पूर्वी एशिया के सुरक्षा परिदृश्य में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच टोक्यो के नीतिगत गलियारों से एक अप्रत्याशित विमर्श उभरकर सामने आया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर झेली गई परमाणु विभीषिका के बाद अपने अस्तित्व को सख्त शांतिवादी सिद्धांतों में ढालने वाले देश में अब दशकों पुराने आत्मसंयम की दीवारों पर पुनर्विचार की मांग उठ रही है। क्षेत्रीय सीमाओं के करीब सैन्य गतिविधियों में हो रही निरंतर वृद्धि और आधुनिक प्रक्षेपास्त्रों की तैनाती ने टोक्यो के रणनीतिकारों को अपनी पारंपरिक रक्षा सीमाओं से परे सोचने के लिए प्रेरित किया है। विशेष रूप से रक्षा प्रतिष्ठान से आए हालिया बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा तंत्र अब बिना किसी वैचारिक पूर्वाग्रह के सभी रक्षा विकल्पों पर खुली बातचीत के पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है।
रक्षा मंत्री का बयान और रणनीतिक विमर्श की शुरुआत
एक टेलीविजन साक्षात्कार के दौरान जापान के रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइजुमी ने वर्तमान भू-सामरिक चुनौतियों की गंभीरता को रेखांकित करते हुए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक काल में अपने देश के चारों तरफ मंडरा रहे बहुआयामी खतरों के मद्देनजर परमाणु हथियारों के संवेदनशील विषय पर संवाद से पीछे हटना एक भारी रणनीतिक भूल साबित हो सकता है। रक्षा मंत्री का मानना है कि इस पूरे विषय पर चर्चा को वर्जित मान लेना सामने खड़ी वास्तविक चुनौतियों की अनदेखी करने के समान होगा।
रक्षा मंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि टोक्यो को बिना किसी कानूनी या वैचारिक हिचक के अपनी वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। उनके अनुसार इस समीक्षा के दायरे में दशकों पुराने उन सिद्धांतों पर विचार शामिल है, जिन्होंने लंबे समय तक देश की सैन्य सीमाओं को परिभाषित किया है। साथ ही नौसेना के आधुनिकीकरण के लिए परमाणु ऊर्जा से संचालित होने वाली पनडुब्बियों के अधिग्रहण जैसे दूरगामी तकनीकी विषयों को भी इस रणनीतिक विमर्श का स्वाभाविक हिस्सा बनाया जाना आवश्यक माना गया है।
वर्ष 1967 के ऐतिहासिक तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों की रूपरेखा
जापान की पारंपरिक राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की नींव वर्ष 1967 में अपनाए गए उन तीन ऐतिहासिक सिद्धांतों पर टिकी हुई है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थ्री नॉन-न्यूक्लियर प्रिंसिपल्स के नाम से जाना जाता है। इस नीतिगत प्रतिबद्धता के माध्यम से देश ने दशकों तक शांतिवादी दृष्टिकोण को कायम रखने का संकल्प लिया था
- परमाणु हथियार न बनाना: इस पहले नियम के अनुसार जापान अपनी घरेलू तकनीक या किसी अन्य माध्यम से कभी भी स्वयं परमाणु अस्त्रों का उत्पादन या निर्माण नहीं करेगा।
- परमाणु हथियार न रखना: दूसरे सिद्धांत के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि देश अपनी सेना या शस्त्रागार में किसी भी रूप में परमाणु हथियारों को शामिल अथवा संरक्षित नहीं रखेगा।
- जमीन पर आने न देना: तीसरे नियम के मुताबिक अपनी भौगोलिक सीमाओं, बंदरगाहों अथवा वायु सीमा के भीतर किसी भी बाहरी मित्र अथवा सहयोगी राष्ट्र को परमाणु सामग्री या हथियार लाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
