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हवाई हमलों और अरबों के आधुनिक हथियारों के बाद भी कैसे मजबूत होते गए हूती विद्रोही?दुनिया
16 सित॰ 2026, 6:49 pm (21 मिनट पहले)· 0

हवाई हमलों और अरबों के आधुनिक हथियारों के बाद भी कैसे मजबूत होते गए हूती विद्रोही?

सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के लगातार सैन्य अभियानों के बावजूद यमन के हूती विद्रोही लगातार शक्तिशाली हो रहे हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति के लिए एक बड़ा संकट पैदा हो गया है।

यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ पिछले एक दशक से लगातार बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान और हवाई हमले किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी ताकत में कोई कमी आने के बजाय वह लगातार बढ़ती जा रही है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई, अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल जैसी बड़ी सैन्य शक्तियों ने अलग-अलग समय पर हूतियों के सैन्य ठिकानों को तबाह करने के लिए बड़े हवाई हमले किए हैं। इस भारी सैन्य दबाव के बाद भी हूती विद्रोही आज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक के करीब लगातार पैर पसार रहे हैं। इसके साथ ही वे सऊदी अरब की महत्वपूर्ण तेल सुविधाओं को भी निशाना बना रहे हैं। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों के लिए एक बड़ा सवाल बन गई है कि आखिर इतने हमलों और अरबों डॉलर के हथियारों के इस्तेमाल के बाद भी हूती कमजोर क्यों नहीं हुए हैं।

कठिन पहाड़ी भूगोल का रक्षात्मक लाभ

हूती विद्रोहियों की इस मजबूती के पीछे सबसे बड़ा कारण यमन का कठिन भौगोलिक इलाका है। हूतियों के नियंत्रण में जो क्षेत्र है, वह काफी विशाल और अत्यधिक पहाड़ी है। इस तरह के पहाड़ी भूगोल में किसी भी सैन्य बल के लिए पारंपरिक युद्ध लड़ना बहुत मुश्किल होता है। हूती लड़ाके इस पहाड़ी इलाके का भरपूर फायदा उठाते हैं। वे अपने सैन्य ठिकानों, मिसाइल लॉन्चरों और लड़ाकों को बहुत बड़े क्षेत्र में अलग-अलग जगहों पर फैलाकर रखते हैं। इस रणनीति की वजह से किसी भी बड़े हवाई हमले में उनके पूरे सैन्य ढांचे को एक साथ तबाह करना लगभग असंभव हो जाता है। इसके अलावा, हूती विद्रोही ऐसे लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें वे इन पहाड़ी इलाकों में छिपाकर रख सकते हैं और वहीं से सऊदी अरब की सीमा के पार तेल सुविधाओं और दूसरी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्तियों पर सटीक निशाना लगा सकते हैं। यही भौगोलिक बढ़त उन्हें समुद्र में तेल टैंकरों और अन्य व्यापारिक जहाजों के लिए एक बड़ा खतरा बनने की ताकत देती है।

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ईरानी हथियारों की तकनीक और तटीय रक्षा तंत्र

हूती विद्रोहियों के पास आज के समय में बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और अत्याधुनिक ड्रोन का एक विशाल भंडार है। इनमें से अधिकांश हथियार और उनकी प्रणालियां ईरानी मॉडलों से अत्यधिक मेल खाती हैं। इन हथियारों की मारक क्षमता इतनी अधिक है कि ये खाड़ी देशों के साथ-साथ इजरायल की सीमाओं के भीतर तक हमला करने में पूरी तरह सक्षम हैं। हूतियों ने लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने के लिए उन्नत एंटी-शिप मिसाइलों और पानी के भीतर चलने वाले समुद्री ड्रोन का भी इस्तेमाल किया है। इस तकनीक के कारण दुनिया का एक सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्ग गंभीर संकट में आ गया है। हालांकि ईरान हमेशा से हूतियों को किसी भी प्रकार के हथियार देने की बात से इनकार करता रहा है, क्योंकि ऐसा करना संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए हथियार प्रतिबंध का सीधा उल्लंघन होगा। इसके बावजूद, यमन की ओर जा रहे कई जहाजों से तस्करी के जरिए भेजे जा रहे ईरानी हथियार और उनके कलपुर्जे लगातार जब्त किए गए हैं। वर्ष 2024 में आई संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की एक विस्तृत रिपोर्ट में भी हूतियों, ईरान और ईरान के अन्य क्षेत्रीय सहयोगी गुटों के बीच गहरे सैन्य और तकनीकी संबंधों की बात स्पष्ट की गई थी।

