बॉलीवुड में कई दशकों तक अपनी धुनों का जादू बिखेरने वाले संगीतकार अनु मलिक की संगीत यात्रा बेहद कम उम्र में शुरू हो गई थी। 2 नवंबर 1960 को जन्मे अनु मलिक ऐसे घराने से ताल्लुक रखते हैं जहां संगीत सांसों में बसा था। उनके पिता सरदार मलिक जाने-माने संगीत निर्देशक थे, जबकि विख्यात गीतकार हसरत जयपुरी उनके सगे मामा थे। घर के इसी रचनात्मक वातावरण और विशेष रूप से शंकर-जयकिशन के गानों ने उनके बालमन पर अमिट छाप छोड़ी थी। अपने पारिवारिक परिवेश को याद करते हुए उन्होंने कहा था कि सरदार मलिक का बेटा और हसरत जयपुरी का भांजा होना उनके लिए सौभाग्य की बात रही।
पिता की परीक्षा और धुनों का अनूठा सफर
बचपन में जब उन्होंने पहली बार एक मराठी कविता को स्वरबद्ध किया और पिता को सुनाया, तो सरदार मलिक अपने बेटे की प्रतिभा देखकर दंग रह गए। पिता ने उनकी क्षमता को परखने के लिए एक कड़ा इम्तिहान लेने का फैसला किया। उन्होंने बालक के सामने कई अलग-अलग प्रकार के गीत रखे और उन सभी की स्वतंत्र धुनें तैयार करने की चुनौती दी। अनु मलिक ने बिना रुके एक के बाद एक कई आकर्षक धुनें रच डालीं। बेटे की इस असाधारण कुशलता से गदगद होकर पिता ने उन्हें गले लगा लिया। इसके तुरंत बाद जब उन्होंने मामा हसरत जयपुरी के एक गीत को कंपोज किया, तो सुनने वाले उनकी धुन के कायल हो गए।
16 की उम्र में हंटरवाली 77 और पहला रिकॉर्डेड गाना
अनु मलिक को पेशेवर संगीत निर्देशन की दुनिया में पहला बड़ा ब्रेक केवल 16-17 साल की उम्र में मिल गया था। मशहूर हास्य कलाकार मोहन चोटी ने वर्ष 1978 में फिल्म हंटरवाली 77 बनाई थी। इस फिल्म में मूल रूप से सरदार मलिक को संगीत देना था, लेकिन परिस्थितिवश यह जिम्मेदारी युवा अनु मलिक के कंधों पर आ गई। इस तरह किशोर अवस्था में ही वे पूर्णकालिक कंपोजर बन गए।
इसी पहली फिल्म में हसरत जयपुरी का लिखा एक गीत शामिल था, जिसके बोल थे कि जुल्मों सितम पर इतराने वाले मिट जाएंगे और एक दिन अपना जमाना भी आएगा। इस पहले ही गाने को दिग्गज गायिका आशा भोसले ने अपने सुरों से सजाया। दिग्गज पार्श्वगायिका का साथ मिलने से युवा संगीतकार का हौसला कई गुना बढ़ गया। इसके बाद एफसी मेहरा की फिल्म एक जान हैं हम और फिर सोहनी महिवाल ने उनके पैर फिल्म जगत में मजबूती से जमा दिए।
बाजीगर से बॉर्डर तक मिली ऐतिहासिक कामयाबी
शुरुआती दौर के बाद नब्बे का दशक अनु मलिक के करियर का स्वर्णिम काल साबित हुआ। फिल्म बाजीगर के गानों ने उन्हें इंडस्ट्री के शीर्ष संगीतकारों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। इस फिल्म की अपार सफलता के बाद देशभक्ति पर आधारित फिल्म बॉर्डर के सभी गीतों ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान रचे। इसके बाद आई फिल्म रिफ्यूजी के संवेदनशील संगीत के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सांगीतिक प्रेरणा और प्लेगरिज्म के आरोपों पर रुख
सफलता के शिखर पर पहुंचने के साथ ही उनके करियर से विवाद भी जुड़े। उन पर कई दफा भारतीय और विदेशी धुनों से समानता रखने या उन्हें चुराने के आरोप लगे। वर्ष 2017 में टीवी कार्यक्रम एंटरटेनमेंट की रात के मंच पर रोडीज फेम रघु राम ने उनसे सीधे तौर पर संगीत चोरी से जुड़ा सवाल पूछ लिया था। इस तीखे सवाल का सामना करते हुए संगीतकार ने सफाई दी थी कि ईश्वर के अलावा कोई भी पूरी तरह मौलिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी काम से प्रेरणा हासिल करना और चोरी करना दो अलग बातें हैं। अपने बचाव में उन्होंने बॉर्डर, एलओसी कारगिल और मैं हूं ना जैसी फिल्मों के काम का हवाला देते हुए बताया था कि उनके कई प्रोजेक्ट्स पूरी तरह उनकी अपनी मेहनत और रचनात्मकता का परिणाम हैं।



