लंबे समय से इन नियमों का अटूट अनुपालन किया जाता रहा है। हालांकि सामरिक विश्लेषकों और रक्षा प्रतिष्ठान का तर्क है कि विश्व के बदलते हालात में पुराने पड़ चुके सिद्धांतों से बिना व्यावहारिक समीक्षा के बंधे रहना देश की संप्रभु सुरक्षा के लिए भारी जोखिम पैदा कर सकता है।
पड़ोसी देशों की सैन्य गतिविधियों से उपजा गंभीर दबाव
टोक्यो के रक्षा दृष्टिकोण में दिखाई दे रहे इस नीतिगत बदलाव के पीछे किसी तात्कालिक घटनाक्रम का हाथ नहीं है, बल्कि यह उसके पड़ोस में स्थित तीन विशाल सैन्य ताकतों की निरंतर आक्रामक नीतियों का सीधा परिणाम है
- उत्तर कोरिया के निरंतर परीक्षण: प्योंगयांग द्वारा जापान के नजदीकी समुद्री क्षेत्रों में लगातार परमाणु क्षमता से लैस आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया जा रहा है, जिससे तटीय इलाकों में सुरक्षा की चिंताएं गहरी हुई हैं।
- चीन का बढ़ता रणनीतिक प्रभाव: बीजिंग द्वारा पूर्वी चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य के आसपास अपने नौसैनिक तथा हवाई अभियानों को व्यापक स्तर पर विस्तारित किया गया है, जिसने सीधे तौर पर जापानी समुद्री सीमाओं और व्यापारिक मार्गों पर दबाव निर्मित किया है।
- रूस की आक्रामक सैन्य मौजूदगी: यूक्रेन के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष के बाद मॉस्को के रुख में भी कड़ा बदलाव देखा गया है, और उसने सुदूर पूर्व के क्षेत्रों तथा जापान के नजदीकी सीमावर्ती टापुओं के निकट अपने युद्धाभ्यास और नौसैनिक गश्त को तेज कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए अंतरराष्ट्रीय मामलों के जाने-माने प्रोफेसर स्टीफन नागी ने विश्लेषण किया है कि जापानी जनमानस और राजनीतिक तंत्र में परमाणु हथियारों को लेकर जो ऐतिहासिक झिझक मौजूद थी, वह अब तेजी से कमजोर पड़ रही है। उनका मानना है कि इस नीतिगत संकोच को समाप्त करने का काम टोक्यो की अपनी आंतरिक महत्वाकांक्षा ने नहीं, बल्कि बीजिंग, प्योंगयांग और मॉस्को द्वारा सीमा पर दिखाए गए निरंतर शक्ति प्रदर्शन ने किया है।
यूरोपीय सुरक्षा रणनीतियों में आए व्यापक बदलावों का संदर्भ
अपने दृष्टिकोण को तार्किक ठहराने के लिए रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइजुमी ने हाल के वर्षों में यूरोपीय महाद्वीप में आए सुरक्षा परिवर्तनों की मिसाल दी। उन्होंने रेखांकित किया कि रूस द्वारा उत्पन्न किए गए सुरक्षा संकट को भांपते हुए फिनलैंड ने अपने विधायी ढांचे और राष्ट्रीय कानूनों में आवश्यक संशोधन किए हैं, ताकि संकट के समय उसकी संप्रभु भूमि पर परमाणु सुरक्षा तंत्र की तैनाती का मार्ग प्रशस्त हो सके। इसी तरह फ्रांस भी समूचे यूरोपीय महाद्वीप की स्थिरता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अपने रणनीतिक परमाणु प्रतिरोध को नया रूप और व्यापक मजबूती प्रदान करने में जुटा हुआ है।
रक्षा मंत्री के अनुसार वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था एक ऐसे अभूतपूर्व मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां राष्ट्र अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के कड़े और ऐतिहासिक निर्णय ले रहे हैं। जब विश्व के जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश अपने नागरिकों के संरक्षण के लिए स्थापित नियमों को नया स्वरूप दे रहे हैं, तब जापान के लिए भी यह अपरिहार्य हो जाता है कि वह अपनी सीमाओं पर उत्पन्न होने वाली प्रत्येक सामरिक चुनौती का प्रत्युत्तर देने के लिए संपूर्ण तैयारी रखे।