लड़ाकों की संख्या में ऐतिहासिक वृद्धि

हूतियों की बढ़ती ताकत का अंदाजा उनकी सेना के आकार से लगाया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के सैन्य विशेषज्ञों की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने अपने संगठन में करीब 3.5 लाख लड़ाकों को शामिल कर लिया था। यदि इसकी तुलना करीब एक दशक पहले के आंकड़ों से की जाए, तो वर्ष 2015 में उनके लड़ाकों की संख्या केवल 30 हजार के आसपास थी। इसका मतलब यह है कि पिछले दस वर्षों के दौरान उनके कुल लड़ाकों की संख्या में कई गुना अधिक बढ़ोतरी हुई है। यद्यपि हूतियों को ईरान से उच्च स्तर की सैन्य तकनीक और रणनीतिक मदद मिलती है, लेकिन वे अपने हथियारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा यमन के भीतर ही तैयार करने में सक्षम हो चुके हैं। वे कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलें बनाने में माहिर हैं। यही कारण है कि वे बहुत ही कम खर्च में तैयार किए गए हथियारों से उनके विरोधियों के अत्यंत महंगे और आधुनिक सैन्य ठिकानों को आसानी से निशाना बना लेते हैं।

सऊदी अरब के आधुनिक पश्चिमी रक्षा उपकरणों की सीमाएं

सऊदी अरब की सेना के पास अमेरिका द्वारा निर्मित दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान और बेहद उन्नत मिसाइल डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं। हाल के वर्षों में हुए युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने ईरान की ओर से आने वाले हमलों के खिलाफ इन प्रणालियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भी किया है। लेकिन इन महंगे और जटिल इंटरसेप्टर मिसाइलों की आपूर्ति बनाए रखना अब सऊदी अरब के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। सैन्य विश्लेषक लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि सऊदी अरब कब तक हूतियों के इन लगातार हमलों और इराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया के संभावित हमलों का मुकाबला कर पाएगा। उल्लेखनीय है कि इन मिलिशिया समूहों पर पूर्व में एक ऐसा बड़ा हमला करने का आरोप लगा था, जिसके कारण सऊदी अरब को तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण अपनी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन को बंद करना पड़ गया था।

वर्ष 2015 से जारी सऊदी-हूती संघर्ष का इतिहास

सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधे सैन्य संघर्ष की शुरुआत वर्ष 2015 की शुरुआत में हुई थी। इससे ठीक पहले हूती विद्रोहियों ने यमन की आधिकारिक राजधानी सना सहित देश के उत्तरी और मध्य हिस्सों के एक बहुत बड़े भूभाग पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया था। सऊदी अरब को इस बात का गहरा डर था कि उसकी दक्षिणी सीमा के ठीक बगल में ईरान का एक बहुत शक्तिशाली और आधुनिक हथियारों से लैस सहयोगी स्थापित हो रहा है। इस खतरे को टालने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने करीब 7 वर्षों तक हूतियों के खिलाफ लगातार और भीषण हवाई हमले किए। इन हवाई हमलों में बड़े पैमाने पर आम नागरिकों के मारे जाने की खबरें भी लगातार सामने आईं। इस युद्ध के दौरान यमन सरकार के समर्थक सैनिकों और देश के दक्षिणी हिस्से के अलगाववादियों ने भी हूतियों को पीछे धकेलने के लिए जमीन पर लड़ाई लड़ी, लेकिन मोर्चे पर कोई बहुत बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला। आखिरकार लंबी जंग के बाद वर्ष 2022 में दोनों पक्षों के बीच एक युद्धविराम समझौता हुआ था।

गाजा संघर्ष और लाल सागर में बढ़ा सैन्य तनाव

वर्ष 2023 में गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर अपने हमले तेज कर दिए। हूतियों ने इन हमलों को इजरायल की आर्थिक नाकाबंदी के रूप में पेश किया। इस समुद्री खतरे के जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन की सेनाओं ने जनवरी 2024 से हूतियों के ठिकानों पर फिर से हवाई हमले शुरू कर दिए। इसके अगले वर्ष, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ इस सैन्य अभियान को और अधिक आक्रामक बनाने का आदेश दिया। उस समय अमेरिकी सैन्य कमांडरों के अनुसार, इस अभियान में हूतियों के 1,000 से अधिक ठिकानों पर लगभग 2,000 बम और मिसाइलें गिराई गईं। इस अमेरिकी सैन्य अभियान में इस्तेमाल किए गए हथियारों की कुल कीमत ही 75 करोड़ डॉलर से अधिक थी। इस भारी बमबारी के बाद भी हूतियों ने अमेरिका के 7 MQ-9 रीपर ड्रोन मार गिराए, जिनमें से प्रत्येक ड्रोन की कीमत 3 करोड़ डॉलर से अधिक है। इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना का एक F/A-18 लड़ाकू विमान, जिसकी कीमत 6 करोड़ डॉलर से अधिक थी, विमानवाहक पोत से फिसलकर समुद्र में गिर गया।

