ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी संभावित संघर्ष से निपटने के लिए पिछले चार दशकों से लगातार तैयारियां की हैं। इन रणनीतिक तैयारियों में देश के शीर्ष नेतृत्व के खात्मे जैसे गंभीर हालातों से पार पाने की योजना भी शामिल थी। यही वजह है कि आज उसके विरोधी इस देश को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की इसी लंबी तैयारी ने उसे महाशक्तियों के सामने टिके रहने की ताकत दी है।
लंबी लड़ाई की क्षमता और युद्ध के स्पष्ट लक्ष्य
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन अमेरिका की तरफ से वॉशिंगटन में आयोजित एक चर्चा में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों ने महत्वपूर्ण खुलासे किए। उन्होंने बताया कि इजरायल और अमेरिका के साथ भीषण संघर्ष के दौरान भारी नुकसान झेलने के बावजूद ईरान के पास लंबी खींचने वाली जंग लड़ने की पूरी क्षमता मौजूद है। भारत की रक्षा खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख ने रेखांकित किया कि इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि किसी भी सैन्य अभियान का लक्ष्य एकदम स्पष्ट होना चाहिए और उससे बाहर निकलने यानी एग्जिट की रणनीति पहले से तय रहनी चाहिए। युद्ध शुरू करने से पहले ही यह बात साफ होनी चाहिए कि सरकार और सेना के लिए घोषित लक्ष्य क्या हैं और किस चरण में जीत की घोषणा की जाएगी।
रणनीतिक विकेंद्रीकरण और मोजेक सिद्धांत
के.जे.एस. ढिल्लों ने विस्तार से बताया कि कैसे ईरान ने अपनी सैन्य संरचना को मजबूत किया है। उनके अनुसार, ईरान ने मोजेक सिद्धांत को अपनाया और अपनी सेनाओं को 31 स्वतंत्र मुख्यालयों में बांट दिया। इन सभी मुख्यालयों को विकेंद्रीकृत कर दिया गया है ताकि यदि कभी शीर्ष नेतृत्व खत्म भी हो जाए, तब भी ये हेडक्वार्टर स्वतंत्र रूप से काम करते रहें। इस व्यवस्था की बदौलत ईरान आज भी लंबी अवधि की जंग लड़ने में सक्षम है, जहां पारंपरिक रूप से कमजोर माने जाने वाले पक्ष को भी रणनीतिक लाभ मिल जाता है। अभी तक का पूरा संघर्ष ईरान की इसी पूर्व-निर्धारित रूपरेखा के इर्द-गिर्द आगे बढ़ा है।
भौगोलिक स्थिति और पहाड़ी सुरक्षा कवच
ईरान की प्राकृतिक बनावट उसके दुश्मनों के लिए सबसे बड़ी बाधा साबित होती है। पूर्व सैन्य अधिकारी ने समझाया कि ईरान का पहाड़ी इलाका किसी भी बाहरी ताकत के लिए जमीनी हमला करना बेहद कठिन बना देता है, जबकि इसके उलट सऊदी अरब और इराक के खुले रेगिस्तानों में सेना उतारना अपेक्षाकृत आसान होता है। ईरान चारों तरफ से ऊंचे पहाड़ों से घिरे एक कटोरे की तरह है, जिसके भीतर विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र मौजूद हैं और जहां गर्मियों के मौसम में तापमान 55 से 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। देश के केंद्रीय हिस्सों तक पहुंचने के लिए विदेशी ताकतों को कड़े पहाड़ों को पार करना होगा और हर एक चौकी पर कब्जा जमाना होगा, जो जमीनी सैनिकों के लिए लगभग असंभव है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज और रक्षात्मक रणनीतियां
चूंकि ईरान के पास खुले समुद्र में सीधे तौर पर अमेरिका को टक्कर देने के लिए कोई विशाल और आधुनिक एयरफोर्स नहीं थी, इसलिए उसने अपनी रक्षा क्षमताओं का रुख बदल दिया। उसने विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज की सुरक्षा पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। इस अहम समुद्री मार्ग के संकरे हिस्सों की रक्षा के लिए ईरान ने तेज रफ्तार वाली बोट्स, टॉरपीडो नौकाओं, समुद्री बारूदी सुरंगों, तटीय तोपों, अत्याधुनिक मिसाइलों और ड्रोन पर आधारित एक बेहद प्रभावी रणनीति तैयार की। उसकी नौसेना का गठन और प्रशिक्षण भी मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज की हिफाजत को ध्यान में रखकर ही किया गया था।
वैश्विक मोर्चे पर बदलता रक्षा समीकरण
के.जे.एस. ढिल्लों ने जोर देकर कहा कि पारंपरिक वायु सेना के बजाय ईरान ने मिसाइलों और एयर डिफेंस नेटवर्क को अपनी ताकत बनाया और इसी आधार पर युद्ध लड़ा। आज के सैन्य रणनीतिकारों के लिए यह एक बड़ा सबक है कि कैसे एक देश एक बेहद ताकतवर दुश्मन का सामना करने के बावजूद सिर्फ लंबी योजना के बूते पूरी तरह तबाह होने से बचा हुआ है। दूसरी ओर, ईरान के साथ अमेरिका के इस लंबे खिंचते संघर्ष की वजह से दुनिया के दूसरे हिस्सों, खास तौर पर यूक्रेन की मुसीबतें भी काफी बढ़ गई हैं, जहां पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम की भारी कमी अब साफ तौर पर महसूस होने लगी है।




















