भारत में पिछले करीब 12 वर्षों के दौरान बुनियादी ढांचे का व्यापक विस्तार हुआ है। यातायात तंत्र, ऊर्जा उत्पादन, शहरी परिवहन, डिजिटल कनेक्टिविटी, पेयजल आपूर्ति और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट होती है कि कई प्रमुख क्षेत्रों में वर्तमान परिचालन क्षमता का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2014 के बाद निर्मित हुआ है। परिवहन नेटवर्क को रफ्तार देने के लिए निर्मित डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में नल से जल पहुंचाने और सोलर पावर स्थापित करने तक, राष्ट्रीय विकास के आंकड़े एक नई औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर तस्वीर पेश करते हैं। इन आंकड़ों के माध्यम से देश के प्रमुख आर्थिक स्तंभों में हुए भौतिक परिवर्तन और क्षमता विस्तार का विस्तृत ब्योरा समझा जा सकता है।
रेलवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और मेट्रो कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार
भारतीय रेल और शहरी परिवहन नेटवर्क में पिछले 12 वर्षों के दौरान अभूतपूर्व ढांचागत बदलाव देखा गया है। वर्ष 2014 से पहले देश में माल ढुलाई के लिए कोई भी समर्पित परिचालन डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर मौजूद नहीं था। इसके बाद देश में लगभग 2,843 किलोमीटर लंबा समर्पित माल ढुलाई गलियारा नेटवर्क तैयार किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्तमान में देश में कार्य कर रहा पूरा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर नेटवर्क 2014 के बाद की अवधि में ही विकसित हुआ है। मालगाड़ियों के अलग कॉरिडोर पर चलने से सामान्य यात्री ट्रेनों की समयबद्धता में सुधार आया है और माल ढुलाई की गति में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
रेल नेटवर्क के विद्युतीकरण के मामले में भी आंकड़ों की रफ्तार काफी तेज रही है। वर्ष 2014 तक पूरे देश में केवल 21,800 किलोमीटर रेल लाइनों का ही विद्युतीकरण हो पाया था। इसके बाद के वर्षों में लगभग 69,800 किलोमीटर अतिरिक्त रेल मार्ग को बिजली से जोड़ा गया। इस डेटा के अनुसार भारतीय रेलवे के पूरे इतिहास में हुए कुल विद्युतीकरण का लगभग 69 फीसदी काम पिछले 12 वर्षों की अवधि में पूरा किया गया है। डीजल इंजन पर निर्भरता कम होने से पर्यावरण को लाभ पहुंचा है और रेलवे के ईंधन खर्च में भी बड़ी बचत हुई है।
शहरी परिवहन की बात करें तो मेट्रो रेल सेवा का दायरा तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2014 में देश के गिने-चुने शहरों में कुल मिलाकर लगभग 250 किलोमीटर का मेट्रो नेटवर्क कार्यरत था। इसके बाद देश के विभिन्न महानगरों औरTier-2 शहरों में लगभग 1,000 किलोमीटर का नया मेट्रो नेटवर्क तैयार कर जोड़ दिया गया। आज देश में उपलब्ध कुल परिचालन मेट्रो नेटवर्क का करीब 75 फीसदी हिस्सा वर्ष 2014 के बाद निर्मित होकर चालू हुआ है। इससे लाखों शहरी यात्रियों को दैनिक जाम से मुक्ति मिली है।
एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और एयरपोर्ट नेटवर्क का अभूतपूर्व दायरा
सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे के निर्माण में बहुत बड़ा उछाल आया है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में भारत के पास कुल मिलाकर करीब 1,000 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे नेटवर्क मौजूद था। इसके बाद देश में लगभग 6,700 किलोमीटर लंबे नए एक्सप्रेसवे जोड़े गए हैं। इस आंकड़े के आधार पर भारत के मौजूदा कुल एक्सप्रेसवे नेटवर्क का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा 2014 के बाद की अवधि में बनकर तैयार हुआ है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, समृद्धी महामार्ग और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के विभिन्न खंड इसी चरण के निर्माण का हिस्सा हैं।
चार लेन और उससे अधिक चौड़ाई वाले उच्च क्षमता वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। वर्ष 2014 में देश के भीतर 4-लेन या उससे अधिक क्षमता वाले नेशनल हाईवे की कुल लंबाई लगभग 18,371 किलोमीटर दर्ज की गई थी। इसके बाद इसमें लगभग 45,516 किलोमीटर की अतिरिक्त वृद्धि हुई। इसका मतलब है कि देश के वर्तमान उच्च क्षमता वाले हाईवे नेटवर्क का लगभग 60 फीसदी हिस्सा पिछले 12 सालों में तैयार करके आम जनता को सौंपा गया है।
