हिंदी फिल्म जगत में महानायक के तौर पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर को अपने जीवन का 84वां पड़ाव पूरा कर रहे हैं। कई दशकों के लंबे सफर में उन्होंने भारतीय सिनेमा के पर्दे पर अनगिनत अविस्मरणीय चरित्र गढ़े हैं। साधारण शुरुआत से लेकर लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने के इस सफर में कुछ ऐसी चुनिंदा कृतियां रहीं, जिन्होंने न केवल उनके फिल्मी सफर को नई ऊंचाई दी, बल्कि पूरे बॉलीवुड के मिजाज को ही हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आइए नजर डालते हैं उन 8 बेहद खास फिल्मों पर, जिन्हें हर सिनेप्रेमी को जरूर देखना चाहिए।
जंजीर (1973): एंग्री यंग मैन की शुरुआत
साल 1973 में पर्दे पर उतरी एक्शन क्राइम ड्रामा 'जंजीर' ने अमिताभ बच्चन के पूरे फिल्मी जीवन को एक नया मोड़ दिया था। प्रकाश मेहरा के कुशल निर्देशन में तैयार हुई इस बेहद कामयाब फिल्म में जया बच्चन, प्राण, अजीत खान और बिंदु जैसे मंझे हुए कलाकारों ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं। इसी ऐतिहासिक कृति के माध्यम से हिंदी सिनेमा के दर्शकों को पहली मर्तबा 'एंग्री यंग मैन' का सशक्त चेहरा देखने को मिला। इस बेमिसाल किरदार की बदौलत वह रातों-रात बॉलीवुड की दुनिया में एक बड़े सितारे के रूप में स्थापित हो गए।
दीवार (1975): दो भाइयों की भावनात्मक और वैचारिक जंग
साल 1975 में दर्शकों के सामने आई क्लासिक ड्रामा 'दीवार' ने अभिनेता की न्याय की तलाश वाले विद्रोही तेवर की छवि को और अधिक पुख्ता करने का काम किया। इस कहानी का मुख्य ताना-बाना दो सगे भाइयों के टकराव के इर्द-गिर्द बुना गया था। एक ओर विजय नाम का पात्र जुर्म के अंधेरे रास्तों पर निकल पड़ता है, जिसे अमिताभ बच्चन ने निभाया था, वहीं दूसरी ओर शशि कपूर द्वारा अभिनीत रवि नाम का भाई कानून का पालन करने वाला एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी बनता है। दोनों भाइयों के मध्य पैदा हुआ वैचारिक तनाव और उनके दमदार संवाद आज भी दर्शकों की यादों में पूरी तरह ताजा हैं।
शोले (1975): दोस्ती और एक्शन का मील का पत्थर
साल 1975 में ही रिलीज हुई 'शोले' को भारतीय सिनेमा जगत का एक अविस्मरणीय मील का पत्थर स्वीकार किया जाता है। एक्शन और रोमांच से भरपूर यह कालजयी रचना दो गहरे मित्रों जय और वीरू की दास्तान पेश करती है, जिसमें जय का रोल अमिताभ बच्चन और वीरू का किरदार धर्मेंद्र ने अदा किया था। कहानी में एक रिटायर्ड पुलिस अफसर इलाके के बेहद खतरनाक डाकू गब्बर सिंह को कानून के शिकंजे में कसने के लिए इन दोनों दोस्तों का सहारा लेता है। फिल्म के प्रमुख कलाकार, इसका कर्णप्रिय संगीत और जय तथा वीरू के अटूट दोस्ताना रिश्ते की मिसाल आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
अमर अकबर एंथनी (1977): विविधता और हास्य का संगम
