फरीदाबाद में नवरात्रि के दौरान माता रानी की आराधना के साथ घर के मुख्य द्वार को सजाने की परंपरा का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। इस पावन अवसर पर तमाम लोग अपने घर के मुख्य दरवाजे पर आम के पत्तों का तोरण बांधते हैं, कुमकुम से स्वास्तिक बनाते हैं और कलश की स्थापना करते हैं। लेकिन क्या आपको इस बात की जानकारी है कि तोरण को यूं ही दरवाजे पर नहीं लटकाया जाता, बल्कि इसे लगाने से पहले इसकी विधिवत पूजा करना भी बेहद आवश्यक होता है? आम के पत्तों के इस तोरण को किस प्रकार तैयार करना चाहिए और नवरात्रि समाप्त होने के बाद इसे किस तरह हटाना चाहिए, इन सभी विषयों पर फरीदाबाद के जाने-माने ज्योतिषाचार्य पंडित उमा चंद्र मिश्रा विस्तार से जानकारी देते हैं। उनका कहना है कि नवरात्रि के दिनों में घर के मुख्य द्वार पर कुमकुम की सहायता से स्वास्तिक या श्री का प्रतीक बनाना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इसके साथ ही आम के पत्तों से तैयार किया गया तोरण या बंदनवार भी द्वार पर अवश्य लगाना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि तोरण में उपयोग किए जा रहे आम के पत्ते कहीं से भी कटे-फटे नहीं होने चाहिए और जिस धागे या सूत में उन्हें पिरोया जा रहा है, वह भी एकदम सही और मजबूत होना चाहिए।
तोरण लगाने से पहले पूजा और दिशा का महत्व
पंडित उमा चंद्र मिश्रा के अनुसार हिंदू धर्म में आम के पेड़ को साक्षात देवताओं का वृक्ष माना गया है और इसे सभी फलों का राजा भी कहा जाता है। यही मुख्य वजह है कि किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों में आम के पत्तों का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। हालांकि देखने में आता है कि लोग अक्सर बाजार से तोरण लाकर सीधे दरवाजे पर टांग देते हैं और उसकी पूजा करना भूल जाते हैं। तोरण को मुख्य दरवाजे पर लगाने से पूर्व उस पर थोड़ा सा गंगाजल छिड़कना चाहिए और फिर पूरी विधि-विधान के साथ उसकी पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात ही उसे मुख्य द्वार पर लगाना चाहिए। वैसे तो तोरण को हमेशा मुख्य दरवाजे पर लगाना ही सबसे श्रेष्ठ माना गया है, लेकिन इस बात का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए कि आपके घर का मुख्य द्वार आखिर किस दिशा में है। इसके अलावा पूरे घर के लिए केवल एक ही मुख्य बंदनवार का इस्तेमाल करना चाहिए। कई बार ऐसा देखा जाता है कि लोग घर के अलग-अलग हिस्सों में कई बंदनवार लगा देते हैं, जबकि ऐसा करने से हमेशा बचना चाहिए क्योंकि यह शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता है।
स्वास्तिक निर्माण और कलश स्थापना के नियम
पंडित उमा चंद्र मिश्रा बताते हैं कि मुख्य द्वार पर बनाया जाने वाला स्वास्तिक भगवान गणेश का सीधा प्रतीक माना जाता है। इसलिए नवरात्रि के पावन पर्व पर मुख्य दरवाजे पर स्वास्तिक का चिह्न बनाने के साथ-साथ श्री का चिह्न भी अवश्य अंकित करना चाहिए। जब भी आप मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाएं, तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उसकी चारों भुजाओं पर चार बिंदियां लगाना भी बेहद जरूरी होता है। ऐसा करने से पूजा की प्राचीन परंपराओं का विधिवत और पूर्ण रूप से पालन हो जाता है। इसके अलावा घर में कलश स्थापना को लेकर भी विशेष नियम बताए गए हैं। कलश के अंदर सभी देवी-देवताओं काि वास माना जाता है। कलश के मुख वाले हिस्से में भगवान विष्णु का निवास होता है और इसके कंठ में भगवान रुद्र का स्थान माना गया है। घर की मुख्य देहरी या चौखट पर थोड़े से चावल रखकर उसके ठीक ऊपर कलश स्थापित करना बहुत ही शुभ परिणाम देता है।
नवरात्रि के बाद तोरण को इधर-उधर न फेंके
पंडित उमा चंद्र मिश्रा यह भी स्पष्ट करते हैं कि नवरात्रि का पावन पर्व संपन्न होने के बाद जब आप दरवाजे से तोरण या बंदनवार को हटाएं, तो उसे कभी भी लापरवाही से इधर-उधर कचरे में नहीं फेंकना चाहिए। हमारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार इस्तेमाल किए गए इस तोरण को किसी पवित्र जल स्रोत में प्रवाहित कर देना चाहिए। जब भी आप तोरण को दरवाजे से उतारें, तो इन सभी नियमों और सावधानियों का विशेष रूप से ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। इन तमाम पारंपरिक नियमों का सही तरीके से पालन करते हुए सभी श्रद्धालु नवरात्रि के इन नौ दिनों के दौरान अपने घर के मुख्य द्वार की सजावट और विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न कर सकते हैं।



















