सैन्य पोशाक, बिखरी हुई दाढ़ी, सिर पर सितारे वाली गोल बेरेट टोपी और होठों के बीच सिगार थामे एक चेहरा आज दुनिया भर की दीवारों, परिधानों और विरोध प्रदर्शनों में दिखाई देता है। यह तस्वीर है अर्नोस्टो चे ग्वेरा की, जो बीसवीं सदी के वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में सबसे अधिक पहचाने जाने वाले चेहरों में शुमार हैं। अर्जेंटीना के एक साधारण पृष्ठभूमि वाले परिवार में पैदा होकर अंतरराष्ट्रीय महाशक्ति अमेरिका के प्रभुत्व को सीधी चुनौती देने वाले इस व्यक्ति का मूल्यांकन आज भी दुनिया को दो परस्पर विरोधी खेमों में बांट देता है। एक तरफ जहां उनके समर्थक उन्हें दबे-कुचले तबकों का रक्षक और बराबरी का मसीहा मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके विरोधी उन्हें मानवाधिकारों को कुचलने वाला एक हिंसक तानाशाह करार देते हैं।
चिकित्सा की पढ़ाई से लेकर क्रांतिकारी संघर्ष तक का सफर
अर्नोस्टो चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोसारियो शहर में हुआ था। अकादमिक रूप से वे एक प्रशिक्षित डॉक्टर थे, लेकिन युवावस्था के दौरान दोपहिया वाहन से लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों की उनकी यात्रा ने उनके जीवन का रुख हमेशा के लिए बदल दिया। इस लंबी यात्रा में उन्होंने महाद्वीप के खेत-मजदूरों, गरीब तबकों और वंचित किसानों की भीषण बदहाली को बेहद करीब से महसूस किया। स्थानीय हुक्मरानों और अमेरिकी कंपनियों के आर्थिक शिकंजे के कारण आम जनता जिस भुखमरी और शोषण से गुजर रही थी, उसने उनके दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला। इसी अनुभव के बाद वे डॉक्टरी के पेशे से दूर होकर मार्क्सवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए और व्यवस्था परिवर्तन को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।
क्यूबा की क्रांति और फुलजेंसियो बतिस्ता का पतन
वर्ष 1955 में मेक्सिको प्रवास के दौरान उनकी मुलाकात फिदेल कास्त्रो से हुई, जो क्यूबा में राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार कर रहे थे। दोनों नेताओं ने मिलकर 26 जुलाई मूवमेंट की नींव रखी, जिसका मुख्य मकसद क्यूबा के तत्कालीन क्रूर शासक फुलजेंसियो बतिस्ता को सत्ता से बेदखल करना था। इस संघर्ष में चे ग्वेरा ने छापामार यानी गुरिल्ला युद्ध कौशल का असाधारण परिचय दिया। उनके रणनीतिक नेतृत्व में लड़ाकों ने सांता क्लारा की निर्णायक लड़ाई में जीत दर्ज की। इस शिकस्त के बाद 1959 में बतिस्ता को देश छोड़कर भागना पड़ा और क्यूबा में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में नई क्रांतिकारी हुकूमत कायम हुई।
सत्ता के आराम को ठुकराकर जंगलों की ओर
सफलता हासिल करने के बाद चे ग्वेरा को नई सरकार में बड़े पद सौंपे गए। उन्हें क्यूबा के नेशनल बैंक का प्रमुख और उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान उन्होंने व्यापक भूमि सुधारों को लागू करने और देश भर में अशिक्षा को जड़ से मिटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियानों का संचालन किया। हालांकि, शासन व्यवस्था और मंत्रिस्तरीय सुख-सुविधाएं उनके विद्रोही स्वभाव को अधिक समय तक बांध नहीं सकीं। उनका सपना केवल एक मुल्क तक सीमित नहीं था, बल्कि वे पूरी दुनिया से पूंजीवादी साम्राज्यवाद का खात्मा करना चाहते थे। इसी संकल्प के तहत उन्होंने क्यूबा की नागरिकता और मंत्री पद दोनों को त्याग दिया और पहले अफ्रीका के कांगो पहुंचे। इसके बाद वे बोलीविया के बीहड़ों में स्थानीय किसानों को संगठित करने पहुंचे, जहां 9 अक्टूबर 1967 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के सहयोग से बोलीवियाई सेना ने उन्हें बंदी बनाकर गोली मार दी।
एक तस्वीर जिसने उन्हें पॉप कल्चर का अमर चेहरा बना दिया
चे ग्वेरा की ऐतिहासिक छवि को वैश्विक फलक पर अमर करने का बहुत बड़ा श्रेय 5 मार्च 1960 को हवाना में ली गई एक ऐतिहासिक तस्वीर को जाता है। अल्बर्टो कॉर्डा नामक एक क्यूबाई फोटोग्राफर ने एक शोक सभा के दौरान उनका यह पोट्रेट खींचा था, जिसे गुएरिलेरो हेरोइको के नाम से जाना जाता है। इस तस्वीर में चे की आंखों की दृढ़ता, चेहरे का संकल्प और सिर पर सजी बेरेट कैप कैद थी। उनकी शहादत के बाद इटली के प्रकाशक गियांगियाकोमो फेरत्रिनेल्ली ने इस छवि के पोस्टर प्रकाशित किए, जो पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में भड़के छात्र आंदोलनों का प्रतीक बन गए। धीरे-धीरे यह तस्वीर टी-शर्ट्स, कॉफी कप, बिल्लों और फैशन उत्पादों पर छपकर दुनिया की सबसे अधिक प्रसारित और बेची जाने वाली कलाकृतियों में तब्दील हो गई।
नायक या खलनायक: आज भी कायम गहरा वैचारिक मतभेद
चे ग्वेरा का मूल्यांकन आज भी राजनीति और समाज में भारी विवाद का विषय बना हुआ है। उनके प्रशंसक उन्हें एक ऐसा योद्धा मानते हैं जिसने हाशिए पर खड़े लोगों के अधिकारों, सामाजिक न्याय, नस्लभेद के अंत और अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उनके त्याग और विद्रोही स्वभाव ने उन्हें युवाओं के लिए एक निस्वार्थ प्रेरणा बना दिया। इसके उलट, उनके आलोचक और क्यूबाई प्रवासियों का बड़ा तबका एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। उनका आरोप है कि क्यूबा की ला काबाना जेल के प्रभारी के रूप में चे ग्वेरा ने बिना किसी स्वतंत्र कानूनी प्रक्रिया के सैकड़ों राजनीतिक बंदियों, जासूसों और पूर्व शासन के अधिकारियों को मौत के घाट उतारने के आदेश दिए थे। दक्षिणपंथी चिंतक उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोधी और खूनी तानाशाही का क्रूर समर्थक मानते हैं।
भारतीय छात्र आंदोलनों और वाम राजनीति पर असर
भारत में भी चे ग्वेरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा है। खासकर 1960 के उत्तरार्ध में जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग स्थित नक्सलबाड़ी क्षेत्र से किसानों का सशस्त्र आंदोलन उभरा, तब देश के विश्वविद्यालयों, कॉलेज परिसरों और वामपंथी संगठनों में चे ग्वेरा का विद्रोही व्यक्तित्व युवाओं के बीच एक बड़ा वैचारिक आदर्श बनकर स्थापित हो गया। बंगाल और केरल की राजनीतिक संस्कृति में उनकी छवि आज भी प्रतिरोध और जन-आंदोलनों की सशक्त आवाज मानी जाती है।





















