युगांडा ने एन्तेबे हवाई अड्डे पर एक विशेष स्मारक प्रतिमा का अनावरण किया है। यह प्रतिमा इज़राइल के प्रधानमंत्री के बड़े भाई योनातान नेतन्याहू की याद में बनाई गई है, जो पचास साल पहले एन्तेबे में चलाए गए ऐतिहासिक बंधक बचाव अभियान के दौरान मारे गए थे।
ऐतिहासिक स्थल पर साहस का सम्मान
यह प्रतिमा एन्तेबे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पुराने टर्मिनल भवन के ठीक बाहर स्थापित की गई है, जहां आधा सदी पहले यह बंधक बचाव अभियान चलाया गया था। प्रतिमा में योनातान नेतन्याहू को हाथ में मशीन गन लिए आगे बढ़ते हुए दर्शाया गया है। अनावरण समारोह के दौरान युगांडा के सेना प्रमुख जनरल मुहूज़ी कानेरुगाबा ने कमांडर के अदम्य साहस और निस्वार्थ सेवा की सराहना की। इस रेस्क्यू मिशन को आधुनिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक बताते हुए कानेरुगाबा ने कहा कि इस घटना ने दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नया मोड़ दिया है।
1976 का विमान अपहरण और बंधक संकट
इस पूरी घटना की शुरुआत 27 जून 1976 को हुई थी, जब तेल अवीव से पेरिस जा रहे एयर फ्रांस के एयरबस ए300 विमान ने एथेंस में तकनीकी पड़ाव लिया था। एथेंस से 'पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ पलेस्टाइन' के दो फिलिस्तीनी और दो जर्मन अपहरणकर्ता विमान में सवार हुए। उन्होंने हवा में ही विमान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और ईंधन भरने के लिए इसे पहले लीबिया ले गए। इसके बाद विमान युगांडा पहुंचा, जहां तत्कालीन शासक इदी अमीन ने अपहरणकर्ताओं का स्वागत किया।
एन्तेबे पहुंचने के बाद अपहरणकर्ताओं ने 5 मिलियन डॉलर की फिरौती मांगी। इसके साथ ही उन्होंने इज़राइल, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और केन्या में जेलों में बंद 53 उग्रवादियों को रिहा करने की शर्त रखी। अपहरणकर्ताओं ने 30 जून और 1 जुलाई को गैर-इज़राइली यात्रियों में से कई को रिहा कर दिया, लेकिन इज़राइली और यहूदी यात्रियों को बंधक बनाए रखा।
एन्तेबे में 90 मिनट की सैन्य कार्रवाई
बंधक संकट से निपटने के लिए इज़राइल के विशेष कमांडो दस्ते ने 3 जुलाई 1976 को एक गुप्त सैन्य अभियान शुरू किया। केन्या के रास्ते युगांडा पहुंचे कमांडो ने एन्तेबे हवाई अड्डे पर उतरकर त्वरित कार्रवाई की, जो 90 मिनट से भी कम समय तक चली। इस कार्रवाई में कमांडो ने टर्मिनल में बंधक बनाकर रखे गए 100 से अधिक यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया।
इस सैन्य अभियान के दौरान योनातान नेतन्याहू मारे जाने वाले एकमात्र इज़राइली सैनिक थे। हालांकि, गोलीबारी के दौरान तीन बंधकों की भी मौत हो गई, जिनकी पहचान ज़ीन-जाक्स मिमौनी, पास्को कोहेन और इडा बोरोचोविच के रूप में हुई। इसके अलावा एक अन्य बंधक डोरा बलोच, जिन्हें इलाज के लिए राजधानी कम्पाला के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, की बाद में वहां हत्या कर दी गई थी।
हताहतों की संख्या और इतिहास का पुनर्मूल्यांकन
कमांडो कार्रवाई के दौरान इज़राइली बलों, अपहरणकर्ताओं और टर्मिनल की सुरक्षा में तैनात युगांडा के सैनिकों के बीच भारी गोलीबारी हुई। इसमें चारों मूल अपहरणकर्ता और युगांडा में उनके साथ शामिल हुए तीन अन्य सहयोगी मारे गए। इस मुठभेड़ में युगांडा के कम से कम 45 सैनिक भी मारे गए थे।
युगांडा के सैनिकों की मौत पर बोलते हुए जनरल मुहूज़ी कानेरुगाबा ने कहा कि उन सैनिकों ने अपनी समझ के अनुसार वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आज का युगांडा यह अच्छी तरह जानता है कि इदी अमीन की सरकार एक क्रूर तानाशाही थी, जो युगांडा की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।
कूटनीतिक संबंधों का नया दौर
इज़राइल के लिए यह रेस्क्यू मिशन एक बड़ी सफलता और गर्व का विषय था, जबकि इदी अमीन के शासन के लिए यह एक गंभीर शर्मिंदगी का कारण बना। कानेरुगाबा ने 1976 की घटना को युगांडा के इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय बताया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आज इज़राइल और युगांडा के रिश्ते आपसी विश्वास, सम्मान और सहयोग पर आधारित एक मजबूत साझेदारी में बदल चुके हैं।
सेना प्रमुख ने आशा व्यक्त की कि इस घटना में अपनी जान गंवाने वाले लोगों की यादें आने वाली पीढ़ियों को शांति, न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए प्रेरित करती रहेंगी।


















