अमेरिका में स्कूलों की सुरक्षा के लिए लागू की गई सख्त नीतियां अब मासूम बच्चों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छोटी-मोटी हरकतों और बचकानी शरारतों पर भी पुलिस बच्चों को हथकड़ी लगाकर जेल भेजने से नहीं चूक रही है। खिलौने फेंकने, मोबाइल फोन छीनने पर शिक्षकों से बहस करने या सामान्य बोलचाल की नोकझोंक जैसे मामलों में भी छात्रों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। साल 2014 के बाद से अकेले टेक्सास राज्य में ही स्कूली बच्चों के खिलाफ 47 हजार से ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज किए जाने का मामला सामने आया है।
महज चार सेकंड की चेतावनी और हाथों में हथकड़ी
टेक्सास के एक स्कूल परिसर की घटना इस कठोर प्रशासनिक रवैये की बानगी पेश करती है। एक 12 साल की बच्ची अपने कंधे पर बस्ता टांगे हुए स्कूल की लॉबी में खड़ी थी। कुछ ही समय पहले विद्यालय के प्रिंसिपल ने उसे वहीं खड़े होकर अपनी मां का इंतजार करने का निर्देश दिया था। जब बच्ची अपनी जगह से नहीं हिली, तो वहां एक पुलिस अधिकारी आ गया। अधिकारी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए महज चार सेकंड की उल्टी गिनती शुरू कर दी और चेतावनी दी कि बात न मानने पर उसे हथकड़ी लगाकर बाल सुधार गृह भेज दिया जाएगा। बच्ची इस पूरी स्थिति को समझ भी नहीं पाई थी कि अधिकारी ने उसका बैग उतारकर उसके छोटे हाथों में हथकड़ी कस दी।
उवाल्डे गोलीबारी के बाद बदले गए थे सुरक्षा नियम
इस तरह के कड़े प्रावधानों के पीछे साल 2022 में उवाल्डे स्कूल में हुई गोलीबारी की घटना का बड़ा हाथ है, जिसके बाद सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए हर सरकारी स्कूल में पुलिसकर्मियों की तैनाती अनिवार्य कर दी गई थी। इस नीति का मुख्य उद्देश्य किसी भी बाहरी खतरे या हमलावर से निपटना था, लेकिन इसका दायरा बढ़कर स्कूल के अंदरूनी अनुशासन मामलों तक फैल गया। नतीजा यह हुआ कि छोटी-मोटी गलतियों पर भी छात्रों की गिरफ्तारियां होने लगीं। केवल शैक्षणिक वर्ष 2024-25 के दौरान ही लगभग 4,800 बच्चों को पुलिस के सुपुर्द किया गया, जो कि एक दशक पहले के आंकड़ों की तुलना में एक-तिहाई अधिक है। इन मामलों में फंसने वाले अधिकांश बच्चों की उम्र 10 से 13 वर्ष के बीच है।
साधारण शरारतों पर लग रही हैं गंभीर धाराएं
पूर्व पुलिस डिटेक्टिव फिलिप लायंस का इस बारे में कहना है कि पुलिस बलों को बच्चों के साथ सही ढंग से पेश आने की कोई विशेष या बुनियादी ट्रेनिंग नहीं दी जाती है। जिन मुद्दों को स्कूल के प्रिंसिपल की डांट, आपसी समझाइश या माता-पिता को स्कूल बुलाकर आसानी से सुलझाया जा सकता था, उनमें पुलिस सीधे तौर पर दखल देने लगी है। खेल के मैदान पर होने वाली आम बहसों और लड़ाइयों को भी ‘आतंकी धमकी’ जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में रख दिया जाता है। कई कम उम्र के बच्चों को पुलिस थाने की हवालात में रातें गुजारनी पड़ी हैं, उनके फिंगरप्रिंट लिए गए हैं और अदालतों के चक्कर काटने पड़े हैं, जिससे उनके कोमल मन में पुलिस का भारी खौफ बैठ गया है और वे गंभीर मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय में काउंसलिंग है बेहतर विकल्प
मनोवैज्ञानिक कैथलीन ओ’कॉनर का मानना है कि 10 से 13 वर्ष की आयु वह दौर होती है जब बच्चों के मस्तिष्क का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील पड़ाव पर उनके प्रति दंडात्मक और क्रूर रवैया अपनाने से उनमें हीनभावना घर कर जाती है और वे भविष्य में खतरनाक व जोखिम भरे व्यवहार की तरफ बढ़ सकते हैं। हालांकि, कुछ जिलों ने इस पुरानी व्यवस्था में बदलाव भी किए हैं। विचिटा फॉल्स जिले के सुपरिंटेंडेंट डॉनी ली ने स्कूलों से पुलिस अफसरों को हटाकर बच्चों के लिए काउंसलिंग और सकारात्मक अनुशासन पर जोर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वहां गिरफ्तारियों में भारी कमी आई है। उनका साफ कहना है कि उनका काम जुर्म और सजा का कारोबार चलाना नहीं, बल्कि शिक्षा देना है।



















