संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के मंच पर ईरान से जुड़े प्रतिबंधों की व्यवस्था को लेकर वैश्विक शक्तियों के बीच खींचतान एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिका की ओर से पेश किए गए उस मसौदा प्रस्ताव को बड़ा झटका लगा है, जिसमें ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के अनुपालन की समीक्षा करने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल की समयसीमा को एक अतिरिक्त वर्ष के लिए बढ़ाने का प्रावधान था। पंद्रह सदस्यीय परिषद के ग्यारह सदस्यों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि पाकिस्तान समेत दो अन्य देशों ने इस पूरी प्रक्रिया में मतदान से दूरी बनाए रखी। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद के दो स्थायी सदस्यों, रूस और चीन, द्वारा वीटो शक्ति का इस्तेमाल किए जाने से यह पहल वहीं निष्प्रभावी हो गई। इसके साथ ही लंबे समय से ईरान की तकनीकी गतिविधियों और आपूर्ति शृंखला पर नजर रखने वाली यह औपचारिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था अपने समापन की ओर पहुंच गई है।
वीटो के साथ खत्म हुआ स्वतंत्र तकनीकी निगरानी का तंत्र
सुरक्षा परिषद में रूस और चीन के कड़े रुख का सीधा परिणाम यह हुआ है कि प्रतिबंधों की जांच करने वाले विशेष पैनल का कार्यकाल समाप्त होते ही उसकी वैधानिक गतिविधियां भी पूरी तरह बंद हो जाएंगी। यह विशेषज्ञ दल सुरक्षा परिषद को उन सभी गतिविधियों पर विस्तृत और स्वतंत्र रिपोर्ट सौंपने के लिए अधिकृत था, जिनमें सैन्य साजोसामान का अवैध हस्तांतरण, मिसाइल तकनीक का फैलाव और व्यापारिक पाबंदियों का संभावित उल्लंघन शामिल था। इस व्यवस्था के समाप्त होने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास अब कोई ऐसा तटस्थ संस्थागत ढांचा नहीं बचेगा, जो जमीनी स्तर पर जाकर इन उल्लंघनों की आधिकारिक पुष्टि कर सके। पश्चिमी राजनयिकों का पक्ष था कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव के बीच इस तरह के निगरानी तंत्र का टूटना वैश्विक नियमों के क्रियान्वयन को बेहद कमजोर बना देगा। इसके विपरीत, मॉस्को और बीजिंग ने इस पूरी व्यवस्था पर अत्यधिक राजनीतिक दबाव डालने का तर्क देते हुए कहा कि केवल दंडात्मक पहलों से जटिल कूटनीतिक विवादों का स्थाई हल नहीं निकल सकता।
तेहरान के लिए कूटनीतिक राहत और पश्चिमी देशों की नई चुनौतियां
इस मतदान परिणाम से तेहरान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फौरी कूटनीतिक राहत मिली है। ईरान लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रतिबंधों और उनके तहत काम करने वाले निगरानी निकायों के अधिकार क्षेत्र पर कड़ा ऐतराज जताता रहा है। परिषद में निगरानी प्रस्ताव के खारिज होने के बाद पश्चिमी देशों के सामने यह व्यावहारिक समस्या खड़ी हो गई है कि वे औपचारिक संयुक्त राष्ट्र तंत्र के बिना ईरान के रक्षा सौदों और संबंधित गतिविधियों पर किस तरह नजर रख पाएंगे। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर अमेरिकी प्रयास फिलहाल थम गए हैं, परंतु इससे पश्चिमी शक्तियों और ईरान के बीच पहले से चल रहा राजनीतिक और रणनीतिक तनाव किसी भी रूप में कम होता नहीं दिख रहा है।
दक्षिणी ईरान में नागरिक मौतों पर मानवाधिकार रिपोर्ट के खुलासे
कूटनीतिक गतिरोध के समानांतर, ईरान के भीतर सैन्य अभियानों के दौरान आम नागरिकों के मारे जाने के मामलों ने अंतरराष्ट्रीय हलकों में स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए एक विस्तृत दस्तावेज के अनुसार, दो अलग-अलग हमलों के संदर्भ में ऐसे पर्याप्त आधार सामने आए हैं जो युद्ध अपराधों की श्रेणी में आ सकते हैं। इन घटनाओं में कुल मिलाकर 150 से अधिक आम नागरिकों की जान गई, जिनमें लगभग 120 बच्चे शामिल थे। जांच मिशन के अनुसार, 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान के मिनाब क्षेत्र में स्थित एक प्राथमिक स्कूल पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से प्रहार किया गया था। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले इसी घटना में कम से कम 156 लोगों की मौत दर्ज की गई, जिनमें करीब 120 मासूम बच्चे शामिल थे। विशेषज्ञों ने अपने निष्कर्ष में स्पष्ट रेखांकित किया कि यह स्कूल एक असैन्य इमारत के रूप में पूरी तरह स्पष्ट था और उस समय वहां किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या साजोसामान की मौजूदगी का कोई संकेत नहीं मिला था।
लामेर्द का हमला और दोनों पक्षों पर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की मांग
जांच दल ने दूसरे मामले का ब्योरा देते हुए बताया कि लामेर्द इलाके में एक खेल परिसर और उसके इर्द-गिर्द बने रिहायशी मकानों को निशाना बनाया गया था। इस कार्रवाई के चलते कम से कम 21 आम नागरिकों की जान चली गई, जिनमें सात बच्चे भी शामिल थे। अमेरिकी प्रशासन ने इस पूरे घटनाक्रम में अपनी किसी भी तरह की प्रत्यक्ष भूमिका अथवा संलिप्तता से साफ इनकार किया है। इसी जांच दस्तावेज में ईरान के घरेलू हालात की भी पड़ताल की गई है, जिसमें दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के दौरान चले जनप्रदर्शनों पर ईरानी सुरक्षा बलों के बल प्रयोग का विशेष उल्लेख है। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने टिप्पणी की कि सुरक्षा बलों द्वारा किए गए कई गंभीर कृत्य मानवता के खिलाफ अपराधों के दायरे में आ सकते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उस आंतरिक दमन के दौरान कम से कम 221 बच्चों की जान गई थी और हजारों नागरिकों को बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अमेरिका और ईरान दोनों ही पक्षों से सभी प्रकार के गंभीर उल्लंघनों को तत्काल रोकने, प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा देने और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच सुनिश्चित करने का कड़ा आह्वान किया है।


















