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जाते-जाते तुलसी गबार्ड का बड़ा कदम: 30 से ज्यादा देशों में अमेरिकी फंडिंग वाली 120+ बायोलैब्स की फाइलें सार्वजनिकअमेरिका
13 जून 2026, 8:20 am (92 दिन पहले)· 2

जाते-जाते तुलसी गबार्ड का बड़ा कदम: 30 से ज्यादा देशों में अमेरिकी फंडिंग वाली 120+ बायोलैब्स की फाइलें सार्वजनिक

अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड के ऑफिस ने दस्तावेज जारी कर माना कि अमेरिकी सरकार ने 30 से ज्यादा देशों में 120 से अधिक बायोलैब्स को फंडिंग दी, जिनमें यूक्रेन की लैब्स भी शामिल हैं। हालांकि कहीं भी यह नहीं कहा गया कि इन लैब्स में जैविक हथियार बने।

रूस सालों से जिस बात को लेकर वॉशिंगटन पर उंगली उठाता आया है, अब वही स्वीकारोक्ति खुद अमेरिकी सरकार की ओर से आई है। नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर (DNI) तुलसी गबार्ड के दफ्तर ने ऐसे दस्तावेज जारी किए हैं, जिनमें कबूल किया गया है कि अमेरिकी सरकार ने दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में फैली 120 से अधिक बायोलैब्स को पैसा दिया। इन प्रयोगशालाओं में जैविक रोगाणुओं यानी पैथोजेन्स पर लंबे समय से शोध होता रहा है, और इनमें यूक्रेन की वे लैब्स भी हैं जिन पर रूस-यूक्रेन जंग के दौरान बार-बार विवाद खड़ा हुआ।

दस्तावेजों में क्या-क्या सामने आया

12 जून को जारी अपने बयान में DNI कार्यालय ने बताया कि इनमें से कुछ लैब्स में ऐसे पैथोजेन्स पर भी काम चलता रहा, जिन्हें खतरनाक श्रेणी में रखा जाता है। बयान में यह भी याद दिलाया गया कि अमेरिकी खुफिया तंत्र पहले ही आगाह कर चुका था कि यूक्रेन में मौजूद एक अमेरिकी फंडेड लैब में खतरनाक रोगाणु हो सकते हैं, और उस पर रूसी हमले, कब्जे या क्षति का अंदेशा बना हुआ था।

गबार्ड ने 12 जून 2026 को सोशल मीडिया पर लिखा कि वह ऐसी इंटेलिजेंस सार्वजनिक कर रही हैं जो पहले कभी सामने नहीं आई और जो यूक्रेन समेत 30 से ज्यादा देशों की 120 से अधिक बायोलैब्स को मिली पुरानी अमेरिकी फंडिंग का नया सबूत देती है। उन्होंने इसे राष्ट्रपति Trump के उस कार्यकारी आदेश से जोड़ा, जो खतरनाक गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च की संघीय फंडिंग रोकने के लिए लाया गया था।

अमेरिका आखिर बायोलैब्स को पैसा क्यों देता है

यह खुलासा ऐसे मोड़ पर आया है जब गबार्ड DNI का पद छोड़ने वाली हैं। दिलचस्प यह है कि उनके दफ्तर ने यह नहीं बताया कि यह जानकारी ठीक अभी क्यों जारी की गई, और रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इसमें वाकई कुछ बिल्कुल नया है या पहले से ज्ञात बातें ही दोबारा रखी गई हैं। असल में शीत युद्ध खत्म होने के बाद से अमेरिका ‘कोऑपरेटिव थ्रेट रिडक्शन प्रोग्राम’ के तहत उन वैज्ञानिक कार्यक्रमों और सुविधाओं को सुरक्षित करने में निवेश करता आया है, जो कभी सोवियत संघ के जैविक और रासायनिक अनुसंधान ढांचे का हिस्सा थे। इस दायरे में यूक्रेन की राजधानी कीव, जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी और पूर्व सोवियत इलाके के कई अन्य केंद्र आते रहे हैं। गबार्ड का कहना है कि उन्होंने वह ब्योरा जनता के सामने रखा है, जिस पर पहले बात करने वाले को सीधे विदेशी एजेंट करार दे दिया जाता था।

ट्रंप सरकार की दिलचस्पी क्यों बढ़ी

दूसरी बार सत्ता में लौटने के बाद Donald Trump की सरकार ने जैविक अनुसंधान और खासकर कोविड-19 की उत्पत्ति से जुड़े सवालों पर तीखा रुख अख्तियार किया है। चीन की एक लैब से कोविड वायरस के लीक होने के आरोप अब भी थमे नहीं हैं। प्रशासन का तर्क है कि अमेरिकी पैसे से चलने वाली कई लैब्स में ‘खतरनाक और बेहद संक्रामक पैथोजेन्स’ पर शोध हुआ है, और बिना सख्त निगरानी ऐसे काम को आगे नहीं बढ़ने दिया जा सकता।

इसी सोच के चलते मई 2025 में राष्ट्रपति Trump ने एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत किए थे, जिसके जरिए दुनियाभर में अमेरिकी फंडिंग से होने वाली ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ पर रोक लगा दी गई। यह वह शोध है जिसमें जीवों या रोगाणुओं के जैविक गुणों में फेरबदल कर उनकी क्षमता बढ़ाई जाती है।

रूस के पुराने आरोप और अमेरिका का जवाब

पश्चिमी देशों से रिश्ते बिगड़ने के बाद से मॉस्को लगातार यह आरोप दोहराता रहा है कि अमेरिका विदेशों में ऐसी बायोलैब्स को पैसा दे रहा है, जहां संभावित जैविक हथियारों से जुड़ा काम हो सकता है। अमेरिका इन आरोपों को हर बार खारिज करता आया है। वह 1975 के जैविक हथियार प्रतिबंध समझौते का हस्ताक्षरकर्ता भी है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ये लैब्स बीमारियों पर नियंत्रण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक शोध के लिए हैं, न कि हथियार गढ़ने के लिए।

यूक्रेन युद्ध के समय भी गरमाया था मुद्दा

2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण सैन्य हमला छेड़ा, तब मॉस्को ने वहां मौजूद अमेरिकी फंडेड बायोलैब्स का मुद्दा बार-बार उठाया था। इसके जवाब में 2023 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रूस पर जैविक हथियारों के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप मढ़ा था। मंत्रालय ने तब कहा था कि रूस अपने हमले से दुनिया का ध्यान भटकाने, कीव के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन घटाने और जंग को जायज ठहराने की नीयत से ऐसे दावे कर रहा है।

बायोलैब्स को लेकर जो समझना जरूरी है

बायोलैब्स का होना अपने आप में कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में ऐसी प्रयोगशालाएं मौजूद हैं, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य, वैक्सीन निर्माण और संक्रामक बीमारियों पर शोध जैसे काम होते हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि गबार्ड के दफ्तर ने फंडिंग और इन लैब्स के वजूद की पुष्टि भर की है, लेकिन कहीं यह दावा नहीं किया कि इनमें जैविक हथियार बनाए गए। एक आम बायोलैब और हथियार तैयार करने वाली बायोलैब दो अलग चीजें हैं।

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