निर्देशक मनमोहन देसाई के मार्गदर्शन में बनी 1977 की मल्टी-स्टारर एक्शन-कॉमेडी 'अमर अकबर एंथनी' दर्शकों के बीच अत्यधिक सराही गई। इसकी पटकथा बचपन के दौर में एक-दूसरे से बिछड़ जाने वाले तीन सगे भाइयों की जिंदगी दर्शाती है, जिनका लालन-पालन अलग-अलग मजहबों यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसाई परिवेश में होता है। फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषि कपूर की मुख्य चौकड़ी नजर आई थी। एंथनी गोंसाल्विस के मनोरंजक किरदार में अमिताभ का हास्य से भरा अंदाज और सटीक कॉमिक टाइमिंग इस प्रस्तुति को जबरदस्त सफलता दिलाने में निर्णायक साबित हुई।
डॉन (1978): दोहरे किरदार का रहस्य और रोमांच
साल 1978 में प्रदर्शित हुई सस्पेंस और रोमांच से भरी 'डॉन' को अभिनेता के पूरे सफर की सबसे यादगार और बेहतरीन कृतियों में गिना जाता है। इस सस्पेंस-थ्रिलर में उन्होंने दोहरे रोल को पर्दे पर बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर का शातिर अपराधी 'डॉन' था, तो दूसरी तरफ बनारस की पृष्ठभूमि से आने वाला उसका भोला-भाला हमशक्ल 'विजय'। इस फिल्म में शामिल रहस्य, सम्मोहक बैकग्राउंड म्यूजिक और 'खईके पान बनारस वाला' गाने पर किया गया उनका ऊर्जावान नृत्य दर्शकों के बीच आज भी उतना ही लोकप्रिय है।
कुली (1983): जीवन-मृत्यु के संघर्ष की गवाह बनी दास्तान
निर्देशक मनमोहन देसाई के साथ साल 1983 में आई फिल्म 'कुली' में उन्होंने रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सामान उठाने वाले इकबाल नाम के कुली का बेहद मार्मिक चरित्र निभाया था। पूरी पटकथा इकबाल और उसकी मां, जिसे वहीदा रहमान ने अभिनीत किया था, के बिछोह और मिलन के भावनात्मक दर्द के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। यह फिल्म न केवल अपनी संवेदनशील कहानी और सुरीले गीतों के लिए पहचानी जाती है, बल्कि शूटिंग के सेट पर घटी उस भयानक दुर्घटना के लिए भी इतिहास में दर्ज है, जिसमें अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से घायल होकर मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकले थे।
शहंशाह (1988): सियासत के बाद पर्दे पर तूफानी वापसी
सियासी गलियारों में 3 साल का समय बिताने के बाद अमिताभ बच्चन ने साल 1988 में 'शहंशाह' के जरिए सिनेमा के बड़े पर्दे पर एक बेहद जोरदार वापसी की थी। टीनू आनंद के निर्देशन में तैयार की गई इस एक्शन-ड्रामा फिल्म में उन्होंने दोहरी जिंदगी जीने वाले शख्स का किरदार निभाया, जो दिन के उजाले में एक भ्रष्ट पुलिसकर्मी दिखता है और अंधेरी रात में अपराध का सफाया करने वाला 'शहंशाह' बन जाता है। इस फिल्म का संवाद 'रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं' आज भी लोगों की जुबान पर अक्सर सुनाई देता है।
बागबान (2023): बुढ़ापे के दर्द और रिश्तों का आईना
रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी पारिवारिक भावनाओं से ओतप्रोत फिल्म 'बागबान' में अमिताभ बच्चन के साथ हेमा मालिनी मुख्य भूमिका में नजर आई थीं। यह भावनात्मक कहानी राज और पूजा नाम के एक बुजुर्ग जोड़े की व्यथा को दर्शाती है, जो पिछले 40 सालों से एक-दूसरे के साथ सुख-दुख साझा करते रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी ही औलादें उन्हें अलग रहने के लिए लाचार कर देती हैं। फिल्म के भीतर अमिताभ और हेमा मालिनी की स्वाभाविक अदाकारी और आपसी केमिस्ट्री को दर्शकों ने बेहद सराहा था, जो 2023 में रिलीज हुई थी।



















