भारतीय सिनेमा के 1990 के दशक में अपनी मनमोहक अदाकारी और बेहतरीन नृत्य कला से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित अपनी पेशेवर सफलता के साथ अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के कारण भी अक्सर सुर्खियों में बनी रहती थीं। उस दौर में उनका नाम फिल्म जगत की कई नामचीन हस्तियों के साथ जोड़ा गया। अनिल कपूर से लेकर आमिर खान और संजय दत्त तक के साथ उनके रिश्तों की अफवाहों ने खूब जोर पकड़ा था। यही नहीं, क्रिकेट के मैदान के चर्चित खिलाड़ी अजय जडेजा के साथ भी उनके संबंध को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते थे, जबकि मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी पर्दे पर केमिस्ट्री हमेशा चर्चा का विषय बनी रही। लेकिन इन तमाम लोकप्रिय अभिनेताओं और खिलाड़ियों के अलावा माधुरी दीक्षित का नाम संगीत जगत के एक अत्यंत सम्मानित पार्श्व गायक से भी जुड़ा, जिसके बारे में आम लोग बहुत कम जानते हैं। वह नाम था अपने सुरों से लाखों दिलों को छूने वाले गायक सुरेश वाडेकर का। दोनों के बीच रिश्ते और शादी के प्रपोजल को लेकर लंबे समय तक बातें बनती रहीं, मगर जब सालों बाद इस पूरे मामले पर खुद सुरेश वाडेकर ने स्थिति साफ की, तो पूरी कहानी का एक अलग ही पहलू सामने आया।
माधुरी दीक्षित के साथ जुड़े रिश्ते की हकीकत और गायक का स्पष्टीकरण
लंबे समय तक मीडिया और आम चर्चाओं में यह दावा किया जाता रहा कि अपने करियर के शुरुआती चरण में माधुरी दीक्षित का रिश्ता सुरेश वाडेकर के पास भेजा गया था। इन अफवाहों में यह तक कहा गया कि गायक के परिवार ने अभिनेत्री को अत्यधिक दुबली बताकर इस रिश्ते को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था। यह कहानी वर्षों तक बॉलीवुड के गॉसिप गलियारों में घूमती रही। हालांकि, जब एक साक्षात्कार के दौरान सुरेश वाडेकर से इस चर्चित वाकये के संबंध में पूछा गया, तो उन्होंने इन तमाम दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह किस्सा पूरी तरह से मनगढ़ंत है और उनके पास ऐसा कोई विवाह प्रस्ताव कभी आया ही नहीं था। गायक ने माधुरी दीक्षित के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करते हुए उन्हें अपनी एक बेहतरीन दोस्त बताया और इस तरह सालों से चली आ रही अफवाहों पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया।
महाराष्ट्र के मिल मजदूर के घर से शास्त्रीय संगीत तक का सफर
संगीत की दुनिया में सुरेश वाडेकर का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। उनका जन्म 7 अगस्त 1955 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में हुआ था। उनके पिता ईश्वर वाडेकर एक मिल में काम करके परिवार का भरण-पोषण करते थे, लेकिन उनके भीतर संगीत के प्रति अटूट प्रेम था। घर के माहौल में पिता को नियमित रूप से भजन गाते सुनकर बाल सुरेश के मन में भी स्वर और ताल के प्रति गहरा रुझान पैदा हो गया। पिता का सपना था कि उनका बेटा बड़ा होकर एक महान गायक बने, और इसी सपने को साकार करने के लिए सुरेश ने बहुत ही कम उम्र से संगीत की विधिवत शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने गुरु पंडित जियालाल वसंत के सानिध्य में शास्त्रीय संगीत की कठिन बारीकियों को सीखा, जिसने उनकी गायकी को एक ठोस आधार और अनूठी पहचान प्रदान की।
प्रतियोगिता से मिला पहला ब्रेक और बॉलीवुड में पहचान
सुरेश वाडेकर के करियर का पहला बड़ा मोड़ साल 1976 में आया, जब उन्होंने सुर-सिंगार नामक प्रतिष्ठित संगीत प्रतियोगिता में भाग लिया। इस मंच पर उनकी सुरीली और सधी हुई आवाज ने निर्णायक मंडल का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लिया। उस समय के दिग्गजों, संगीतकार रविंद्र जैन और जयदेव ने उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद रविंद्र जैन ने उन्हें राजश्री प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी फिल्म पहेली में पहला गाना गाने का अवसर दिया। वहीं, संगीतकार जयदेव ने उनसे फिल्म गमन का सुप्रसिद्ध गीत सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है गवाया। इस मार्मिक गजल ने सुरेश वाडेकर को रातों-रात हिंदी फिल्म उद्योग में एक स्थापित और गंभीर गायक के रूप में पहचान दिला दी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का साथ और ऋषि कपूर की आवाज बनना
पहला ब्रेक मिलने के बाद सुरेश वाडेकर ने सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ। साल 1981 में महान संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने उन्हें फिल्म क्रोधी में स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाने का मौका दिया। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक सदाबहार नगमे प्रस्तुत किए। फिल्म प्यासा सावन का गीत मेघा रे मेघा रे, फिल्म प्रेम रोग के मशहूर गाने मैं हूं प्रेम रोगी और मेरी किस्मत में तू नहीं शायद, तथा फिल्म सदमा का कालजयी गीत ऐ जिंदगी गले लगा ले आज भी लोगों के पसंदीदा गीतों में शुमार हैं। प्रेम रोग की सफलता के बाद उनकी आवाज अभिनेता ऋषि कपूर के व्यक्तित्व पर बेहद सटीक बैठी, जिसके बाद उन्होंने कपूर खानदान की कई बड़ी फिल्मों में अपनी आवाज दी। इनमें राम तेरी गंगा मैली, हिना और प्रेम ग्रंथ जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल हैं। उन्होंने अपने लंबे करियर में गुलजार, आरडी बर्मन, एआर रहमान, विशाल भारद्वाज और इलैयाराजा जैसे भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया।
क्षेत्रीय भाषाओं में गायन, आजीवासन अकादमी और राष्ट्रीय सम्मान
सुरेश वाडेकर का योगदान केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भक्ति संगीत में अपनी अलग छाप छोड़ी और मराठी, भोजपुरी, कोंकणी जैसी कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा। अपने गायन करियर के बाद के वर्षों में उन्होंने नई पीढ़ी को संगीत की शिक्षा देने का बीड़ा उठाया और आजीवासन म्यूजिक अकादमी की स्थापना करके नवोदित प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करना शुरू किया। संगीत के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। साल 2011 में उन्हें मराठी फिल्म मी सिंधुताई सपकाल के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। साल 2020 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया।


