अमेरिकी हमलों पर रोक और इजरायल के साथ सीधा टकराव

हफ्तों तक चले भीषण अमेरिकी हमलों के बाद हूती विद्रोही अमेरिकी जहाजों पर हमले रोकने के लिए सहमत हो गए। हालांकि, उन्होंने इजरायल को निशाना बनाना बंद नहीं किया और लगातार हमले जारी रखे। इसके जवाब में इजरायल ने वर्ष 2025 में हूतियों के खिलाफ कई बड़े जवाबी हमले किए। इन इजरायली हमलों में हूती सरकार के प्रधानमंत्री सहित कई शीर्ष स्तर के सैन्य और राजनीतिक अधिकारियों की मौत हो गई। इसके साथ ही हूतियों के नियंत्रण वाले एक बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह को भी इजरायल द्वारा बार-बार निशाना बनाया गया। ईरान और इजरायल के बीच चल रहे सीधे युद्ध के शुरुआती महीनों में हूती विद्रोही काफी हद तक शांत रहे और इस संघर्ष से दूरी बनाए रखी। लेकिन जुलाई के महीने में उन्होंने अचानक सऊदी अरब पर दोबारा हमले शुरू कर दिए और सऊदी अरब के जहाजों की पूरी तरह से समुद्री नाकाबंदी करने का आधिकारिक ऐलान कर दिया।

सिर्फ हवाई हमलों से हूतियों को हराना क्यों असंभव है?

सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यमन की समस्या का समाधान केवल आसमान से बम बरसाकर नहीं निकाला जा सकता। दुनिया भर में हाल के वर्षों में हुए कई युद्धों ने यह साबित किया है कि किसी भी विद्रोही संगठन को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए जमीन पर सैनिकों का आगे बढ़ना और उस इलाके पर भौतिक रूप से कब्जा करना अनिवार्य होता है। लेकिन हूतियों के खिलाफ लड़ने वाले स्थानीय यमनी गुट खुद आपस में बुरी तरह बंटे हुए हैं। इनमें सऊदी अरब द्वारा समर्थित यमन की आधिकारिक सरकार के सैनिक और यूएई द्वारा समर्थित दक्षिणी अलगाववादी शामिल हैं। यूएई, जो पहले यमन में सऊदी अरब का मुख्य सैन्य साझेदार था, वह वर्ष 2019 में ही खुद को इस युद्ध से बाहर कर चुका था। इन दोनों विरोधी गुटों के बीच इस साल जनवरी में भी भीषण आपसी लड़ाई देखने को मिली थी।

विशेषज्ञों की नजर में हूतियों की रणनीतिक ताकत

यमन और ईरान के मामलों के विशेषज्ञ और यूनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के प्रोफेसर थॉमस जूनो के अनुसार, हूतियों की सैन्य ताकत की सफलता के पीछे ईरान की मदद केवल आधा हिस्सा है। उनका मानना है कि इसकी सफलता का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण आधा हिस्सा उनके विरोधियों की आपसी कमजोरी है। थॉमस जूनो ने स्पष्ट किया कि यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार अंदरूनी कलह से ग्रस्त, कमजोर, असंगठित और पूरी तरह से भ्रष्ट है। हूतियों ने इस प्रशासनिक शून्यता और कमजोरी का लगातार अपनी बढ़त बनाने के लिए इस्तेमाल किया है।

वहीं, न्यूयॉर्क की रणनीतिक सलाहकार संस्था होराइजन एंगेज में शोध प्रमुख और हूतियों के सैन्य तंत्र पर गहरा अध्ययन करने वाले रणनीतिक विशेषज्ञ माइकल नाइट्स के अनुसार, हूती समूह ईरान के पूरे क्षेत्रीय नेटवर्क में सबसे अधिक प्रतिबद्ध और आक्रामक लड़ाकों में से एक है। माइकल नाइट्स का मानना है कि ईरान ने हूतियों के सैन्य विकास को बहुत तेज गति दी है। उन्होंने बताया कि जिन सैन्य क्षमताओं और युद्ध तकनीकों को हासिल करने में लेबनान के हिजबुल्लाह जैसे शक्तिशाली संगठन को लगभग 20 साल का लंबा समय लगा, हूतियों ने उन सभी क्षमताओं को मात्र 5 साल के भीतर हासिल कर लिया है।

बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर बढ़ता खतरा

हाल के हफ्तों में हूती विरोधी गुटों को यमन के कई महत्वपूर्ण मोर्चों से पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसका सीधा फायदा उठाकर हूती विद्रोही अब बाब-अल-मंदेब की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। बाब-अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित एक बेहद संकरा और रणनीतिक समुद्री मार्ग है। पूरी दुनिया के समुद्री व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यदि हूती इस मार्ग पर अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं या यहां जहाजों की आवाजाही को बाधित करते हैं, तो इसका सीधा और विनाशकारी असर वैश्विक व्यापार और कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ेगा। यही कारण है कि हूतियों की यह सैन्य बढ़त अब केवल यमन का कोई घरेलू या क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह एक वैश्विक आर्थिक सुरक्षा का संकट बन चुकी है।

