संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थियों में प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस को चुनने की जबरदस्त होड़ रहती है। अधिकांश सफल उम्मीदवार भारतीय प्रशासनिक सेवा को अपनी शीर्ष प्राथमिकता देते हैं क्योंकि आम धारणा में जिले का प्रशासनिक नियंत्रण, जनता के बीच सीधा संवाद, सरकारी बंगला, वाहन और प्रशासनिक प्रोटोकॉल को ही वास्तविक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस घरेलू प्रभाव और धमक के चलते भारतीय विदेश सेवा यानी आईएफएस का विकल्प कई बार उम्मीदवारों की चर्चाओं में पीछे छूटता हुआ नजर आता है।
प्रशासनिक ताकत और प्रभाव की इस तुलना के बीच जब आर्थिक पहलुओं, कुल वेतन और जीवनशैली के लाभों की पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। उद्यमी और कंटेंट क्रिएटर अंकुर वारिकू ने दोनों प्रतिष्ठित सेवाओं के वेतन, भत्तों और करियर वृद्धि के बीच मौजूद अंतर को लेकर महत्वपूर्ण विश्लेषण साझा किया है। अंकुर वारिकू के अनुसार, भले ही देश के भीतर प्रशासनिक अधिकारियों का व्यापक जनसंपर्क और रुतबा रहता हो, लेकिन जब बात बैंक बैलेंस और वास्तविक वित्तीय कमाई की आती है तो विदेश सेवा के राजनयिक बाजी मार लेते हैं।
प्रारंभिक समानता के बाद बदलता करियर ग्राफ
संघ लोक सेवा आयोग की एक ही संयुक्त परीक्षा, एक साझा मेरिट सूची और शुरुआती प्रशिक्षण की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद दोनों कैडर के अधिकारियों की कार्यशैली बिल्कुल अलग दिशा में मुड़ जाती है। सेवा के शुरुआती दौर में दोनों ही सेवाओं के अधिकारियों का बेसिक वेतन लगभग एक बराबर रहता है। हालांकि, पांच वर्षों का कार्य अनुभव पूरा होते ही दोनों के वेतनमान और व्यक्तिगत जीवन में भारी अंतर देखने को मिलता है।
पांच साल का अनुभव होने पर जहां प्रशासनिक अधिकारी अपने गृह कैडर के भीतर सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के रूप में जमीनी स्तर का प्रशासन संभालते हैं, वहीं भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी विदेशी धरती पर स्थित भारतीय दूतावासों में थर्ड सेक्रेटरी के पद पर तैनात कर दिए जाते हैं। कार्यक्षेत्र का यही भौगोलिक बदलाव दोनों सेवाओं की वित्तीय स्थिति में बड़ा मोड़ लेकर आता है।
विदेशी भत्ते और अमेरिकी डॉलर का वित्तीय लाभ
भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा वित्तीय लाभ उनका फॉरेन अलाउंस यानी विदेशी भत्ता होता है। यह भत्ता अमेरिकी डॉलर में आंका जाता है और पूरी तरह से कर-मुक्त यानी टैक्स-फ्री होता है। आईएफएस अधिकारियों के सेवाकाल का एक बड़ा हिस्सा दुनिया भर में स्थापित भारतीय दूतावासों और उच्चायोगों में व्यतीत होता है।
ब्रिटेन, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में तैनाती मिलने पर अमेरिकी डॉलर में मिलने वाला यह विशेष भत्ता अधिकारी की कुल मासिक आय को अप्रत्याशित स्तर तक बढ़ा देता है। अंकुर वारिकू के आंकड़ों के अनुसार, 27 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते एक विदेश सेवा अधिकारी की कुल मासिक आमदनी 3 लाख से 4 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत, देश में तैनात प्रशासनिक अधिकारी को सरकारी आवास, गाड़ियां और सहायक स्टाफ जैसी प्रशासनिक सहूलियतें तो मिलती हैं, लेकिन हाथ में आने वाली उनकी इन-हैंड सैलरी इस डॉलर भत्ते के मुकाबले काफी सीमित रह जाती है।
करियर के 15 साल और मिलने वाली विशेष सुविधाएं
सेवा के 15वें वर्ष में कदम रखने तक दोनों सेवाओं के कार्यभार और विशेषाधिकारों का अंतर और अधिक व्यापक हो जाता है। 15 साल की वरिष्ठता पर प्रशासनिक अधिकारी किसी बड़े जिले के जिलाधिकारी या राज्य सचिवालय में महत्वपूर्ण नीतिगत विभागों के निदेशक पद की जिम्मेदारियां संभाल रहे होते हैं।
