भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे बने हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। वर्ष 1976 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'लैला मजनू' का प्रसिद्ध गीत 'कोई पत्थर से ना मारे' एक ऐसा ही कालजयी नगमा है। जब यह दर्दभरा गाना बड़े पर्दे पर दर्शकों के सामने आया था, तो सिनेमाघरों में मौजूद लोग अपने आंसू रोक नहीं पाए थे और माहौल पूरी तरह भावुक हो उठा था।
मदन मोहन का अंतिम संगीत और जयदेव का योगदान
इस यादगार गीत की धुन महान संगीतकार मदन मोहन ने तैयार की थी। यह रचना उन्होंने अपने निधन से ठीक पहले कंपोज की थी, जो उनके संगीत सफर के बेहतरीन नमूनों में से एक मानी जाती है। मदन मोहन के देहांत के पश्चात फिल्म के शेष साउंडट्रैक और बैकग्राउंड संगीत का कार्य संगीतकार जयदेव ने बड़ी कुशलता से पूरा किया था।
लता मंगेशकर की आवाज और साहिर के बोल
गीत को अमर बनाने में स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर की मर्मस्पर्शी गायकी का सबसे बड़ा योगदान रहा। उनके स्वर में छिपे दर्द ने इस रचना को हर सुनने वाले के दिल की गहराई तक पहुंचा दिया। वहीं, प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी ने इसके बेहद भावुक और अर्थपूर्ण बोल लिखे थे, जो मोहब्बत के दर्द को बयां करते हैं।
ऋषि कपूर और रंजीता पर फिल्मांकन तथा आधुनिक रीमेक
पर्दे पर यह गीत अभिनेता ऋषि कपूर और अभिनेत्री रंजीता कौर पर फिल्माया गया था। दोनों कलाकारों के अभिनय और लता मंगेशकर की आवाज के तालमेल ने इस दृश्य को यादगार बना दिया। इस कालजयी गीत की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सालों बाद फिल्म 'आजा नचले' के टाइटल ट्रैक में सलीम-सुलेमान ने इसकी प्रसिद्ध हुक लाइन्स का दोबारा इस्तेमाल किया था।



















