जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच बिहार के दरभंगा से पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल सामने आई है। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने भीषण गर्मी के बावजूद अपने दफ्तर का एयर कंडीशनर (AC) एक बार भी चालू नहीं किया। जलवायु परिवर्तन विषय पर डॉक्टरेट (PhD) हासिल करने वाले डॉ. कुमार का मानना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए बड़े भाषणों की बजाय व्यक्तिगत स्तर पर छोटे और प्रभावी कदम उठाना बेहद जरूरी है। पूरी गर्मी के दौरान प्राकृतिक हवा और सीमित संसाधनों का उपयोग कर उन्होंने न केवल बिजली की बचत की, बल्कि समाज को दैनिक कार्बन उत्सर्जन के प्रति गंभीर संदेश भी दिया।
ग्लोबल वॉर्मिंग का गणित और कार्बन डाइऑक्साइड का असर
पर्यावरण में हो रहे बदलावों पर प्रकाश डालते हुए वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार बताते हैं कि वैश्विक तापमान वृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका कार्बन डाइऑक्साइड गैस की है, जो कुल उत्सर्जन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा बनाती है। इसके बाद दूसरे स्थान पर मीथेन गैस आती है। इन ग्रीनहाउस गैसों के दुष्प्रभाव को रोकने का एकमात्र तरीका अपने दैनिक जीवन में उत्सर्जन को घटाना है। अधिकांश लोग पर्यावरण बचाने के लिए केवल पौधरोपण को पर्याप्त मानते हैं, लेकिन इसके वैज्ञानिक पहलू को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
डॉ. मनोज कुमार के अनुसार, "पौधारोपण जरूरी है, लेकिन वो सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए नहीं होना चाहिए।" उन्होंने आंकड़ों के जरिए समझाया कि 10 से 15 साल पुराना एक वयस्क आम का पेड़ प्रतिदिन औसतन लगभग 40 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) सोखने की क्षमता रखता है। इसके विपरीत, भारत में एक आम नागरिक अपने रोजमर्रा के कामों से प्रतिदिन लगभग 5 किलो CO2 उत्सर्जित कर देता है। इस गणित के हिसाब से केवल एक व्यक्ति के दैनिक कार्बन पदचिह्न (कार्बन फुटप्रिंट) को निष्प्रभावी करने के लिए कम से कम 100 पेड़ लगाने और उन्हें वर्षों तक सहेजने की जरूरत होती है। इसलिए पौधे लगाने के साथ-साथ खुद से होने वाले उत्सर्जन में कटौती करना प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए।
दफ्तर में AC बंद रखकर बचाई 177 यूनिट बिजली
सिद्धांतों को व्यवहार में उतारते हुए डॉ. कुमार ने इस गर्मी के मौसम में स्वयं से बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने अपने कार्यालय में AC चलाने के बजाय खिड़कियों को खुला रखकर काम करना पसंद किया। दफ्तर में लगे पंखे और लाइटें भी तभी चलाई गईं जब उनकी सख्त जरूरत महसूस हुई। इस अनुशासित दिनचर्या के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले।
उन्होंने पिछले वर्ष के जून महीने के मुकाबले इस वर्ष जून में बिजली खपत में 20 प्रतिशत की कटौती करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया था। हालांकि 20 प्रतिशत का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका, फिर भी उन्होंने 177 यूनिट बिजली की सीधी बचत दर्ज की। यह खपत में लगभग 1.52 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। उनका कहना है कि यदि पूरे सीजन AC का निरंतर प्रयोग किया जाता, तो बिजली की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों कहीं अधिक होते।
व्यावहारिक बदलावों से ही रुकेगा जलवायु संकट
इस पहल के माध्यम से वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार यह साबित करना चाहते हैं कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए सामूहिक और सतत प्रयासों की आवश्यकता है। बिजली की फिजूलखर्ची रोकना, अनचाहे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बंद करना और जिम्मेदारी के साथ पौधरोपण करना ऐसे कदम हैं जिन्हें हर नागरिक अपने घर और कार्यस्थल पर लागू कर सकता है। दरभंगा के इस वैज्ञानिक का संकल्प हमें यह सोचने पर विवश करता है कि पृथ्वी को भयावह पर्यावरणीय संकट से बचाने की शुरुआत हमारे अपने घर से ही होती है।



















