असम के कोकराझार में स्थित बोडोलैंड विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर हेमेन शर्मा ने जाम्बिया की राजधानी लुसाका में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों पर शोध विचार रखे। लुसाका में 7 और 8 अक्टूबर को आयोजित 2026 जाज़िनाम्बो प्रोजेक्ट इंटरनेशनल टॉक्सिकोलॉजी सिम्पोजियम में आमंत्रित प्रोफेसर शर्मा ने कृषि और मवेशी प्रणालियों में जहरीली धातुओं के संदूषण और उससे पैदा होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों पर अपना वक्तव्य दिया।
लुसाका में जुटे अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता
यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी JICA चेयर और JSPS इंटरनेशनल सिम्पोजियम के सहयोग से आयोजित की गई थी। इस विशेष सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण, जानवरों और मानव स्वास्थ्य पर जैविक तथा रासायनिक खतरों के नकारात्मक प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना और उनके वैज्ञानिक समाधान खोजना था। इस दो दिवसीय आयोजन में दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिकों और शैक्षणिक प्रमुखों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के दौरान प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए। इनमें जापान की होक्काइडो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शोता एम. एम. नाकायामा, जो जाज़िनाम्बो प्रोजेक्ट के मुख्य सलाहकार भी हैं, और इसी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मयुमी इशिजुका शामिल रहीं। इसके अलावा नामीबिया विश्वविद्यालय तथा जाम्बिया विश्वविद्यालय से संबद्ध प्रोफेसर जॉन याबे ने भी अपने विचार रखे। सम्मेलन में JICA के खनन क्षेत्र के सलाहकार प्रोफेसर योशिताका होसोई ने JICA चेयर विशेष व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने खनिज विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की दिशा में अहम बिंदु प्रस्तुत किए।
खाद्य प्रणालियों में जहरीली धातुओं का प्रसार
प्रोफेसर हेमेन शर्मा ने “पोटेंशियल टॉक्सिक मेटल्स इन एग्रीकल्चरल एंड लाइवस्टॉक सिस्टम्स: ट्रांसफर, एक्सपोजर, एंड फाइटोरेमेडिएशन” शीर्षक से अपना मौखिक शोध पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने संबोधन में बताया कि किस प्रकार प्रदूषित मिट्टी और पानी से जहरीली धातुएं फसलों और मवेशियों तक पहुंचती हैं। यह संदूषण अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए प्रोफेसर शर्मा ने फाइटोरेमेडिएशन तकनीक के उपयोग पर विशेष बल दिया। फाइटोरेमेडिएशन एक ऐसी विधि है जिसमें विशिष्ट पौधों का उपयोग करके मिट्टी में मौजूद हानिकारक तत्वों को दूर, निष्क्रिय या स्थिर किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उपयुक्त पौधों को बायोचार आधारित मिट्टी सुधारकों के साथ मिलाकर उपयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और जहरीली धातुओं की गतिशीलता पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण
जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) द्वारा वित्तपोषित जाज़िनाम्बो प्रोजेक्ट का प्राथमिक उद्देश्य खनन गतिविधियों से उत्पन्न भारी धातु प्रदूषण से निपटने के लिए पर्यावरणीय निगरानी प्रणालियों और मानव संसाधन क्षमता को मजबूत करना है। इस वृहद पहल में जाम्बिया, जिम्बाब्वे, नामीबिया और बोत्सवाना जैसे देश शामिल हैं, जो जापान के होक्काइडो विश्वविद्यालय और अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदार संस्थानों के साथ मिलकर शोध कार्य कर रहे हैं।
प्रोफेसर शर्मा ने अपने संबोधन में 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित किया, जो पर्यावरण की स्वच्छता, पशु स्वास्थ्य और मानव कल्याण के आपसी अंतर्संबंधों को स्वीकार करता है। भारत में प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों और खनन प्रभावित क्षेत्रों के आंकड़ों का संदर्भ देते हुए उन्होंने मिट्टी, पौधे और पशुओं के बीच प्रदूषण हस्तांतरण की प्रक्रिया को समझाया। उन्होंने निरंतर निगरानी और टिकाऊ सफाई तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता जताई। बोडोलैंड विश्वविद्यालय की इस वैश्विक मंच पर भागीदारी ने पर्यावरण अनुसंधान में भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत किया।



















