यमन की तरफ से हूतियों के बढ़ते हुए हमलों के मद्देनजर इस्लामाबाद ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को बहुत मजबूती से दोहराया है। पाकिस्तानी सेना से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सऊदी धरती की क्षेत्रीय अखंडता, वहां की संप्रभुता और देश के पवित्र धार्मिक स्थलों की हिफाजत करने के लिए हर मुमकिन सहायता दी जा रही है और भविष्य में भी यह सिलसिला पूरी तत्परता के साथ जारी रखा जाएगा। हालांकि, इस बात का कोई विस्तृत ब्योरा सामने नहीं आया है कि यह मदद तकनीकी रूप से किस प्रकार की होगी और इसका दायरा कितना व्यापक रहने वाला है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने एक डिजिटल समाचार पत्र को दिए गए साक्षात्कार के दौरान इन तमाम रणनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सऊदी अरब की हिफाजत और इस्लाम के दो सबसे बड़े पवित्र स्थलों की सुरक्षा इस्लामाबाद के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस संवेदनशील मसले पर किसी भी तरह के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं बन सकती है। इसके साथ ही उन्होंने इस संभावना से भी इनकार नहीं किया कि यमन की आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त सरकार की तरफ से यदि प्रत्यक्ष रूप से सैन्य मदद की कोई औपचारिक मांग रखी जाती है, तो उस पर गंभीरता के साथ विचार किया जा सकता है। इस प्रकार के संकेतों से यह स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि पाकिस्तानी सेना यमन के विद्रोही गुटों के खिलाफ सीधी जंग के मैदान में उतरने के विकल्प पर भी विचार कर रही है।
सऊदी सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव पर इस्लामाबाद का रुख
सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमलों को लेकर पाकिस्तानी सेना की तरफ से काफी सख्त प्रतिक्रिया सामने आई है। प्रवक्ता ने स्पष्ट रूप से यह बताया कि खाड़ी देश की सुरक्षा के लिए जिस भी तरह के सहयोग की आवश्यकता महसूस होगी, वह बिना किसी हिचकिचाहट के मुहैया कराया जाएगा। हालांकि, जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या यह मदद सैनिकों की तैनाती के रूप में होगी या फिर केवल रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने तक सीमित रहेगी, तो उन्होंने किसी विशिष्ट रणनीति का खुलासा करने से परहेज किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि इस पूरे मामले में सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़ा कोई भी सवाल या संशय स्वीकार्य नहीं है। हूतियों की तरफ से हो रही कार्यवाहियों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने दोहराया कि पवित्र स्थलों की हिफाजत के लिए देश पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के मायने
इसी साल अगस्त के महीने में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच एक महत्वपूर्ण संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते की बुनियादी शर्त के अनुसार यदि तीनों में से किसी भी एक सदस्य देश के ऊपर बाहरी हमला होता है, तो उसे गठबंधन में शामिल बाकी सभी देशों पर हुआ हमला माना जाएगा। इस व्यवस्था को लेकर पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने स्थिति साफ करते हुए यह बताया कि इस सैन्य साझेदारी का मुख्य उद्देश्य किसी अन्य देश के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना बिल्कुल नहीं है। उन्होंने इसे पूरी तरह से एक रक्षात्मक गठबंधन करार दिया जिसका मकसद केवल सदस्य देशों की सीमाओं और संप्रभुता की सुरक्षा करना है। जब उनसे यह पूछा गया कि सऊदी धरती पर हमले जारी रहने की स्थिति में क्या पाकिस्तान का समर्थन केवल रक्षात्मक उपायों तक ही सीमित रहेगा, तो उन्होंने इसी रक्षात्मक रुख को फिर से दोहराया।
ईरान के साथ कूटनीतिक संपर्क और बातचीत
हूतियों को ईरान की तरफ से मिल रहे समर्थन के परिप्रेक्ष्य में जब यह सवाल किया गया कि क्या इस्लामाबाद ने तेहरान के सामने इस मुद्दे पर कोई कड़ी चेतावनी पेश की है, तो प्रवक्ता ने बताया कि पाकिस्तान इस वक्त सभी संबंधित पक्षों के साथ निरंतर संवाद बनाए हुए है। इस कूटनीतिक दायरे में ईरान भी पूरी तरह से शामिल है। उनका यह कहना था कि पाकिस्तान की तरफ से तमाम पक्षों को लगातार यही संदेश दिया जा रहा है कि वे संयम से काम लें और क्षेत्र में सुलग रहे तनाव को शांत करने की दिशा में कदम बढ़ाएं। क्षेत्रीय संघर्ष को बेवजह बढ़ावा देने से किसी भी मुल्क का भला नहीं होने वाला है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि तमाम प्रकार के आपसी विवादों का निपटारा केवल और केवल शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से ही निकाला जाना चाहिए। इसके अलावा उन तमाम चर्चाओं का भी खंडन किया गया जिनमें यह दावा किया जा रहा था कि इस नए रक्षा गठबंधन को विशेष रूप से ईरान या इजराइल के खिलाफ घेराबंदी करने के लिए तैयार किया गया है।
भविष्य के गठबंधन विस्तार और कूटनीतिक भविष्य की रूपरेखा
आने वाले समय में इस रक्षा समझौते के दायरे को और अधिक बढ़ाने को लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं। जब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता से यह जानने की कोशिश की गई कि क्या मिस्र और सीरिया जैसे अन्य बड़े देश भी इस त्रिपक्षीय गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार का कोई भी अंतिम निर्णय तीनों मौजूदा सदस्य देशों के राजनीतिक, रणनीतिक और सैन्य नेतृत्व की सहमति पर पूरी तरह निर्भर करेगा। उन्होंने एक बार फिर से इस बात पर बल दिया कि इस्लामिक दुनिया के तमाम देशों के बीच आपसी एकजुटता कायम रहना बेहद जरूरी है। क्षेत्रीय अस्थिरता को हवा देने के बजाय कूटनीतिक मंचों पर बातचीत के जरिए समस्याओं का समाधान खोजना ही एकमात्र स्थाई रास्ता है। कुल मिलाकर यह स्थिति बनती दिखाई दे रही है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब को हरसंभव सहायता देने का आश्वासन तो दे दिया है, लेकिन उस मदद की वास्तविक सीमाओं और तौर-तरीकों को लेकर अभी भी रणनीतिक अस्पष्टता बनी हुई है।



