उसी 15 वर्ष के अंतराल में विदेश सेवा के अधिकारी प्रमुख वैश्विक राजधानियों और महत्वपूर्ण देशों के दूतावासों में फर्स्ट सेक्रेटरी अथवा काउंसलर का कूटनीतिक पद प्राप्त कर लेते हैं। इस दौरान उन्हें संबंधित देशों में आधुनिक और भव्य एंबेसी अपार्टमेंट प्रदान किए जाते हैं। इसके साथ ही राजनयिकों को उनके बच्चों की अंतरराष्ट्रीय स्तर की मुफ्त स्कूली शिक्षा जैसी प्रीमियम सुविधाएं भी सरकार की ओर से उपलब्ध कराई जाती हैं।
सेवानिवृत्ति पर वित्तीय स्थिति की तुलना
लगभग 35 वर्षों की लंबी सरकारी सेवा पूरी करने के बाद जब सेवानिवृत्ति का समय आता है, तब दोनों संवर्गों के आर्थिक स्तर का अंतर पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी सामान्यतः भारत सरकार के सचिव स्तर से सेवानिवृत्त होता है। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें नियमानुसार पेंशन तो प्राप्त होती है, लेकिन पद के साथ मिले सरकारी बंगले, वाहन और सहायक स्टाफ जैसी सभी प्रशासनिक सुविधाएं वापस ले ली जाती हैं।
दूसरी ओर, भारतीय विदेश सेवा का अधिकारी अपने करियर के शिखर पर राजदूत यानी एंबेसडर के पद से सेवानिवृत्त होता है। अपनी पूरी सेवा का एक लंबा और अहम हिस्सा टैक्स-फ्री अमेरिकी डॉलर में कमाने और उसकी विदेशी मुद्रा में बचत करने के कारण उनका वित्तीय कोष बेहद मजबूत रहता है। इस दीर्घकालिक बचत की बदौलत सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी में आईएफएस अधिकारी वित्तीय रूप से कहीं अधिक संपन्न और सुरक्षित स्थिति में रहते हैं।
प्रशासनिक सेवा का वेतनमान और पदोन्नति ढांचा
भारतीय प्रशासनिक सेवा में अधिकारियों को मिलने वाला मूल वेतन उनके सेवा के कुल वर्षों और निर्धारित पे-लेवल पर निर्भर करता है। प्रशासनिक सेवा की वेतन संरचना और पदोन्नति का आधिकारिक क्रम इस प्रकार निर्धारित है
- 1 से 4 वर्ष की सेवा: इस अवधि में अधिकारी एसडीएम या अंडर सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत रहते हैं। यह स्तर लेवल 10 के अंतर्गत आता है और इसका मूल वेतन 56,100 रुपये तय है।
- 5 से 8 वर्ष की सेवा: इस समय सीमा में अधिकारी एडीएम या डिप्टी सेक्रेटरी बनते हैं। लेवल 11 के तहत इनका मूल वेतन 67,700 रुपये होता है।
- 9 से 12 वर्ष की सेवा: इस पड़ाव पर अधिकारी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अथवा डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभालते हैं। लेवल 12 के अनुसार इनका मूल वेतन 78,800 रुपये निर्धारित है।
- 13 से 16 वर्ष की सेवा: इस सेवाकाल में अधिकारी डीएम या सिलेक्शन ग्रेड डायरेक्टर का पद संभालते हैं। यह लेवल 13 में आता है, जहां मूल वेतन 1,18,500 रुपये हो जाता है।
- 16 से 24 वर्ष की सेवा: वरिष्ठता बढ़ने पर अधिकारी डिविजनल कमिश्नर या जॉइंट सेक्रेटरी बनते हैं। लेवल 14 के इस पद पर मूल वेतन 1,44,200 रुपये मिलता है।
- 25 से 30 वर्ष की सेवा: इस वरिष्ठ स्तर पर अधिकारी प्रिंसिपल सेक्रेटरी या एडिशनल सेक्रेटरी के रूप में कार्य करते हैं। लेवल 15 के तहत इनका मूल वेतन 1,82,200 रुपये रहता है।
- 34 से 36 वर्ष की सेवा: राज्य के चीफ सेक्रेटरी या भारत सरकार के सेक्रेटरी के रूप में तैनात अधिकारियों को लेवल 17 में 2,25,000 रुपये का मूल वेतन दिया जाता है।
- 37 वर्ष से अधिक की सेवा: देश के शीर्ष प्रशासनिक पद यानी कैबिनेट सेक्रेटरी ऑफ इंडिया पर पहुंचने वाले अधिकारी को लेवल 18 के तहत 2,50,000 रुपये का सर्वोच्च मूल वेतन मिलता है।


















