भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर को आकार देने वाले महान फिल्मकार महबूब खान की जीवन यात्रा किसी मुकम्मल फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। मुंबई के एक अस्तबल में घोड़ों की नाल ठोकने से लेकर भारत की पहली फिल्म को ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचाने वाला उनका यह सफर कड़ी मेहनत, अटूट लगन और बेखौफ जुनून की एक दुर्लभ मिसाल प्रस्तुत करता है। 1957 में रिलीज हुई क्लासिक फिल्म 'मदर इंडिया' के माध्यम से वैश्विक पटल पर हिंदी सिनेमा को नई पहचान दिलाने वाले इस महान निर्देशक ने अपनी कला के जरिए भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं, ग्रामीण जीवन के संघर्षों और महिला सशक्तिकरण को अभूतपूर्व गहराई के साथ पर्दे पर जीवंत किया।
अस्तबल के कठिन परिश्रम से साइलेंट फिल्मों के दौर तक
महबूब खान का मन बचपन से ही अभिनय और रूपहले पर्दे की दुनिया में रमता था। अपने इस सपने को पूरा करने की चाह में वह बेहद कम उम्र में ही गुजरात से मुंबई आ पहुंचे थे। हालांकि, मायानगरी में उनका शुरुआती दौर मुश्किलों और अनिश्चितता से भरा हुआ था। मुंबई में उनकी मुलाकात नूर मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति से हुई, जो उस समय विभिन्न फिल्म शूटिंगों के लिए घोड़ों की व्यवस्था किया करते थे। नूर मोहम्मद ने महबूब खान की स्थिति को देखते हुए उन्हें अपने अस्तबल में घोड़ों की नाल ठोकने का काम सौंप दिया। दिन-रात घोड़ों के बीच पसीना बहाने और कठिन शारीरिक श्रम करने के बावजूद महबूब खान के भीतर का कलाकार कभी कमजोर नहीं पड़ा।
सिनेमा की दुनिया में जाने का अवसर तब आया जब वह एक दिन फिल्म शूटिंग स्थल पर पहुंचे और वहां मौजूद लोगों के सामने काम करने की अपनी तीव्र इच्छा व्यक्त की। उनकी लगन और समर्पण से प्रभावित होकर स्टूडियो के लोगों ने उन्हें छोटे-मोटे शुरुआती काम सौंपे। इसके बाद उन्होंने साइलेंट फिल्मों के दौर में एक एक्स्ट्रा कलाकार और सहायक के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। कैमरे के सामने छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाते हुए उन्होंने बेहद सूक्ष्मता से कैमरे के पीछे की तकनीकी बारीकियों, प्रकाश व्यवस्था और दृश्य निर्माण की कला को समझना शुरू कर दिया।
निर्देशक के रूप में पदार्पण और सामाजिक सिनेमा की स्थापना
फिल्म निर्माण की जटिल प्रक्रिया को गहराई से समझने के बाद महबूब खान का रुझान निर्देशन की ओर बढ़ा। वर्ष 1935 में उन्हें फिल्म 'अल हिलाल' के जरिए स्वतंत्र निर्देशक के रूप में अपना पहला बड़ा ब्रेक मिला। इस पहली ही फिल्म से उन्होंने अपनी रचनात्मक क्षमता का लोहा मनवाया और इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आने वाले वर्षों में उन्होंने 'दक्कन क्वीन', 'एक ही रास्ता', 'अलीबाबा', 'औरत' और 'बहन' जैसी कई प्रभावशाली फिल्मों का निर्माण किया।
महबूब खान की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे महज मनोरंजन तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने अपनी कहानियों के केंद्र में आम आदमी के जीवन, ग्रामीण भारत की गरीबी, पारिवारिक रिश्तों की पेचीदगियों और सामाजिक समस्याओं को रखा। विशेष रूप से, उस दौर में जब महिलाओं के किरदारों को प्रायः हाशिये पर रखा जाता था, महबूब खान ने अपनी फिल्मों में महिला पात्रों को बेहद मजबूत, स्वाभिमानी और केंद्रीय भूमिकाओं में प्रस्तुत किया। वर्ष 1940 में बनी फिल्म 'औरत' उनके करियर की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई, जिसने आगे चलकर एक ऐतिहासिक बदलाव का आधार तैयार किया।
'मदर इंडिया' का निर्माण और ऑस्कर में रचा गया इतिहास
वर्ष 1940 में प्रदर्शित फिल्म 'औरत' की कहानी महबूब खान के मन में गहराई तक बसी हुई थी। लगभग 17 साल बाद, उन्होंने इसी विषयवस्तु को एक भव्य और विशाल पैमाने पर दोबारा पर्दे पर उतारने का साहसिक फैसला लिया। वर्ष 1957 में यह परिकल्पना 'मदर इंडिया' के रूप में बनकर तैयार हुई। इस महाकाव्यात्मक फिल्म को बनाने के लिए उन्होंने भारी आर्थिक जोखिम उठाया और निर्माण के दौरान वे गहरे कर्ज में डूब गए थे।
फिल्म 'मदर इंडिया' में महान अभिनेत्री नरगिस ने 'राधा' के अमर किरदार को निभाया, जबकि उनके साथ सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार जैसे दिग्गज कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं अदा कीं। जब इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाई और सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में ऑस्कर नामांकन हासिल किया, तब महबूब खान के पास अमेरिका जाकर फिल्म के भव्य प्रचार-प्रसार के लिए पर्याप्त धनराशि तक उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद, यह फिल्म ऑस्कर पुरस्कार जीतने से महज एक वोट के बेहद मामूली अंतर से चूकी। हालांकि ऑस्कर की ट्रॉफी हाथ में न आने के बावजूद 'मदर इंडिया' ने वैश्विक मंच पर भारतीय सिनेमा का मस्तक हमेशा के लिए ऊंचा कर दिया। इस फिल्म ने फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित कई शीर्ष पुरस्कार अपने नाम किए।
महबूब स्टूडियो की स्थापना, 'इंडियाज डीमिल' का सम्मान और अंतिम अध्याय
'मदर इंडिया' की ऐतिहासिक सफलता से पहले भी महबूब खान 'अंदाज़', 'आन' और 'अमर' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के माध्यम से खुद को देश के शीर्ष फिल्मकारों में स्थापित कर चुके थे। सिनेमाई तकनीक और भव्य दृश्यों के उनके अनूठे प्रयोगों की वजह से उनकी तुलना हॉलीवुड के सुप्रसिद्ध निर्देशक सेसिल बी. डीमील से की जाती थी। यही कारण था कि उनकी आधिकारिक जीवनी का शीर्षक भी 'महबूब: इंडियाज डीमिल' रखा गया था।
1940 के दशक में उन्होंने अपने स्वतंत्र प्रोडक्शन बैनर 'महबूब प्रोडक्शंस' की शुरुआत की थी। इसके बाद, वर्ष 1954 में उन्होंने मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा में प्रतिष्ठित 'महबूब स्टूडियो' की नींव रखी, जो आज भी भारतीय फिल्म उद्योग का एक ऐतिहासिक लैंडमार्क बना हुआ है। भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1963 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से अलंकृत किया। हालांकि, 'मदर इंडिया' जैसी सर्वकालिक सफलता के बाद उनकी बाद की फिल्में वैसी व्यावसायिक ऊंचाई हासिल नहीं कर सकीं। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म वर्ष 1962 में आई 'सन ऑफ इंडिया' थी। इसके दो वर्ष बाद, 28 मई 1964 को मात्र 56 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से इस महान सिनेमाई विजनरी का दुखद निधन हो गया।


