विमानन क्षेत्र में हवाई संपर्क बढ़ाने के लिए नागरिक उड्डयन इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा दी गई। वर्ष 2014 तक देश में कुल 74 क्रियाशील एयरपोर्ट मौजूद थे। इसके बाद क्षेत्रीय हवाई संपर्क योजना और नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स के जरिए 164 नए एयरपोर्ट, वॉटर एरोड्रोम और हेलीपोर्ट नेटवर्क में शामिल किए गए। आंकड़ों के अनुसार देश के मौजूदा चालू एयरपोर्ट नेटवर्क का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा वर्ष 2014 के बाद जोड़ा गया है, जिससे छोटे शहरों तक हवाई सफर सुलभ हुआ है।
सोलर पावर, रिन्यूएबल एनर्जी और पावर ट्रांसमिशन ग्रिड में उछाल
ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ाए हैं, जिसमें सबसे प्रमुख आंकड़े सौर ऊर्जा क्षमता के हैं। वर्ष 2014 में भारत की स्थापित सोलर पावर क्षमता महज 2.6 GW के आसपास थी। इसके बाद इसमें लगभग 162 GW की विशाल क्षमता जुड़ी। इस आधार पर भारत के मौजूदा सौर ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर की कुल क्षमता का करीब 98 फीसदी हिस्सा पिछले 12 वर्षों के दौरान ही स्थापित किया गया है।
कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता के आंकड़े भी इसी तेजी को दिखाते हैं। वर्ष 2014 में देश की कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 54 GW थी, जो बढ़कर अब लगभग 248 GW के स्तर पर पहुंच गई है। यानी भारत की मौजूदा ग्रीन एनर्जी क्षमता का लगभग 78 फीसदी हिस्सा 2014 के बाद विकसित हुआ है। इसके साथ ही देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 249 GW से बढ़कर करीब 540 GW पहुंच गई है, जिसमें से लगभग 54 फीसदी हिस्सा हालिया वर्षों में जोड़ा गया।
बिजली को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन लाइन और गैस ग्रिड का विस्तार किया गया। राष्ट्रीय बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क 2.9 लाख किलोमीटर से बढ़कर लगभग 5 लाख circuit km तक पहुंच गया। वहीं देश भर में गैस पाइपलाइन नेटवर्क 15,000 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 26,000 किलोमीटर हो गया है, जिससे घरेलू और औद्योगिक ईंधन की उपलब्धता आसान बनी है।
रक्षा निर्यात, बंदरगाह क्षमता, जलमार्ग और जनसुविधाओं का विस्तार
आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भारत के रक्षा निर्माण और निर्यात क्षमता में ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया गया है। वर्ष 2014 में भारत का कुल रक्षा निर्यात केवल 700 करोड़ रुपये था। स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस डेटा के अनुसार देश की वर्तमान रक्षा निर्यात क्षमता का करीब 98 प्रतिशत हिस्सा 2014 के बाद हासिल किया गया है।
समुद्री व्यापार को गति देने के लिए देश के बंदरगाहों की कार्गो हैंडलिंग क्षमता को काफी बढ़ाया गया है। वर्ष 2014 में भारत के पोर्ट्स की क्षमता लगभग 800 MTPA थी, जिसमें लगभग 2,760 MTPA की अतिरिक्त क्षमता जोड़ी गई। इसके आधार पर वर्तमान कुल बंदरगाह क्षमता का लगभग 71 फीसदी हिस्सा 2014 के बाद तैयार किया गया है। इसी तरह आंतरिक जलमार्गों से माल ढुलाई क्षमता 29 MMT से बढ़कर लगभग 218 MMT हो गई है, यानी 87 फीसदी रिवर-कार्गो क्षमता हाल के वर्षों में बनी है।
सामाजिक और जन-सुविधा इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो वर्ष 2014 में देश के केवल 17 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी घरों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध थी, जिसमें अब व्यापक सुधार हुआ है। इसके अलावा मेडिकल एजुकेशन और स्वास्थ्य क्षेत्र में नए एम्स संस्थानों की स्थापना और मेडिकल सीटों में बढ़ोतरी से देश के दूरदराज इलाकों तक बेहतर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा पहुंचने की राह आसान हुई है।



















