प्रतिनिधि ही वित्तीय ब्योरे के साथ वहां पहुंचे।
बैठक में शामिल होने वाले संगठनों ने पुष्टि की कि उन्हें कुल 228 मिलियन डॉलर की राशि मिली थी। इनमें से उन्होंने 127 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं, जबकि लगभग 100 मिलियन डॉलर की धनराशि अभी भी उनके पास उपलब्ध है। शेष दो-तिहाई संस्थाओं द्वारा कोई विवरण न दिए जाने के कारण संपूर्ण वित्तीय परिदृश्य की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आ सकी है। अफ्रीका सीडीसी ने इस पर सख्त आपत्ति जताते हुए कहा कि वित्तीय पारदर्शिता की यह भारी कमी सरकारी स्तर पर संसाधनों के आकलन और वास्तविक परिणामों की समीक्षा को पूरी तरह बाधित कर रही है।
कांगो सरकार का कड़ा रुख और संस्थाओं पर कार्रवाई
वित्तीय अनियमितताओं का यह मामला सामने आने के बाद कांगो के प्रशासन ने यह साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि सीधे तौर पर देश के सरकारी खजाने में जमा नहीं की जाती। इसके बजाय, यह पैसा सीधे तौर पर स्वतंत्र एजेंसियों, गैर-सरकारी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के निकायों को हस्तांतरित किया जाता है। कांगो के संचार मंत्री पैट्रिक मुयाया ने स्पष्ट किया कि जब तक हर एक भागीदार संगठन पाई-पाई का हिसाब और अपने खर्च की योजनाओं का विवरण साझा नहीं करता, तब तक पूरी पारदर्शिता हासिल नहीं की जा सकती।
कांगो के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल रोजर कंबा ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राहत एजेंसियों के संचालन पर कड़े प्रतिबंध लागू करने की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि पूर्व में अधिकृत लगभग 100 संगठनों में से अब केवल 25 चुनिंदा एजेंसियों को ही मान्यता दी गई है। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जमीन पर काम करने वाली हर संस्था को यह बताना होगा कि उसे किस दानदाता से कितना फंड मिला और वह उस धन का उपयोग किस प्रकार की योजनाओं में कर रही है। अफ्रीका सीडीसी और कांगो के अधिकारी अब लापता 700 मिलियन डॉलर की पड़ताल के लिए संयुक्त जांच में जुटे हैं।
स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल और स्थानीय आबादी में गुस्सा
इस बड़े वित्तीय घपले की खबरों ने पूर्वी कांगो के स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। पिछले कुछ हफ्तों से अग्रिम मोर्चे पर तैनात स्वास्थ्य कर्मी वेतन न मिलने, घोषित प्रोत्साहन राशि से वंचित रखे जाने और असुरक्षित कार्य स्थितियों के विरोध में हड़ताल कर रहे हैं। संक्रमण के खतरे के बीच दिन-रात काम करने वाले इन कर्मचारियों का कहना है कि अरबों डॉलर की घोषणाओं के बावजूद उन्हें बुनियादी सुविधाएं और उनका हक नहीं दिया जा रहा है।
प्रकोप के केंद्र बूनिया में सेवाएं दे रहे नर्स प्रिंस बहाती ने कहा कि ऐसे हालात कतई स्वीकार्य नहीं हैं और संसाधनों के प्रबंधन में सख्त निगरानी के साथ पूरी स्पष्टता लाई जानी चाहिए। वहीं बूनिया के स्थानीय निवासी अनिसेट काकुले ने राहत कार्यों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि समुचित देखभाल न मिलने के कारण उनके एक दोस्त ने इबोला उपचार केंद्र में दम तोड़ दिया। काकुले ने कहा कि राहत के नाम पर इतनी विशाल धनराशि की बात सुनकर लोगों को यह विश्वास होने लगता है कि कई गैर-सरकारी संगठनों के लिए यह बीमारी एक कारोबार बन चुकी है। उन्होंने मांग की कि राहत कोष का प्रबंधन सरकार और डब्ल्यूएचओ जैसे साझेदारों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
घातक वायरस और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी
कांगो में यह प्रकोप मई के मध्य में घोषित किया गया था, जो अब तक का सबसे घातक दौर साबित हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, संक्रमण के कम से कम 9,400 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 4,500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हाल ही में यह बीमारी उत्तरी कांगो के आठवें प्रांत तक फैल गई। इसके अलावा वायरस की दस्तक पड़ोसी देशों में भी हुई, जहां युगांडा ने संक्रमण को नियंत्रित कर खुद को मुक्त घोषित किया, जबकि केन्या में पिछले सप्ताह सातवां मामला सामने आया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट दुर्लभ बुंदिबुग्यो वायरस के कारण उत्पन्न हुआ है। इस विशिष्ट स्ट्रेन के लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका या सटीक इलाज उपलब्ध नहीं है, जिससे इसके फैलाव को रोकना चिकित्सा तंत्र के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। आबादी का निरंतर विस्थापन, विद्रोही गुटों द्वारा की जाने वाली हिंसा, स्वास्थ्य तंत्र पर जनसाधारण का अविश्वास और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं की दयनीय स्थिति इस महामारी को लगातार हवा दे रही है। फंड की कमी और वित्तीय गैर-जिम्मेदारी ने इस मानवीय संकट को और अधिक विकराल बना दिया है।
























