धरती पर मौजूद मानव समाज अगर अपने तौर-तरीके नहीं सुधारता, तो आज से करीब 25 साल बाद दुनिया का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है. शहर, तकनीक और इंसान मौजूद रहने के बावजूद वह सामाजिक व आर्थिक ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है जिसके सहारे आधुनिक दुनिया चल रही है. किसी साइंस-फिक्शन थ्रिलर जैसी लगने वाली यह गंभीर चिंता अमेरिकी इतिहासकार और रिसर्चर जेरेड डायमंड ने सामने रखी है. उन्होंने वर्तमान वैश्विक रुझानों के विश्लेषण के आधार पर आगाह किया है कि साल 2050 तक दुनिया की मौजूदा व्यवस्था के बेहद गंभीर रूप से ध्वस्त होने और सब कुछ खत्म होने की करीब 49 प्रतिशत संभावना है.
एक इंटरव्यू में अपनी राय रखते हुए जेरेड डायमंड ने साफ किया कि उनकी यह टिप्पणी कोई अटल भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों के गहन आकलन से निकली चेतावनी है. उनकी सबसे बड़ी चिंता किसी अचानक छिड़ने वाले परमाणु युद्ध या किसी एक अकेली प्राकृतिक आपदा को लेकर नहीं है. न ही यह कोई विशुद्ध गणितीय गणना है. डायमंड के अनुसार, सबसे बड़ा और बुनियादी खतरा उन आवश्यक संसाधनों से जुड़ा है जिन पर पूरी मानव सभ्यता की नींव टिकी हुई है.
प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बढ़ता संकट
दुनिया भर में संसाधनों के गैर-टिकाऊ उपयोग पर सवाल उठाते हुए डायमंड ने रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर खेती योग्य जमीन, उपजाऊ मिट्टी, मीठे पानी के जलस्रोत और समुद्री मछलियों के भंडार का उपभोग बेहद अनियंत्रित ढंग से हो रहा है. यदि खपत की यही बेहिसाब रफ्तार बनी रही, तो आगामी दशकों में इन बुनियादी संपदाओं पर बर्दाश्त से बाहर का दबाव पड़ जाएगा.
इस संकट से सीधे तौर पर भोजन और पानी की सुरक्षा का सवाल जुड़ा है. अगर खेतों की उर्वरा शक्ति निरंतर घटती चली गई, पीने योग्य पानी के स्रोत सूखने लगे और महासागरों से मछलियों की तादाद कम हो गई, तो दुनिया की अरबों की आबादी का पेट भरना असंभव हो जाएगा. डायमंड का मानना है कि मौजूदा गैर-टिकाऊ रफ्तार से शायद कुछ दशक और काम चल सकता है, लेकिन 2050 के करीब पहुंचकर यह ढांचा अपनी आखिरी सीमा तक खिंच जाएगा. उस निर्णायक मोड़ पर मानव समाज के सामने केवल दो विकल्प बचेंगे: या तो समय रहते पूरी तरह टिकाऊ जीवनशैली अपनाई जाए, या फिर संकट इतना गहरा हो जाएगा कि सुधार का कोई मौका नहीं मिलेगा.
विनाश से बचने के उपाय और सामूहिक जिम्मेदारी
हालांकि जेरेड डायमंड का मानना है कि भविष्य पूरी तरह निराशाजनक नहीं है और इस आसन्न संकट को टाला भी जा सकता है. इसके समाधान के लिए उन्होंने केवल सरकारों पर निर्भर रहने के बजाय बहुस्तरीय प्रयासों की जरूरत बताई है. व्यक्तिगत स्तर पर आम नागरिक ईंधन की खपत कम करने, निजी गाड़ियों का उपयोग घटाने और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देने जैसी आदतें अपना सकते हैं.
इसी तरह औद्योगिक घरानों और कंपनियों को भी अपने उत्पादन मॉडल में बदलाव करना होगा ताकि कच्चे माल व प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी रोकी जा सके. वहीं सरकारों को जल संरक्षण, कृषि सुधार, स्वच्छ परिवहन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्यापक नीतिगत बदलाव लागू करने होंगे. 2050 भले ही समय के लिहाज से दूर दिखाई दे, लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या इंसान धरती के संसाधनों के पूरी तरह सूखने से पहले अपनी विकासवादी दिशा को बदलने के लिए तैयार होगा. यही वजह है कि डायमंड की 49 प्रतिशत संभावना वाली चेतावनी बेहद गंभीर मानी जा रही है.


















