जर्मनी के पूर्वी राज्य सेक्सनी-अनहाल्ट की नवनिर्वाचित विधायिका ने अपनी पहली ही बैठक में एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए धुर दक्षिणपंथी दल एएफडी के नेता टोबियास रौश को संसद का नया स्पीकर चुन लिया है। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से अब तक जर्मन राजनीति में कभी भी किसी दक्षिणपंथी दल के नेता को यह प्रतिष्ठित संवैधानिक पद नहीं मिला था। मंगलवार को संपन्न हुए इस गोपनीय मतदान में 35 वर्षीय रौश ने अपनी खुद की पार्टी के अलावा अन्य राजनीतिक दलों के 9 विधायकों का भी समर्थन हासिल कर लिया, जिससे वहां का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह हिल गया है।
मैग्डेबर्ग में सड़कों पर फूटा आक्रोश
संसद भवन के भीतर जब मतदान प्रक्रिया चल रही थी, ठीक उसी समय मैग्डेबर्ग की सड़कों पर 300 से अधिक प्रदर्शनकारी जमा होकर अपना कड़ा विरोध दर्ज करा रहे थे। हाथों में तख्तियां लिए इन नागरिकों के नारों में 1945 के बाद की लोकतांत्रिक मर्यादाओं को बचाने की मांग साफ दिखाई दे रही थी। कई बैनरों पर स्पष्ट रूप से लिखा था कि फिर कभी नहीं का संकल्प दरअसल आज के दौर की ही पुकार है। प्रदर्शनकारियों का यह आक्रोश उस वक्त चरम पर पहुंच गया जब उन्होंने एएफडी के प्रांतीय प्रमुख उलरिच सीगमंड को मीडिया से बातचीत करते समय चारों तरफ से घेर लिया।
स्थानीय स्तर पर सक्रिय नागरिक समाज और वामपंथी समूहों का मानना है कि दक्षिणपंथी ताकत को सदन की अध्यक्षता सौंपना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चेतावनी है। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने वर्ष 2026 के संदर्भ में चेताते हुए कहा कि जिस तरह का राजनीतिक समझौता यहां देखने को मिला है, वह पूरे देश की शांति और संवैधानिक ढांचे के लिए खतरा बन सकता है।
पारंपरिक फायरवॉल और दलीय सहमति पर करारी चोट
जर्मन राजनीति में युद्ध के बाद से ही मुख्यधारा की पार्टियों के बीच एक अनकहा नियम लागू रहा है, जिसे राजनीतिक फायरवॉल के नाम से जाना जाता रहा है। इसके तहत किसी भी स्तर पर धुर दक्षिणपंथी संगठनों के साथ तालमेल या सत्ता साझेदारी से पूरी तरह दूरी बनाई रखी जाती थी। चुनाव जीतने के तुरंत बाद रौश ने सार्वजनिक रूप से इस पुरानी परिपाटी पर हमला बोलते हुए कहा, "The days of political firewalls should be a thing of the past." उनका साफ संकेत था कि अब पारंपरिक दलों को दक्षिणपंथ के बहिष्कार की सोच त्याग देनी चाहिए।
पिछले महीने हुए प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एएफडी स्पष्ट बहुमत हासिल करने से महज तीन सीटों से चूक गई थी। 83 सदस्यों वाली विधानसभा में सामान्य बहुमत के लिए 42 सदस्यों के समर्थन की दरकार थी। रौश को मिले मतों से यह स्पष्ट हो गया कि विरोधी खेमे के भीतर भी पार्टी ने सफलतापूर्वक सेंध लगा ली है।
सीडीयू और बीएसडब्ल्यू की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस मतदान परिणाम के सामने आने के बाद सबसे बड़ा झटका रूढ़िवादी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन यानी सीडीयू के केंद्रीय नेतृत्व को लगा है। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ पहले ही सार्वजनिक मंचों से एएफडी के साथ किसी भी किस्म के सहयोग को पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। सेक्सनी-अनहाल्ट विधानसभा में सीडीयू के कुल 15 विधायकों में से 14 ने इस वोटिंग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। योजना के मुताबिक इन सभी को मतदान से अनुपस्थित यानी तटस्थ रहना था, लेकिन आधिकारिक तौर पर केवल 5 सदस्यों ने ही ऐसा रुख अपनाया। अपुष्ट जानकारी से संकेत मिले हैं कि सीडीयू के चार विधायकों ने गुप्त रूप से रौश के पक्ष में वोट डाला, जबकि मतदान से पहले सभी 15 विधायकों ने एएफडी का विरोध करने का सार्वजनिक दावा किया था।
