अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुफिया अधिकारियों के खिलाफ नई जांच का आदेश दिया है। ट्रंप का आरोप है कि इन अधिकारियों ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में चीन की कथित दखलंदाजी से जुड़ी जानकारी जानबूझकर छिपाई। इस दावे के बाद वॉशिंगटन से लेकर बीजिंग तक हलचल मच गई है।
ट्रंप का आरोप, 'डीप स्टेट' ने की लीपापोती
बीते गुरुवार को चुनावी निष्पक्षता पर भाषण देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि हाल ही में सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से साफ है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के भीतर मौजूद तथाकथित 'डीप स्टेट' के सदस्यों ने 2020 के चुनाव में चीन की दखलंदाजी की असली गहराई को जानबूझकर दबाया और उसे मामूली बताकर पेश किया। उनके मुताबिक, यह जानकारी न तो उस वक्त के राष्ट्रपति को दी गई और न ही आम अमेरिकी जनता को, यानी देश की सत्ता और आम वोटर दोनों को अंधेरे में रखा गया।
18 राज्यों में वोटर्स का डेटा चुराने का आरोप
ट्रंप ने कहा कि 2020 में ही अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पता चल गया था कि चीन ने अमेरिका के 18 राज्यों में करोड़ों वोटर्स का डेटा खरीदा, चुराया या हैक किया था। इसके बावजूद इन एजेंसियों ने न तो राष्ट्रपति को इसकी जानकारी दी और न ही अमेरिकी कांग्रेस को बताया। इसके उलट, अधिकारी बार-बार यही दोहराते रहे कि 2020 का राष्ट्रपति चुनाव अमेरिका के इतिहास का सबसे सुरक्षित चुनाव था, जबकि उनके पास वोटर डेटा में विदेशी सेंधमारी के सबूत मौजूद थे।
चीन पर ट्रंप के विरोधियों के साथ मिलीभगत का आरोप
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए ट्रंप ने दावा किया कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने उनके राजनीतिक विरोधियों का इस्तेमाल किया और 2018 के मिड टर्म इलेक्शन के साथ-साथ 2020 के राष्ट्रपति चुनाव को भी प्रभावित करने की कोशिश की। ट्रंप ने इसे चीन की तरफ से अमेरिकी लोकतंत्र में लगातार दखल देने की एक बड़ी कड़ी के तौर पर पेश किया।
नकारात्मक खबरों के लिए पत्रकारों को पैसे देने की कोशिश
डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि चीनी सरकार ने अमेरिका के बिजनेस लीडर्स और पत्रकारों को भी अपने पाले में लाने की कोशिश की। उनके मुताबिक, दस्तावेजों से पता चलता है कि चीन उन अमेरिकी पत्रकारों की पहचान करना चाहता था जिन्होंने पहले उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें लिखी थीं, और फिर उन्हीं पत्रकारों को मोटी रकम देकर राष्ट्रपति के खिलाफ और नकारात्मक आर्टिकल लिखवाने की कोशिश की गई। ट्रंप ने इसे पैसों के दम पर अमेरिकी जनमत को अपने खिलाफ मोड़ने की सुनियोजित कोशिश बताया।
चार बड़ी एजेंसियों को जांच के आदेश
अपनी कार्रवाई का ऐलान करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस, एफबीआई (FBI), सीआईए (CIA) और डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस को खुफिया जानकारी छिपाने के इस कथित मामले की जांच करने का निर्देश दिया है। इस आदेश के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी खुफिया और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अब अपने ही पुराने कामकाज की जांच करनी होगी।
22 करोड़ वोटर्स का डेटा चोरी होने का भी दावा
व्हाइट हाउस की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी जानकारी के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन का यह भी आरोप है कि 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान चीन ने गैर-कानूनी तरीके से 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं की फाइलें हासिल कर लीं। इसे अब तक की चुनावी डेटा की सबसे बड़ी सेंधमारी बताया गया है। ये दस्तावेज व्हाइट हाउस की चुनावी निष्पक्षता से जुड़ी पहल के तहत सार्वजनिक किए गए हैं।
इन दावों के मायने
ट्रंप के ये तमाम आरोप एक बार फिर अमेरिकी राजनीति की सबसे गरम बहस को हवा दे रहे हैं कि क्या 2020 के चुनाव में विदेशी ताकतों ने वाकई दखल दिया था और क्या खुफिया एजेंसियां उस वक्त जनता से सच छिपा रही थीं। ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस, एफबीआई, सीआईए और डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस को जांच का आदेश देकर ट्रंप ने एक ऐसी प्रक्रिया शुरू कर दी है जिसमें आने वाले महीनों में और भी दस्तावेज सार्वजनिक हो सकते हैं और सार्वजनिक सुनवाई भी हो सकती है, जिससे 2020 के चुनाव को लेकर विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा।




















