पश्चिम एशिया के सुलगते हालात के बीच भारत की ओर से कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई के साथ फोन पर एक उच्च-स्तरीय और गंभीर चर्चा की है। इस आपात संपर्क को दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी हितों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। ईरानी दूतावास की तरफ से जारी आधिकारिक पुष्टि के मुताबिक, दोनों पक्षों ने वैश्विक और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर खुलकर विचार साझा किए हैं। हालांकि कूटनीतिक गोपनीयता के चलते इस संवाद की विस्तृत बातें सार्वजनिक नहीं की गई हैं, लेकिन इस बातचीत का समय बेहद संवेदनशील है क्योंकि लाल सागर से लेकर फारस की खाड़ी तक तनाव चरम पर है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट और वैश्विक व्यापार
इस पूरे भू-राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में एक बेहद अहम समुद्री गलियारा यानी होर्मुज जलडमरूमध्य है। इस मार्ग पर लगातार हो रहे हमलों और अवरोधों के कारण समुद्री यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं से न केवल भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि मालवाहक जहाजों पर काम करने वाले कई नाविकों और नागरिकों की जान पर भी बन आई है। खाड़ी क्षेत्र में रोजगार और व्यापार के सिलसिले में रह रहे 80 लाख से अधिक भारतीयों की सुरक्षा पर भी लगातार खतरा मंडरा रहा है। कमर्शियल वेसल के लिए सुरक्षित आवाजाही ठप होने की वजह से वैश्विक स्तर पर मरीन इंश्योरेंस और मालभाड़े की दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जिससे पूरी दुनिया का व्यापारिक ढांचा हिल गया है।
अमेरिका और ईरान के बीच शर्तों का टकराव
दूसरी तरफ, अमेरिका और ईरान के बीच कड़े राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबंधों का दौर जारी है। अमेरिका की ओर से चुनावों और रणनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल बड़े हमलों पर संयम बरता जा रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनातनी बनी हुई है। ईरान का साफ रुख है कि जब तक वाशिंगटन की तरफ से उसकी शर्तों को नहीं माना जाता, तब तक इस समुद्री मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जाएगा। अमेरिकी पक्ष का रवैया भी अभी तक सख्त बना हुआ है, जिसके चलते कूटनीतिक मोर्चे पर सहमति बनने की गुंजाइश बेहद कम नजर आ रही है। इस शक्ति परीक्षण के बीच दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह उलझ गई है क्योंकि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं।
भारत के लिए इस संघर्ष के निहितार्थ
पश्चिम एशिया में सुलगती इस आग की आंच सीधे तौर पर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंचती है। अजीत डोभाल और मोहसिन रजाई के बीच हुई यह फोन कॉल इस बात का प्रमाण है कि नई दिल्ली इस संकट को लेकर पूरी तरह सतर्क है। इसके पीछे तीन मुख्य रणनीतिक और आर्थिक कारण जुड़े हुए हैं। पहला कारण ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और होर्मुज मार्ग में रुकावट आने से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकते हैं, जिससे देश में महंगाई भड़क सकती है। दूसरा कारण खाड़ी देशों में रहने वाले 80 लाख से अधिक भारतीयों की सुरक्षा और उनका कल्याण है, जो भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। तीसरा कारण शिपिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी वृद्धि है, क्योंकि वैकल्पिक मार्गों से व्यापार होने पर आयात और निर्यात दोनों महंगे हो जाएंगे।
संतुलित विदेश नीति और संवाद की पहल
अजीत डोभाल की यह कूटनीतिक पहल भारत की सोची-समझी और संतुलित विदेश नीति का अहम हिस्सा है। कुछ समय पहले ही ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात की थी। उस दौरान यह स्पष्ट किया गया था कि भारत हमेशा कूटनीति, आपसी संवाद और नेविगेशन की स्वतंत्रता का समर्थन करता है। भारत की नीति बेहद स्पष्ट है कि वह किसी भी सैन्य संघर्ष का पक्षधर नहीं है, लेकिन अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता भी नहीं कर सकता। ईरानी सुरक्षा प्रमुख से सीधे संपर्क साधकर यह संदेश दिया गया है कि भारत इस क्षेत्र में शांति बहाली के पक्ष में है और किसी भी बड़े आर्थिक संकट को टालने के लिए सभी संभव कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग करने के लिए तैयार है।
जटिल समीकरणों के बीच भारत की अनूठी भूमिका
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे इस माइंड गेम में भारत एक बेहद विशिष्ट और संतुलित स्थिति में है। नई दिल्ली के संबंध जहां एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ गहरे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ भी पारंपरिक और मजबूत कूटनीतिक रिश्ते कायम हैं। ऐसे में अजीत डोभाल का यह बैक-चैनल संवाद पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव को नियंत्रित करने में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है। यह कूटनीतिक पहल न केवल भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा करती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके।




