इसके अलावा, वामपंथी विचारधारा वाली बीएसडब्ल्यू पार्टी के 5 विधायकों ने भी रौश के पक्ष में वोट डालकर सबको चौंका दिया। यह अप्रत्याशित गठबंधन यह दर्शाता है कि स्थानीय मुद्दों और पद के बंटवारे को लेकर वैचारिक विरोधियों के बीच भी अंदरूनी तालमेल बन चुका था।
संसद में बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी
सदन की औपचारिक शुरुआत से पहले ही एएफडी ने अपनी संसदीय स्थिति में अहम फेरबदल की मांग की थी। अब तक विधानसभा के सबसे दाईं ओर बैठने वाले इस दल के विधायकों ने तर्क दिया कि हालिया चुनाव नतीजों के बाद उन्हें सदन के केंद्र में सीटें मिलनी चाहिए। पार्टी अपनी इस मांग को मनवाने में कामयाब भी रही।
हालांकि सेक्सनी-अनहाल्ट की आंतरिक खुफिया शाखा ने एएफडी को दक्षिणपंथी चरमपंथी के रूप में वर्गीकृत कर रखा है, जिसका दल के नेता लगातार खंडन करते रहे हैं। पार्टी के नीतियों को लेकर स्थानीय स्तर पर तीखी बहस जारी है, जिसमें शरणार्थी बच्चों को सामान्य स्कूलों से अलग करने की योजना, रूस के प्रति नरम रुख, प्रवासियों का कड़ा विरोध और एलजीबीटी समुदाय के प्रति कठोर नीतियां शामिल हैं।
विपक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया और भविष्य की सियासत
इस चुनाव परिणाम को विपक्ष ने लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक मोड़ करार दिया है। क्षेत्रीय ग्रीन्स पार्टी की प्रमुख सुसान शिबोरा-जाइडलिट्ज़ ने सदन के माहौल को देखते हुए बेहद सख्त शब्दों में चेतावनी जारी की। उन्होंने दो टूक कहा कि एक दक्षिणपंथी चरमपंथी को संसद का सर्वोच्च पद सौंपकर मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघ दी गई है। उन्होंने आगे कहा, "We will not let ourselves be intimidated, and we will not sit by when rights are curtailed either here or for people in the state."
मूल रूप से रियल एस्टेट एजेंट का काम कर चुके 35 वर्षीय रौश पिछले दस वर्षों से विधानसभा के सदस्य रहे हैं। उन्हें एएफडी के प्रांतीय चेहरे उलरिच सीगमंड का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष का पद काफी हद तक औपचारिक और प्रतीकात्मक होता है, लेकिन इसके पास सदन की कार्यवाही संचालित करने, संसद भवन में प्रवेश नियंत्रित करने और आधिकारिक समारोहों में विधायी संस्था का प्रतिनिधित्व करने के व्यापक अधिकार होते हैं।
अब सभी की नजरें दिसंबर में होने वाले राज्य के प्रीमियर यानी मुख्यमंत्री के चुनाव पर टिकी हैं। उलरिच सीगमंड इस पद की दौड़ में शामिल हैं, लेकिन उनके लिए राह आसान नहीं है। कुल 83 सीटों वाले सदन में उन्हें भी 42 मतों के जादुई आंकड़े की जरूरत पड़ेगी। हालांकि बीएसडब्ल्यू ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह एएफडी के साथ किसी औपचारिक गठबंधन सरकार में शामिल नहीं होगी। वामपंथी दल ने संकेत दिया है कि वह किसी गैर-दलीय चेहरे का समर्थन करना पसंद करेगा और दिसंबर के महत्वपूर्ण मतदान में तटस्थ बना रहेगा।



















