वॉशिंगटन में अमेरिकी सीनेट द्वारा पारित एक नए प्रतिबंध विधेयक ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और व्यापारिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। रूस की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से लाए गए इस कदम के तहत रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि, भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ थोपने की इस योजना पर खुद अमेरिकी संसद के भीतर तीखा विरोध शुरू हो गया है। सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ सीनेटर रैंड पॉल ने इस नीति को अमेरिका के अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद नुकसानदायक करार दिया है।
रैंड पॉल की चेतावनी: भारत पर कार्रवाई अमेरिका के लिए आत्मघाती
सीनेटर रैंड पॉल ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे अपने ही पैरों पर गोली मारने जैसा फैसला बताया। उनका कहना है कि वॉशिंगटन इस समय वैश्विक मंच पर चीन की आर्थिक और सैन्य चुनौतियों से निपटने के लिए भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने में जुटा है। ऐसे नाजुक मोड़ पर भारत से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने की बात करना पूरी तरह अतार्किक है। रैंड पॉल ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक दंडात्मक कदम उठाने से न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उल्टा असर पड़ेगा, बल्कि भारत जैसा प्रमुख सहयोगी देश अमेरिका से दूर होकर रूस और चीन के अधिक करीब आ सकता है, जो अमेरिकी विदेश नीति के दीर्घकालिक लक्ष्यों के पूरी तरह खिलाफ होगा।
'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के प्रावधान
अमेरिकी सीनेट ने जिस विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, उसका नाम 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' है। इस कानून का मुख्य लक्ष्य मास्को की तेल और प्राकृतिक गैस से होने वाली कमाई पर शिकंजा कसना है। इस विधेयक के माध्यम से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वे उन सभी देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगा सकते हैं जो रूस से ऊर्जा संसाधनों की खरीदारी जारी रखेंगे।
संभावित टैरिफ की इस सूची में भारत और चीन जैसे ऊर्जा के बड़े आयातक देश प्रमुखता से शामिल हैं। इनके अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देशों को भी इस दायरे में रखा गया है। इस विधेयक में केवल व्यापारिक शुल्क ही नहीं, बल्कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, उनके करीबी सहयोगियों, प्रभावशाली उद्योगपतियों (ओलिगार्क्स) और रूस के प्रमुख वित्तीय संस्थानों पर भी कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई है।
अमेरिकी राजनीति में मतभेद और अगला कानूनी चरण
मास्को पर दबाव बनाने के नाम पर लाए गए इस विधेयक को लेकर अमेरिका के राजनीतिक हलकों में एकराय नहीं बन पा रही है। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल के अलावा विपक्षी डेमोक्रैट पार्टी के कई सांसदों ने भी इस पर अपनी गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। डेमोक्रैट्स का मानना है कि राष्ट्रपति को टैरिफ तय करने की असीमित शक्तियां सौंपने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन पर बुरा असर पड़ सकता है।
सीनेट से हरी झंडी मिलने के बाद अब यह विधेयक अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में भेजा जाएगा। अगले सत्र के दौरान प्रतिनिधि सभा में इस पर विस्तृत बहस होगी और अंतिम मतदान कराया जाएगा। प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। हालांकि, बहस की शुरुआत में ही उभरे अंतर्विरोध यह संकेत दे रहे हैं कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर कठोर आर्थिक पाबंदियां लगाना अमेरिका की अपनी वैश्विक रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।



















