सीमा पार से होने वाली पारंपरिक घुसपैठ और हमलों में नाकामी का सामना करने के बाद पड़ोसी देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना ने एक खतरनाक डिजिटल षड्यंत्र का सहारा लिया है। इस नई चाल के तहत भारतीय समाज के भीतर असंतोष, भ्रम और सामाजिक विभाजन पैदा करने के लिए भारत के ही बेरोजगार युवाओं को हथियार बनाया जा रहा था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में मिली मात के बाद पाकिस्तानी सैन्य तंत्र ने ‘नैरेटिव वॉरफेयर’ यानी सूचना युद्ध के जरिए देश में आंतरिक तनाव फैलाने के लिए एक गुप्त नेटवर्क तैयार किया। इस पूरे गुप्त अभियान को ‘ऑपरेशन द ग्राउंड वायर’ नाम का गुप्त कोड दिया गया था।
इस खुफिया नेटवर्क का मुख्य मकसद पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर चुके 22 से 26 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को आकर्षक मासिक वेतन का लालच देकर उनसे संवेदनशील विषयों पर मनगढ़ंत और विवादित वीडियो सामग्री तैयार करवाना था। इन युवाओं को यह आभास कराया जाता था कि वे एक सामान्य भारतीय डिजिटल समाचार मंच के लिए जमीनी स्तर पर जनता की राय रिकॉर्ड कर रहे हैं, जबकि असल में उनकी रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा रहा था।
पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी के हाथों में थी कमान
इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य रणनीतिकार पाकिस्तानी सेना का एक वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल जिया था। उसने भारतीय युवाओं की आर्थिक मजबूरी और रोजगार की तलाश को हथियार बनाकर उन्हें अपने जाल में फंसाने का खाका तैयार किया। योजना बेहद सोची-समझी थी, जिसके तहत सीधे तौर पर किसी विदेशी प्रचार तंत्र का नाम लिए बिना भारत के आम नागरिकों और नए पत्रकारों को आगे किया गया।
इन नए पत्रकारों को देश के अत्यंत संवेदनशील सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर आम लोगों की राय के नाम पर इंटरव्यू रिकॉर्ड करने का काम सौंपा जाता था। इस तरह रिकॉर्ड की गई बातचीत को इस रूप में पेश करने की योजना थी कि भारत के सामान्य नागरिक खुद अपने ही देश की व्यवस्था, सरकार और सुरक्षा तंत्र के विरुद्ध खड़े दिखाई दें। इससे दुनिया के सामने यह साबित करने की कोशिश की जाती कि देश के अंदर भारी जनाक्रोश और असंतोष का माहौल है।
फर्जी डिजिटल मंच ‘भारत बाइट्स न्यूज’ का गठन
अपने इस देश विरोधी एजेंडे को वैध और निष्पक्ष पत्रकारिता का चोला पहनाने के लिए पाकिस्तानी मिलिट्री इंटेलिजेंस ने ‘भारत बाइट्स न्यूज’ नाम से एक छद्म डिजिटल मीडिया संस्थान खड़ा किया। यह फर्जी नेटवर्क सिर्फ कागजों पर नहीं था, बल्कि इसने डिजिटल दुनिया में अपनी पूरी मौजूदगी दर्ज करा रखी थी। इस मंच की एक आधिकारिक दिखने वाली वेबसाइट bbnewsofficial.in संचालित हो रही थी। इसके अतिरिक्त यह नेटवर्क एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया मंचों पर भी सक्रिय था।
इस मंच का रंग-रूप, लोगो और प्रस्तुति शैली बिल्कुल किसी वास्तविक भारतीय डिजिटल न्यूज पोर्टल जैसी रखी गई थी, ताकि सामग्री देखने वाले किसी भी सामान्य नागरिक या जांचकर्ता को पहली नजर में किसी विदेशी हाथ का संदेह न हो। इसका असली उद्देश्य भारतीय जनमानस के बीच भ्रम के बीज बोना और पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा को खुद भारतीयों की आवाज बनाकर प्रसारित करना था। पत्रकारिता कॉलेज से पास होकर नौकरी खोज रहे युवाओं को करियर की शुरुआत का भरोसा देकर धीरे-धीरे इस जाल में पूरी तरह उलझा लिया गया।
सोशल मीडिया विज्ञापनों और फर्जी नंबरों से फंसाने का तरीका
युवाओं को इस नेटवर्क में भर्ती करने की कार्यप्रणाली आधुनिक डिजिटल माध्यमों और सुनियोजित चालाकी पर आधारित थी। सबसे पहले इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय मंचों पर पत्रकारिता फ्रेशर्स और व्लॉगर्स को लक्षित करते हुए आकर्षक रोजगार और करियर के विज्ञापन चलाए जाते थे। इन विज्ञापनों में अच्छे वेतन, फील्ड रिपोर्टिंग के अवसर और डिजिटल मीडिया में शानदार अनुभव का वादा किया जाता था।