वर्ष के अंत में प्रस्तावित राष्ट्रीय सुरक्षा ड्राफ्ट और संभावित प्रभाव
टोक्यो सरकार इस वर्ष के समापन तक अपने तीन अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा दस्तावेजों की व्यापक समीक्षा प्रक्रिया को अंतिम रूप देने की योजना पर कार्य कर रही है। रक्षा विश्लेषकों का आकलन है कि इस आगामी सुरक्षा खाके में दशकों पुराने गैर-परमाणु सिद्धांतों की व्यावहारिक उपयोगिता पर कोई बड़ा और दूरगामी फैसला लिया जा सकता है।
इस पूरे विमर्श में सबसे संवेदनशील बिंदु तीसरे सिद्धांत यानी देश की भूमि पर परमाणु हथियारों के प्रवेश को रोकने वाले नियम से जुड़ा हुआ है। यदि इस विशिष्ट प्रतिबंध को संशोधित या शिथिल किया जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप भविष्य में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपनी सामरिक परमाणु संपत्तियों को जापानी धरती पर अस्थायी या स्थायी रूप से तैनात करने का विधिक मार्ग खुल सकता है। ऐसी तैनाती से पूर्वी एशिया के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आएगा और बीजिंग तथा प्योंगयांग पर सीधा रणनीतिक दबाव बन जाएगा। इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा से संचालित अत्याधुनिक पनडुब्बियों के अधिग्रहण के तकनीकी और कूटनीतिक पहलुओं पर भी बातचीत उल्लेखनीय स्तर पर आगे बढ़ी है, जिसका हाल ही में अमेरिकी नौसेना के एक शीर्ष अधिकारी द्वारा सार्वजनिक रूप से समर्थन भी किया गया है।
ऐतिहासिक संवेदनशीलता और देश के भीतर कड़ा प्रतिरोध
यद्यपि रक्षा तंत्र इस संवेदनशील विषय पर खुली चर्चा का पक्षधर दिखाई दे रहा है, परंतु जापान के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में इस मुद्दे पर मतभेद अत्यंत गहरे हैं। वर्ष 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु हमलों में लाखों निर्दोष नागरिकों की आकस्मिक मृत्यु का आघात आज भी जापानी समाज की स्मृति में अंकित है। यही ऐतिहासिक कारण है कि आम नागरिकों में सामूहिक संहार के इन हथियारों को लेकर गहरा भय और तीव्र नैतिक अस्वीकार्यता मौजूद है।
इस विमर्श के सार्वजनिक होते ही नागासाकी शहर के मेयर सुजुकी शिरो ने रक्षा मंत्री के विचारों पर तीव्र असंतोष और गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने परमाणु हथियारों को एक महा-पाप के रूप में व्याख्यायित करते हुए अपनी बात रखी। मेयर ने केंद्र सरकार से जोरदार अपील की कि हथियारों की विनाशकारी शक्ति के सहारे स्थायी शांति स्थापित करने के भ्रम से दूर रहा जाए और वर्ष 1967 के तीनों सिद्धांतों की शुचिता को हर हाल में अक्षुण्ण रखा जाए। दूसरी ओर, राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने स्थिति पर बेहद संतुलित रुख अपनाया है। उन्होंने रेखांकित किया कि देश वर्तमान समय में अपने पारंपरिक गैर-परमाणु नियमों का पूरी तरह अनुपालन कर रहा है और परमाणु मुक्त विश्व की अवधारणा का समर्थन करता है, हालांकि वर्ष के अंत में आने वाले नीतिगत ड्राफ्ट में इन बंधनों के भविष्य को लेकर नीतिगत संशय बरकरार बना हुआ है।






















