लखीमपुर खीरी जिले के तराई क्षेत्र में शारदा नदी के रौद्र रूप ने एक बार फिर स्थानीय लोगों के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। लगभग एक हफ्ते तक शांत रहने या धीमी गति से बहने के बाद, रूरा सुल्तानपुर गांव के पास शारदा नदी के कटान ने दोबारा भयानक रफ्तार पकड़ ली है। नदी की तेज धारा तेजी से गांव की तरफ बढ़ रही है, जिससे स्थिति बेहद नाजुक हो गई है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि कई ग्रामीणों के आशियाने अब नदी के बिल्कुल मुहाने पर आ गए हैं, जिससे किसी भी समय उनके नदी में समा जाने का खतरा बना हुआ है।
शारदा नदी का बढ़ता दायरा और ग्रामीणों में पसरा खौफ
शारदा नदी के इस दोबारा शुरू हुए तेज कटान की वजह से पूरे रूरा सुल्तानपुर गांव में डर और घबराहट का माहौल बन गया है। नदी जिस तेजी से जमीन को अपने आगोश में ले रही है, उसे देखकर ग्रामीण सहमे हुए हैं। पानी का बहाव लगातार खेतों और रिहाइशी इलाकों को अपनी चपेट में ले रहा है। लोगों को डर है कि अगर प्रशासन ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो उनका पूरा गांव नदी की तेज धारा में विलीन हो सकता है। अपनी आंखों के सामने अपनी जमीन को पानी में बहते देखना ग्रामीणों के लिए बेहद कष्टदायक साबित हो रहा है।
मजबूरी में खुद के आशियाने पर चलाया हथौड़ा
इस आपदा के बीच रूरा सुल्तानपुर गांव से बेहद भावुक और दर्दनाक तस्वीरें सामने आ रही हैं। यहां रहने वाले लोग अपनी ही मेहनत से तैयार किए गए घरों को अपने हाथों से ढहाने के लिए विवश हैं। जिन हाथों ने कभी दिन-रात पसीना बहाकर, पाई-पाई जोड़कर ईंट और मिट्टी से अपने सपनों का घरौंदा तैयार किया था, आज उन्हीं हाथों में हथौड़े दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीण खुद ही अपने घरों की दीवारों को तोड़कर उसमें इस्तेमाल की गई ईंटें, लोहे के सरिए, दरवाजे और खिड़कियां जैसी जरूरी चीजें सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि नदी में सब कुछ बह जाने से पहले थोड़ा-बहुत सामान बचाया जा सके।
इसी गांव के निवासी रामपाल ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि शारदा नदी का कटान अचानक बेहद तेज हो गया है। नदी का पानी उनके घर के दरवाजे तक पहुंच चुका है। ऐसी परिस्थिति में अपने परिवार की जान बचाने के लिए उनके पास अपने घर को तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। रामपाल पिछले 23 वर्षों से रूरा सुल्तानपुर गांव में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि इतने लंबे समय में उन्होंने मजदूरी करके थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा किया था और इस मकान का निर्माण किया था। लेकिन नदी के कटान ने उनकी पूरी जिंदगी की कमाई को पल भर में उजाड़ दिया। अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिर छुपाने की जगह न होने पर वह अपने परिवार को लेकर कहां जाएंगे।
सरकारी आंकड़े और बर्बादी का आकलन
इस पूरे मामले पर स्थानीय राजस्व अधिकारी यानी लेखपाल राजीव वर्मा ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि रूरा सुल्तानपुर गांव में शारदा नदी के कटान के कारण अब तक लगभग आठ पक्के मकान और चार झोपड़ियां पूरी तरह से नदी में समा चुकी हैं। इसके अलावा दर्जनों अन्य घरों पर भी डूबने या कटान की चपेट में आने का सीधा खतरा मंडरा रहा है। प्रशासन की ओर से स्थानीय लोगों को लगातार सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
ग्रामीणों को आशंका है कि यदि नदी का यह कहर इसी रफ्तार से जारी रहा, तो आने वाले कुछ ही दिनों में पूरा गांव इस कटान की जद में आ जाएगा। इस डर से कई परिवार अपने जरूरी दस्तावेजों, अनाज और कपड़ों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। कुछ लोग घरों की छतों को खोलकर कड़ियां और लोहे की चादरें उतार रहे हैं ताकि उन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।
आशियाने के साथ बहते सपने और भविष्य की चिंता
शारदा नदी का यह कटान केवल जमीन या मकानों को ही नहीं लील रहा, बल्कि यह ग्रामीणों के सालों पुराने अरमानों और भविष्य की उम्मीदों को भी अपने साथ बहाकर ले जा रहा है। जिन आशियानों में कभी खुशियां हुआ करती थीं, वहां आज केवल उदासी और बर्बादी का सन्नाटा पसरा हुआ है। बेघर हो चुके इन लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब दोबारा सिर ढकने के लिए जगह ढूंढने की है। लगातार हो रही बारिश और नदी के उफान ने उनकी राह को और कठिन बना दिया है। कृषि और मजदूरी पर आश्रित इन गरीब परिवारों के लिए अपना घर खोना एक बहुत बड़ा आर्थिक झटका है, जिससे उबरने में उन्हें सालों लग जाएंगे।



















