भारतीय कानूनी इतिहास में वर्ष 1959 का के.एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य मामला एक ऐसा मोड़ साबित हुआ, जिसने न केवल न्याय प्रणाली को हिलाकर रख दिया बल्कि आम जनता और मीडिया का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया। भारतीय नौसेना के कमांडर कावस मानेकशॉ नानावती पर अपनी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या का आरोप लगा था। इस सनसनीखेज आपराधिक मामले ने जाने-माने अधिवक्ता राम जेठमलानी को भी देश भर में प्रसिद्ध बना दिया था। नानावती की अपनी वर्दी और देश सेवा के प्रति निष्ठा के कारण उन्हें जनसामान्य का भारी समर्थन हासिल हुआ। इस पूरे घटनाक्रम और इसके सामाजिक असर ने हिंदी सिनेमा जगत के निर्देशकों तथा कलाकारों को इतना गहराई से प्रभावित किया कि अगले 53 सालों के दौरान इस एक ही घटनाक्रम पर तीन अलग-अलग दौर में तीन बेहतरीन फिल्में रची गईं।
1959 का अदालती मामला और राज्यपाल द्वारा मिली राहत
कमांडर नानावती पर लगे हत्या के गंभीर आरोपों के बावजूद लोगों के बीच उनका सम्मान कम नहीं हुआ था। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के तहत सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने इस घटना को पूरी तरह सुनियोजित हत्या मानते हुए नानावती को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामले में एक नया मोड़ तब आया जब महाराष्ट्र की तत्कालीन राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित ने, जो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं, नानावती की सजा माफ कर दी। मीडिया की जबरदस्त कवरेज और जनता की असीम दिलचस्पी के कारण यह मामला भारतीय समाज की चेतना में लंबे समय तक जीवित रहा, जिसने बाद में भारतीय फिल्म निर्माताओं के लिए एक बेहतरीन पटकथा का काम किया।
1963 में 'ये रास्ते हैं प्यार के' के साथ पहला सिनेमाई प्रयास
इस ऐतिहासिक आपराधिक मामले पर सबसे पहली फिल्म वर्ष 1963 में पर्दे पर आई, जिसका नाम 'ये रास्ते हैं प्यार के' था। निर्देशक आर.के. नाय्यर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नानावती से प्रेरित मुख्य पात्र अनिल सहानी की भूमिका प्रसिद्ध अभिनेता सुनील दत्त ने निभाई थी। फिल्म में सुनील दत्त के साथ अभिनेत्री लीला नायडू और दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार भी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। 1959 की वास्तविक घटना के महज चार साल बाद रिलीज हुई इस फिल्म ने इस संवेदनशील विषय को बड़े पर्दे पर उतारने की पहली साहसिक कोशिश की थी।
1973 में गुलजार का अनोखा प्रयोग और बिना गानों की फिल्म 'अचानक'
नानावती केस पर आधारित दूसरा बड़ा सिनेमाई प्रयास वर्ष 1973 में देखने को मिला, जब प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने निर्देशन की कमान संभाली। गुलजार ने इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए एक बड़ा लीक से हटकर प्रयोग किया। स्वयं एक शीर्ष गीतकार होने के बावजूद उन्होंने 'अचानक' नाम की इस फिल्म में एक भी गाना शामिल नहीं किया। फिल्म में विनोद खन्ना ने मुख्य भूमिका निभाई, जबकि ओम शिवपुरी, लिली चक्रवर्ती, फरीदा जलाल और असरानी जैसे कलाकारों ने महत्वपूर्ण किरदार अदा किए। फिल्म का बैकग्राउंड संगीत वसंत देसाई ने तैयार किया था। के.ए. अब्बास द्वारा लिखित इस कहानी और गुलजार के बेहतरीन निर्देशन के लिए फिल्म को फिल्मफेयर पुरस्कारों में नामांकित भी किया गया था। यह फिल्म केवल वैवाहिक बेवफाई तक सीमित न रहकर उससे कहीं अधिक गहरे सामाजिक संदेश को रेखांकित करती थी। इसी प्रयोग की तर्ज पर इन दिनों गुलजार की बेटी मेघना गुलजार फिल्म 'दायरा' लेकर आ रही हैं, जिसमें करीना कपूर और पृथ्वीराज काम कर रहे हैं और कहा जा रहा है कि उसमें भी बीच में कोई गाना नहीं होगा, केवल अंत में एक ट्रैक रखा जाएगा।
2016 में अक्षय कुमार की 'रुस्तम' और राष्ट्रीय पुरस्कार की सफलता
नानावती मामले से प्रेरित तीसरा और सबसे सफल रूपांतरण वर्ष 2016 में आई फिल्म 'रुस्तम' के रूप में सामने आया। टीनू सुरेश देसाई के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार ने नौसेना अधिकारी की मुख्य भूमिका निभाई। इस किरदार में उनके प्रभावी अभिनय के लिए अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। फिल्म में इलियाना डीक्रूज ने अक्षय की पत्नी का किरदार निभाया, जबकि ईशा गुप्ता, पवन मल्होत्रा, कुमुद मिश्रा, परमीत सेठी और बिजेंद्र काला जैसे कलाकारों ने अहम भूमिकाएं निभाईं। बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई इस फिल्म के संगीत को भी बहुत पसंद किया गया। मनोज मुंतशिर द्वारा लिखे गए और आतिफ असलम, अंकित तिवारी, अरिजीत सिंह तथा पलक मुच्छल की आवाज में सजे 'तेरे संग यारा', 'देखा हजारों दफा' और 'ढल जाऊं मैं' जैसे गाने आज भी लोगों की जुबां पर हैं।



















