भारत की समृद्ध और विविध वस्त्र कला को नई पहचान देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर देशवासियों से अपनी जीवनशैली में स्थानीय कपड़ों को प्राथमिकता देने का आह्वान किया गया है। डिजिटल क्रांति के दौर में पारंपरिक बुनाई और हथकरघा शिल्पकारों के कौशल को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया का सक्रियता से उपयोग करने की सलाह दी गई है। नागरिकों से आग्रह किया गया है कि वे भारत की पारंपरिक पोशाकों को पहनकर और अपनी पसंदीदा हथकरघा कृतियों के साथ 'गेट रेडी विद मी' (GRWM) वीडियो बनाकर डिजिटल माध्यमों पर साझा करें, ताकि देश के कोने-कोने में छिपे बुनकरों के हुनर को वैश्विक मंच मिल सके।
डिजिटल अभियान से हथकरघा विविधता को लोकप्रिय बनाने का प्रयास
पारंपरिक वस्त्र उद्योग को आधुनिक पीढ़ी से जोड़ने के लिए डिजिटल मंचों का उपयोग अत्यंत प्रभावी माना जा रहा है। इस संबंध में विशेष रूप से एक्स (X) पर संदेश साझा करते हुए कहा गया कि 7 अगस्त का दिन देश के हथकरघा क्षेत्र की ऐतिहासिक विविधता को सम्मान देने का अवसर है। नागरिकों को प्रोत्साहित किया गया है कि वे अपनी दैनिक पोशाक में देसी हथकरघा वस्त्रों को शामिल करें और हैशटैग #NationalHandloomDay का उपयोग करते हुए अपने क्रिएटिव वीडियो और तस्वीरें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करें। इस पहल का मुख्य उद्देश्य भारतीय हस्तशिल्प की सुंदरता को युवा वर्ग के बीच एक आधुनिक ट्रेंड के रूप में स्थापित करना है।
राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह
केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय द्वारा 7 अगस्त को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर एक भव्य राष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम का मूल ध्येय भारत की सदियों पुरानी वस्त्र विरासत की झांकी प्रस्तुत करना तथा देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में बुनकर समुदायों के अतुलनीय योगदान को सम्मानित करना है। इस गरिमामयी समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगी। कार्यक्रम में केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह, कपड़ा राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिता, कपड़ा मंत्रालय की सचिव नीलम शमी राव तथा हथकरघा विकास आयुक्त डॉ. एम. बीना भी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
संत कबीर और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कारों का वितरण
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के दौरान देश भर के उत्कृष्ट बुनकरों को उनके असाधारण कौशल, नवाचार और पारंपरिक कला के संरक्षण के लिए सम्मानित किया जाएगा। इस वर्ष कुल 22 पुरस्कार वितरित किए जाने का कार्यक्रम तय किया गया है, जिनमें 3 संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और वर्ष 2025 के 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल हैं। इन पुरस्कारों के विजेता और उनके परिजन, राष्ट्रीय पुरस्कार चयन समिति के सदस्य, वस्त्र क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और मीडिया प्रतिनिधि इस गौरवशाली क्षण के साक्षी बनेंगे। इसके अतिरिक्त, भारत की विविधतापूर्ण बुनाई शैलियों को समर्पित चार नए स्मारक डाक टिकट भी इस अवसर पर औपचारिक रूप से जारी किए जाएंगे।
विशेष पुस्तकों का अनावरण और पारंपरिक बुनाई की सजीव प्रदर्शनी
समारोह को और अधिक अर्थपूर्ण बनाने के लिए दो महत्वपूर्ण प्रकाशनों का अनावरण किया जाएगा। इनमें मध्य भारत के प्राकृतिक और ऑल-डाई किए हुए कपड़ों पर आधारित पुस्तक "अर्थ. रूट. थ्रेड- सेंट्रल इंडिया के आल डाई किए हुए हथकरघा वस्त्र" तथा "हथकरघा पुरस्कार पुस्तक 2025" शामिल हैं। कार्यक्रम स्थल पर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उत्कृष्ट हथकरघा उत्पादों की एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। इसमें आने वाले आगंतुकों को कश्मीर की प्रसिद्ध पारंपरिक कानी बुनाई और दीवार पर सजाए जाने वाले जटिल आभूषण बुनाई शिल्प के सजीव प्रदर्शन (लाइव डेमोन्सट्रेशन) को प्रत्यक्ष रूप से देखने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होगा।
आजीविका का आधार और 1905 के स्वदेशी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का हथकरघा उद्योग केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र वर्तमान में 35 लाख से अधिक लोगों की आजीविका का प्रत्यक्ष सहारा बना हुआ है। अत्यंत गौरव की बात यह है कि इस कार्यबल में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं, जो महिला सशक्तिकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। 7 अगस्त को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने की शुरुआत 1905 में इसी तिथि को शुरू हुए ऐतिहासिक स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में की गई थी। उस आंदोलन ने देश में स्थानीय उद्योगों और वस्त्र कला को आत्मनिर्भरता का नया आधार प्रदान किया था। वर्ष 2015 में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से इस दिवस को राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक रूप से मनाने की परंपरा आरंभ की गई थी।
गुजरात का वैश्विक हथकरघा मॉडल और अंतरराष्ट्रीय पहचान
भारत के हथकरघा नक्शे पर गुजरात का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, राज्य की संस्कृति, कलात्मकता और आजीविका में बुनाई का हुनर गहराई से समाया हुआ है। गुजरात की पारंपरिक पटोला बुनाई और कच्छ बुनाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। आज इन पारंपरिक वस्त्रों की मांग संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व के देशों में तेजी से बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय डिजाइनरों और वैश्विक हस्तियों के बीच गुजरात के हस्तशिल्प की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। राज्य सरकार के निरंतर सहयोग, आधुनिक डिजाइन पद्धतियों और प्रभावी विपणन रणनीतियों के बल पर गुजरात में 12,000 से अधिक बुनकर एवं शिल्पकार रोजगार पा रहे हैं। इस क्षेत्र ने 51.07 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार हासिल किया है, जो राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि और आर्थिक प्रगति दोनों को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।



















