झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 165 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पलामू जिले के तरहसी प्रखंड का मझिगांवा गांव इन दिनों अपनी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहर के कारण विशेष चर्चा में है। इसी गांव में स्थित मां झालखंडी मंदिर क्षेत्र के लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से इस पवित्र स्थल की दूरी करीब 30 किलोमीटर है। इस प्राचीन मंदिर का इतिहास लगभग दो हजार साल पुराना माना जाता है और यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होने की गहरी मान्यता जुड़ी हुई है।
जमीन से प्रकट होने और इतिहास का रहस्य
मंदिर से जुड़ी पुरानी कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस पूरे इलाके में घना जंगल हुआ करता था जहाँ स्थानीय ग्रामीण अपने मवेशी चराने के लिए आते थे। एक दिन जंगल के भीतर पक्षियों के अचानक बहुत तेज और असामान्य शोर मचाने पर जब ग्रामीण उस दिशा में आगे बढ़े, तो उन्होंने एक अनोखा और हैरान करने वाला दृश्य देखा। उन्होंने पाया कि एक बड़ी चट्टान के पास जमीन के भीतर से लगातार खून की धारा बह रही थी। उस रहस्यमयी घटना के बाद दो स्थानीय भाइयों ने उस स्थान पर मौजूद मूर्ति को वहां से उठाने और अपने साथ ले जाने का असफल प्रयास किया। कहा जाता है कि उसके बाद माता ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और इसी निश्चित स्थान पर अपनी स्थापना करवाने का स्पष्ट निर्देश दिया था, जिसके बाद से पूजा का सिलसिला शुरू हुआ।
राजा मेदिनीराय और पुजारियों की मान्यताएं
मंदिर के पुजारी पारसनाथ मिश्रा और प्रधान पुजारी पंडित कृष्ण मुरारी मिश्रा के बयानों के आधार पर इस स्थल का इतिहास दो सहस्र वर्ष पुराना आंका जाता है। स्थानीय लोक परंपराओं में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पलामू के ऐतिहासिक शासक राजा मेदिनीराय अपने सैनिकों के साथ इस वन क्षेत्र में शिकार खेलने के लिए आए थे। ऐसा विश्वास किया जाता है कि माता के स्वप्न में दर्शन देने के बाद इस पूरे परिसर की साफ-सफाई कराई गई और विधि-विधान से पूजा-अर्चना का श्रीगणेश हुआ। राजा मेदिनीराय के प्रधान पुजारी रामदत्त मिश्र को भी माता की तरफ से स्वप्न में दर्शन मिलने की बात कही जाती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि यहां किसी मनुष्य द्वारा माता की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की गई है, बल्कि देवी को पूरी तरह स्वयंभू माना जाता है।
मंदिर में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है जो अपनी खास मनोकामनाओं को लेकर यहां पहुंचते हैं। लोगों की मान्यता है कि जब उनकी मुरादें पूरी हो जाती हैं, तो वे आभार व्यक्त करने के लिए यहां बलि प्रथा की परंपरा का पालन करते हैं। विशेष तौर पर शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर यहां भव्य दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस नौ दिवसीय उत्सव के दौरान संधि पूजा के महत्वपूर्ण समय पर बलि देने की पुरानी परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभाया जाता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु माता को प्रसन्न करने के लिए चुनरी, नारियल, ताजे फूल, मौसमी फल, विभिन्न प्रकार के मेवे, मिश्री और सुहाग की शृंगार सामग्री पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित करते हैं।
जीर्णोद्धार के चरण और मंदिर के कपाट खुलने का समय
समय के साथ इस प्राचीन धार्मिक स्थल के ढांचे को सहेजने के लिए अब तक कुल तीन बार भव्य जीर्णोद्धार कार्य कराया जा चुका है। मंदिर के भीतर रोजाना सुबह के समय माता को जल से स्नान कराया जाता है, उन्हें नई चुनरी ओढ़ाई जाती है और इसके पश्चात फूल, फल, मेवे, मिश्री तथा नारियल का विशेष भोग लगाया जाता है। आम भक्तों के दर्शन के लिए मंदिर के कपाट सुबह छह बजे से लेकर दोपहर एक बजे तक खुले रहते हैं। इसके पश्चात दोपहर में कुछ समय के लिए मंदिर बंद होता है और फिर दोपहर 2:30 बजे से लेकर शाम के सात बजे तक श्रद्धालु दोबारा दर्शन और पूजन का लाभ उठा सकते हैं। पलामू की सांस्कृतिक और धार्मिक संस्कृति में इस मंदिर का रुतबा आज भी सर्वोच्च बना हुआ है।


