सऊदी अरब की जमीनी युद्ध से बचने की रणनीति

सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ यमन की धरती पर सीधे तौर पर कोई नया और बड़ा जमीनी युद्ध शुरू करने से लगातार बच रहा है। सऊदी अरब के सैन्य नेतृत्व को पता है कि जमीन पर उतरकर युद्ध लड़ने का मतलब होगा एक बहुत लंबी और थका देने वाली जंग में फंस जाना, जिसमें उनके बड़ी संख्या में सैनिकों के मारे जाने का जोखिम है। इसके साथ ही, अमेरिका भी इस समय ईरान के साथ अपने व्यापक रणनीतिक संघर्षों में उलझा हुआ है और वह यमन में किसी भी तरह के बड़े जमीनी सैन्य अभियान में सीधे शामिल होने से बचना चाहता है। सऊदी अरब ने पिछले महीने तुर्की और पाकिस्तान के साथ एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय रक्षा समझौता भी किया था, लेकिन अभी तक इस समझौते को क्रियान्वित या सक्रिय नहीं किया गया है। इस निष्क्रियता के बाद अंतरराष्ट्रीय रक्षा गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के इस बहुचर्चित सैन्य समझौते का व्यावहारिक महत्व समाप्त हो चुका है।

राजनयिक समाधान के रास्ते में खड़ी जटिल दीवार

हूती विद्रोहियों की मुख्य मांग यह है कि सऊदी अरब यमन पर लागू की गई अपनी सभी प्रकार की समुद्री और हवाई नाकाबंदी को तुरंत हटाए। लेकिन सऊदी अरब के लिए इस मांग को सीधे स्वीकार करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा कि उसने इस एक दशक लंबे युद्ध में हूतियों के सामने अपनी हार स्वीकार कर ली है। इसके अलावा, नाकाबंदी हटाने से ईरान को यमन में और भी अधिक अत्याधुनिक हथियार और सैन्य तकनीक सीधे भेजने का खुला रास्ता मिल जाएगा, जो सऊदी अरब की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा होगा। प्रोफेसर थॉमस जूनो का मानना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा बड़ा भू-राजनीतिक तनाव समाप्त नहीं हो जाता, तब तक सऊदी अरब और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों में किसी बड़ी रणनीतिक प्रगति की उम्मीद बहुत कम है। हूती विद्रोही इस समय किसी भी प्रकार के कूटनीतिक समझौते के मूड में नहीं दिख रहे हैं और वे अपनी किसी भी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

संक्षेप में कहें तो हूतियों को सैन्य रूप से परास्त करना इसलिए अत्यंत कठिन साबित हो रहा है क्योंकि उनकी ताकत कई महत्वपूर्ण कारकों का मिला-जुला परिणाम है। उनके पास एक सुरक्षित पहाड़ी इलाका है, उनके लड़ाकों की संख्या अब लाखों में है, उनके पास घातक मिसाइलें और ड्रोन हैं, जिन्हें वे खुद भी बना सकते हैं, और उन्हें ईरान का मजबूत तकनीकी समर्थन प्राप्त है। दूसरी तरफ, उनके स्थानीय विरोधी गुट आपस में बंटे हुए हैं और यमन की सरकार बेहद कमजोर है। इन्हीं कारणों से केवल हवाई हमलों के जरिए हूतियों को झुकाना पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ है।

सवाल-जवाब

हूती विद्रोहियों के पास सैन्य शक्ति कितनी है?
संयुक्त राष्ट्र की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, हूती विद्रोहियों के लड़ाकों की संख्या बढ़कर लगभग 3.5 लाख हो चुकी है, जो 2015 में सिर्फ 30 हजार थी।
अमेरिका और ब्रिटेन ने हूतियों के खिलाफ कितना पैसा खर्च किया है?
हूतियों के खिलाफ अमेरिकी हवाई हमलों में इस्तेमाल किए गए हथियारों की कीमत 75 करोड़ डॉलर से अधिक थी, लेकिन इसके बावजूद हूतियों ने अमेरिका के कई महंगे ड्रोन मार गिराए।
बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग क्यों महत्वपूर्ण है?
बाब-अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला एक संकरा मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल और व्यापारिक जहाजों का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है।
सऊदी अरब यमन में सीधे जमीनी युद्ध से क्यों बच रहा है?
सऊदी अरब को डर है कि सीधे जमीनी अभियान से युद्ध बहुत लंबा खिंच जाएगा और उसके बड़ी संख्या में सैनिकों के हताहत होने का खतरा रहेगा।
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