अमेरिका में पढ़ाई कर रहे विदेशी विद्यार्थियों और वहाँ कार्यरत विदेशी पत्रकारों के लिए एक बड़ी राहत सामने आई है। मैसाचुसेट्स के एक ज़िला जज ने उस नए नियम पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों और पत्रकारों के अमेरिका में रुकने, पढ़ने या काम करने की अवधि पर बेहद कड़े प्रतिबंध लगाए जा रहे थे। सोमवार को आया यह न्यायिक फैसला ठीक उसी समय जारी हुआ, जब यह विवादास्पद नियम अगले ही दिन यानी मंगलवार से पूरे देश में लागू होने जा रहा था। इस रोक से भारत समेत कई देशों के उन हज़ारों छात्रों को तुरंत राहत मिली है, जो नए दिशानिर्देशों के कारण अपनी शिक्षा और भविष्य को लेकर भारी असमंजस में थे।
अर्थव्यवस्था और उच्च शिक्षा पर गंभीर असर का हवाला
अदालत में सुनवाई के दौरान जज एफ डेनिस सैलर चतुर्थ ने स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन की यह नई नीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहाँ की उच्च शिक्षा प्रणाली को विनाशकारी नुकसान पहुँचा सकती है। सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह पाबंदी ज़रूरी है, लेकिन अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत द्वारा जारी किए गए प्रारंभिक निषेधाज्ञा आदेश के तहत इस नियम के क्रियान्वयन को तब तक के लिए रोक दिया गया है, जब तक कि मामले की पूरी कानूनी सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।
मामले में सरकार का यह भी कहना था कि अगर कोई राहत दी जाती है तो उसे सिर्फ याचिकाकर्ता संस्थानों तक ही सीमित रखा जाए, न कि पूरे देश पर लागू किया जाए। जज सैलर ने सरकार की इस मांग को सिरे से नकार दिया। उन्होंने अपने आदेश में रेखांकित किया कि याचिका दायर करने वाले समूह भले ही लगभग 600 सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, लेकिन पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में 5,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थान संचालित हैं। अगर अदालत की राहत केवल याचिकाकर्ता संस्थानों तक सीमित रखी जाती, तो इससे देश के भीतर दो अलग-अलग नियम तंत्र खड़े हो जाते। अधिकारियों को हर बार यह जटिल और विरोधाभासी फैसला करना पड़ता कि कोई छात्र या संस्थान इस आदेश के दायरे में आता है या नहीं।
जुलाई में तैयार हुए नियमों में क्या थीं पाबंदियां
ट्रंप प्रशासन द्वारा जुलाई में अंतिम रूप दिए गए इस नियम के तहत छात्र और एक्सचेंज विज़िटर वीज़ा की अवधि अधिकतम चार साल तय कर दी गई थी। वहीं विदेशी पत्रकारों के वीज़ा की अवधि को घटाकर अधिकतम 240 दिनों तक सीमित किया गया था। इसमें चीन के पत्रकारों के लिए और भी सख्त प्रावधान रखे गए थे, जहाँ उनके वीज़ा की सीमा केवल 90 दिन निर्धारित की गई थी। नए नियमों के अंतर्गत छात्रों और मीडियाकर्मियों को वीज़ा विस्तार के लिए आवेदन करने की छूट तो दी गई थी, लेकिन यह पूरी तरह होमलैंड सुरक्षा विभाग यानी डीएचएस (DHS) के अधिकारियों के विवेक पर निर्भर था। सबसे गंभीर बात यह थी कि यदि किसी का विस्तार आवेदन खारिज कर दिया जाता, तो उस फैसले के खिलाफ अपील करने का कोई भी कानूनी प्रावधान नहीं रखा गया था।
विश्वविद्यालयों और कामगार यूनियनों का कड़ा विरोध
नियम जारी होने के बाद से ही उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई संगठनों और श्रम यूनियनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और इसे अदालत में चुनौती दी थी। हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन एम गार्बर ने जुलाई में इस नियम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे अजीब करार दिया था। उन्होंने सामान्य पीएचडी कार्यक्रमों की वास्तविक अवधि और इस चार साल की पाबंदी के बीच के विरोधाभास को रेखांकित किया था। गार्बर का कहना था कि एक सामान्य पीएचडी कार्यक्रम को पूरा करने में आमतौर पर कम से कम छह साल का समय लगता है, ऐसे में वीज़ा की समयसीमा चार साल तय करना पूरी तरह बेतुका लगता है।
दुरुपयोग की आशंका और सरकार की मंशा पर सवाल
दूसरी तरफ होमलैंड सुरक्षा विभाग ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया था कि वीज़ा की निश्चित अवधि तय करने से फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी और तय अवधि से अधिक समय तक रुकने वाले लोगों को रोकने में मदद मिलेगी। हालाँकि, जज ने अपने फैसले में इस नियम के संभावित दुरुपयोग की गंभीर आशंका जताई। उन्होंने विशेष रूप से यह टिप्पणी दर्ज की कि इस बात की पूरी संभावना है कि जो विदेशी पत्रकार सरकार या खासकर डीएचएस अधिकारियों की कार्यप्रणाली के आलोचक होंगे, उनके वीज़ा नवीनीकरण को जानबूझकर रोक दिया जाएगा।
जज ने प्रारंभिक निषेधाज्ञा जारी करते हुए लिखा कि नियम और इसके पीछे दिए गए कथित तर्कों के बीच का कमज़ोर संबंध कई वाजिब सवाल खड़े करता है। अदालत के अनुसार इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या इसका वास्तविक मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना और सीमाओं को सुरक्षित रखना है, या फिर कुछ अन्य अघोषित लक्ष्यों को साधना है, जैसे कि शैक्षणिक संस्थानों और स्वतंत्र प्रेस पर सरकार का शिकंजा कसना। इस आदेश के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि जब तक अदालत में इस मुकदमे की अंतिम सुनवाई नहीं होती, तब तक पुराने नियमों के अनुसार ही विदेशी छात्रों और पत्रकारों की वीज़ा प्रक्रिया जारी रहेगी।


















