हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर सामने आई है, जहां मध्य एशिया में पाए जाने वाले खतरनाक कैस्पियन कोबरा के काटने से भारत में पहली बार दो लोगों की मौत दर्ज की गई है। साल 2020 और 2021 में हुई इन मौतों का विस्तृत विवरण एपिडेमियोलॉजी इंटरनेशनल नाम के एक प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू जर्नल में छपे ताजा शोध में दिया गया है। कांगड़ा जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. ओमेश कुमार भारती के मार्गदर्शन में पूरा किया गया यह अध्ययन सांप के काटने से जुड़ी चिकित्सा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। इस वैज्ञानिक शोध पत्र को इसी साल जुलाई में जर्नल के पास भेजा गया था, जिसे 18 अगस्त को मंजूरी मिली और सितंबर में इसे प्रकाशित किया गया।
सांप के काटने के बाद तेजी से फैला जहर
इस रिसर्च में शामिल विवरण बताते हैं कि इस विशेष सांप का जहर इंसानी शरीर पर कितनी तेजी से और घातक तरीके से हमला करता है। दर्ज किए गए मामलों के अनुसार, सांप के डसने के महज 30 मिनट के भीतर ही एक पीड़ित की मौत हो गई। वहीं, दूसरे पीड़ित व्यक्ति ने अस्पताल में करीब 72 घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच कड़ा संघर्ष किया, लेकिन आखिरकार उसकी भी जान नहीं बचाई जा सकी। वैज्ञानिकों का कहना है कि कैस्पियन कोबरा के जहर में बेहद खतरनाक कार्डियोटॉक्सिसिटी पाई जाती है, जिसका मतलब है कि यह सीधे तौर पर इंसान के दिल और रक्त संचार प्रणाली को नुकसान बनाता है। यही वजह है कि यह सामान्य भारतीय कोबरा की तुलना में कहीं अधिक जानलेवा साबित होता है।
मध्य एशिया से भारत के पहाड़ी इलाकों तक का सफर
कैस्पियन कोबरा, जिसे वैज्ञानिक जगत में नाजा ऑक्सीआना के नाम से जाना जाता है, मूल रूप से भारत का निवासी नहीं है। यह जहरीला सांप मुख्य रूप से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों के सूखे और पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। भारत के भीतर इस सांप को पहली बार साल 2019 में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के अंतर्गत आने वाले तीसा ब्लॉक में देखा गया था। इसके बाद से ही स्थानीय वन विभाग और सांपों का रेस्क्यू करने वाले दलों ने देखा है कि यह सांप धीरे-धीरे ऊंचाई वाले इलाकों से नीचे की तरफ आ रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और पहाड़ों के बदलते पर्यावरण के कारण ही यह सांप अपने नए ठिकानों की तलाश में नीचे की ओर बढ़ रहा है।
इलाज की कमी और पारंपरिक जड़ी-बूटी का विकल्प
इस खतरनाक सांप की बढ़ती मौजूदगी ने भारतीय चिकित्सा प्रणाली के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। दरअसल, भारत में वर्तमान में मिलने वाला एंटी-स्नेक वेनम मुख्य रूप से देश में पाए जाने वाले बिग फोर सांपों यानी चश्माधारी कोबरा, रसेल वाइपर, कॉमन करैत और सॉ-स्केल्ड वाइपर के जहर का मुकाबला करने के लिए ही तैयार किया जाता है। पुराने शोधों से यह बात साफ हो चुकी है कि भारत का यह पारंपरिक वेनम कैस्पियन कोबरा के जहर के मुख्य तत्वों को निष्क्रिय करने में काफी कमजोर साबित होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भविष्य में इस सांप के काटने की घटनाएं बढ़ती हैं, तो मौजूदा इलाज कारगर नहीं रहेगा। इस अध्ययन में एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि दो अन्य लोग इस कोबरा के काटने के बाद जीवित बच गए, जिन्होंने स्थानीय स्तर पर पाई जाने वाली जड़ी-बूटी मिर्चड़ी (वैज्ञानिक नाम पेरगुलेरिया डेमिया) का सेवन किया था। हालांकि, डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि इस जड़ी-बूटी के असर का अभी तक कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ है और इस पर आगे गहन शोध की जरूरत है।



















