असम के तिनसुकिया जिले के अंतर्गत आने वाले बारेकुरी गांव में शनिवार को विश्व हुलॉक गिब्बन दिवस का आयोजन बहुत उत्साह के साथ किया गया। इस विशेष अवसर पर स्थानीय स्तर पर एक साइकिलिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की इकलौती मूल वानर प्रजाति के संरक्षण और उसके खतरे में पड़े प्राकृतिक आवास को बचाना था। इस आयोजन के जरिए लोगों को पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा के प्रति जागरूक करने का बड़ा संदेश दिया गया।
सामुदायिक सहभागिता और महिलाओं की विशेष भूमिका
इस पूरे कार्यक्रम का आयोजन बारेकुरी एनवायरनमेंट टूरिज्म डेवलपमेंट सोसायटी और बारेकुरी हुलॉक गिब्बन कंजर्वेशन सोसायटी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इस पहल का उद्देश्य समुदाय की सीधी भागीदारी के जरिए वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देना था। इसमें महिलाओं की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया ताकि पर्यावरण से जुड़ी पहलों में महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी को प्रोत्साहित किया जा सके। कार्यक्रम की शुरुआत गिब्बन को देखने के साथ हुई, जिसके बाद 20 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए एक साइकिलिंग प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस तरह की गतिविधियों का मकसद इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना और क्षेत्र के वन्यजीवों की रक्षा के लिए जनता की अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना भी था।
मानव और वन्यजीवों का अनूठा सह-अस्तित्व
तिनसुकिया शहर से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बारेकुरी गांव स्थानीय निवासियों और जंगली प्राइमेट्स के बीच आपसी तालमेल और अनूठे सह-अस्तित्व के लिए जाना जाता है। यहां के ग्रामीण इलाकों के बांस के झुरमुटों और फलदार पेड़ों के बीच लगभग 20 से 21 पश्चिमी हुलॉक गिब्बन कुल पांच पारिवारिक समूहों में निवास करते हैं। ग्रामीणों और इन गिब्बन के बीच का यह रिश्ता यह साबित करता है कि वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास को बचाने में सामुदायिक जागरूकता और स्थानीय लोगों की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
गिब्बन के सामने मौजूद गंभीर खतरे और सुरक्षा के उपाय
हालांकि इंसानों और जीवों के बीच का यह तालमेल सराहनीय है, फिर भी आवास का खंडन होना, बिजली के तारों से करंट लगना और भोजन की कमी जैसी समस्याएं इस प्रजाति के लिए लगातार बड़े खतरे बनी हुई हैं। इस क्षेत्र में इन समस्याओं से निपटने के लिए कई तरह के संरक्षण उपाय किए जा रहे हैं। इनमें हजारों फलदार पेड़ लगाना, बिजली की लाइनों को इंसुलेट करना और बारेकुरी को भेरजान-बोरजान-पडुमोनी वाइल्डलाइफ सैंचुरी से जोड़ने वाले एक हरे गलियारे यानी ग्रीन कॉरिडोर की योजना बनाना शामिल है। इन तमाम प्रयासों से आवास की कनेक्टिविटी में सुधार होने, भोजन तक बेहतर पहुंच मिलने और हुलॉक गिब्बन के लंबे समय तक जीवित रहने में मदद मिलने की उम्मीद है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का बयान और संदेश
विश्व हुलॉक गिब्बन दिवस के मौके पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य की प्राकृतिक विरासत में पश्चिमी हुलॉक गिब्बन के विशेष महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि इस खास दिन पर उन्हें इस बात की याद आती है कि हुलॉक गिब्बन असम की प्राकृतिक विरासत में कितना अहम स्थान रखता है। भारत की एकमात्र मूल वानर प्रजाति होने के नाते इसका भविष्य इसे बचाने के लिए किए जाने वाले हमारे सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करता है। मुख्यमंत्री ने X पर लिखा कि होलांगापार में एक गिब्बन को रेलवे ट्रैक को सुरक्षित पार करने के लिए बनाए गए कैनोपी ब्रिज का उपयोग करते देखना एक दिल को छू लेने वाला पल था।
सामूहिक प्रयासों से भविष्य की उम्मीद
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि विज्ञान आधारित ऐसे हस्तक्षेपों के साथ-साथ इन सौम्य प्राइमेट्स के साथ हमारे लोगों का साझा रिश्ता भी उतना ही खास है। सह-अस्तित्व की दिशा में उठाया गया हर छोटा कदम हमें एक ऐसे भविष्य के करीब लाता है जहां असम के लोग और वन्यजीव एक साथ मिलकर आगे बढ़ सकें। संरक्षण के प्रति जागरूकता, महिलाओं की भागीदारी और प्रकृति आधारित पर्यटन को जोड़ने वाली पहलों के माध्यम से बारेकुरी लगातार यह साबित कर रहा है कि इंसान और वन्यजीवों के बीच तालमेल बिठाने में समाज की भूमिका कितनी जरूरी है।