जैसे ही कोई युवा इन विज्ञापनों पर प्रतिक्रिया देता था, पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स उनसे तुरंत संपर्क साधते थे। बातचीत के लिए भारतीय मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किया जाता था, जिन्हें जाली दस्तावेजों और फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर हासिल किया गया था। प्राथमिक बातचीत के बाद संवाद को व्हाट्सएप जैसे एनक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स पर स्थानांतरित कर दिया जाता था। जब कुछ स्थानीय युवा इस तंत्र से जुड़ गए, तो उन्हें अपने दोस्तों और परिचितों को रेफरल के जरिए जोड़ने पर अतिरिक्त लाभ का लालच दिया गया। इस तरह नौकरी खोज रहे नौजवानों और व्लॉगिंग के शौकीनों का एक बड़ा नेटवर्क अनजाने में इस साजिश का हिस्सा बनता चला गया।
संवेदनशील मुद्दों पर आधारित स्क्रिप्टेड एजेंडा
पाकिस्तानी हैंडलर्स इन युवा रिपोर्टरों को कोई सामान्य दैनिक खबरें कवर करने की अनुमति नहीं देते थे। उनके लिए जो विषय तय किए जाते थे, वे पूरी तरह से पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट पर आधारित होते थे। उनका एकमात्र उद्देश्य देश के सौहार्द को चोट पहुंचाना और सामाजिक तनाव को हवा देना था।
- सीजेपी प्रदर्शनों पर खास जोर: पाकिस्तानी हैंडलर्स ने भारतीय रिपोर्टरों को विशेष रूप से सीजेपी से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को कवर करने का निर्देश दिया था, ताकि समाज के भीतर मतभेदों और टकराव को बड़े पैमाने पर उभारा जा सके।
- राम मंदिर और दान से जुड़े मनगढ़ंत विवाद: अयोध्या में मंदिर निर्माण से जुड़े फर्जी दान घोटालों और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे विषयों पर काल्पनिक और गढ़े हुए पात्रों के इंटरव्यू तैयार करने के निर्देश दिए जाते थे।
- सुरक्षा बलों के मनोबल पर हमला: देश की रक्षा तैयारियों और सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास पैदा करने के लिए पहलगाम में हुए आतंकी हमले में सुरक्षा खामियों और राफेल विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से संबंधित झूठे दावों वाले वीडियो तैयार कराए जाते थे।
- आंतरिक तनाव और कथित मुद्दे: समाज में वैमनस्य बढ़ाने के लिए गरीबी, भ्रष्टाचार, प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल और धार्मिक स्थलों को गिराए जाने से जुड़े संवेदनशील विषयों पर तैयार की गई झूठी पटकथाओं के आधार पर जनता की बनावटी राय रिकॉर्ड कराई जाती थी।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे भारतीय युवा केवल कच्ची वीडियो फुटेज रिकॉर्ड करते थे और उसे व्हाट्सएप के माध्यम से अपने हैंडलर्स को भेज देते थे। इसके बाद सीमा पार बैठी तकनीकी और संपादन टीम उस फुटेज को तोड़-मरोड़ कर भारत विरोधी रंग देती थी। एडिटिंग पूरी होने के बाद इन वीडियो को भारत बाइट्स न्यूज के विभिन्न डिजिटल हैंडल्स पर व्यापक स्तर पर प्रचारित कर दिया जाता था।
वेतन का प्रलोभन और जटिल वित्तीय नेटवर्क
इस नेटवर्क से जुड़े नए पत्रकारों को अपने साथ बनाए रखने के लिए हर महीने 30,000 से 40,000 रुपये का नियमित वेतन दिया जाता था। अपनी पढ़ाई खत्म करके नौकरी की तलाश में भटक रहे किसी भी नए स्नातक के लिए यह धनराशि अत्यंत आकर्षक थी, जिसके चलते वे बिना गहराई में गए काम करते रहे।
सुरक्षा और वित्तीय जांच एजेंसियों की पकड़ से बचने के लिए पैसों के लेनदेन का बेहद उलझा हुआ और बहुस्तरीय रास्ता चुना गया था। पाकिस्तान से धन सबसे पहले विदेशी क्रिप्टो एजेंटों के पास भेजा जाता था। क्रिप्टो एजेंट उस रकम को स्थानीय मुद्रा में बदलकर विभिन्न बिचौलियों तक पहुंचाते थे। इसके बाद कई अलग-अलग बैंक खातों, जाली यूपीआई आईडी और सीधे नकद भुगतान के जरिए यह पैसा भारतीय युवाओं तक पहुंचाया जाता था। इस जांच में यह भी सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख योगदानकर्ताओं को अपनी रिपोर्टिंग करने के साथ-साथ कनिष्ठ टीमों के प्रबंधन का जिम्मा भी सौंपा गया था।


















