हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी शीर्ष अभिनेत्रियों का जिक्र होता है, जया बच्चन का नाम सबसे आगे आता है। अपनी स्वाभाविक और प्रभावशाली अदाकारी के दम पर उन्होंने सत्तर के दशक में जबरदस्त शोहरत हासिल की थी। उस दौर में जब कई बड़ी अभिनेत्रियां नए कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा करने से झिझक रही थीं, तब उन्होंने संघर्ष के दौर से गुजर रहे अमिताभ बच्चन के साथ काम करना चुना। दोनों ने 1973 में शादी की, लेकिन विवाह के बाद जया ने अपने चमकते फिल्मी सफर को धीमा करते हुए लगभग 17 साल का लंबा अवकाश ले लिया।
चैट शो में किया था व्यक्तिगत कारणों का खुलासा
साल 2007 में करण जौहर के लोकप्रिय कार्यक्रम कॉफी विद करण के दूसरे सीजन में शामिल होकर जया बच्चन ने अपने इस महत्वपूर्ण निर्णय के बारे में विस्तार से बताया था। कार्यक्रम के दौरान जब उनसे पूछा गया कि कामयाबी के शिखर पर रहते हुए उन्होंने सिनेमा से दूरी क्यों बनाई, तो उन्होंने वैवाहिक जीवन की प्राथमिकताओं का उल्लेख किया। उन्होंने साझा किया कि अमिताभ बच्चन की स्पष्ट राय थी कि वह ऐसी जीवनसाथी नहीं चाहते जो सामान्य दफ्तर की तरह सुबह 9 से शाम 5 बजे तक व्यस्त दिनचर्या में फंसी रहे। वैवाहिक बंधन में बंधने के पश्चात अमिताभ के पास प्रोजेक्ट्स की भरमार हो गई और उनका अधिकांश समय काम में बीतने लगा।
इस स्थिति को देखते हुए जया को अहसास हुआ कि संतान के समुचित पालन-पोषण के लिए माता-पिता में से किसी एक की नियमित उपस्थिति घर पर अत्यंत आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पेशेवर सफलताओं की तुलना में घरेलू जिम्मेदारियों को आगे रखने का दृढ़ संकल्प लिया।
बेटी श्वेता के शब्दों ने बदल दिया था नजरिया
इस बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी बेटी श्वेता से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील प्रसंग भी साझा किया। जया जब एक दिन शूटिंग के सिलसिले में जाने की तैयारी में थीं, तब नन्हीं श्वेता ने उनसे पूछा कि वह कहां जा रही हैं। बच्ची ने उनसे आग्रह किया कि वह घर छोड़कर न जाएं और काम पर सिर्फ पापा को जाने दें। अपनी बेटी की यह मासूम बात सुनकर जया भीतर तक भावुक हो गई थीं। बच्चों के साथ वक्त गुजारने और उनकी हर जरूरत का ध्यान खुद रखने की इस तीव्र भावना ने भी उन्हें फिल्मों से लंबे समय तक अलग रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
शानदार शुरुआत और यादगार किरदारों का सफर
जया बच्चन ने बतौर मुख्य अभिनेत्री अपने सफर का आगाज 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म गुड्डी से किया था। इस कथा में उन्होंने एक ऐसी चंचल छात्रा का किरदार निभाया था, जो लोकप्रिय सितारे धर्मेंद्र की बहुत बड़ी प्रशंसक होती है। धर्मेंद्र ने इस कहानी में स्वयं का ही किरदार निभाया था। अपनी पहली ही पेशकश से दर्शकों का दिल जीतने वाली जया ने इसके बाद कई ऐसी फिल्में दीं जो भारतीय सिनेमा की धरोहर बन गईं।
उसी वर्ष रिलीज हुई उपहार (1971) के बाद उन्होंने कोशिश (1972), जंजीर (1973), अभिमान (1973) और कोरा कागज (1974) जैसी कृतियों में असाधारण कला का प्रदर्शन किया। इसके बाद चुपके चुपके (1975), मिली (1975), शोले (1975) और सिलसिला (1981) के जरिए उन्होंने साबित किया कि वह हर तरह के किरदारों को जीवंत करने में माहिर हैं। इन सभी भूमिकाओं ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे सम्मानीय कलाकारों की पंक्ति में स्थापित कर दिया।
सत्रह साल का लंबा अंतराल और फिर शानदार वापसी
वर्ष 1973 में परिणय सूत्र में बंधने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे नई फिल्मों के प्रस्ताव स्वीकार करना बंद कर दिया। अगले करीब 17 वर्षों तक वह कैमरे की रोशनी से पूरी तरह दूर रहीं और अपनी संपूर्ण ऊर्जा घर-परिवार को संवारने में लगाई। उल्लेखनीय बात यह रही कि इतने लंबे समय तक पर्दे से गायब रहने के बावजूद उनकी लोकप्रियता और दर्शकों के स्नेह में कोई कमी नहीं आई।
सिनेमा प्रेमियों का यह लंबा इंतजार तब समाप्त हुआ जब 1998 में गोविंद निहलानी की चर्चित फिल्म हजार चौरासी की मां के जरिए उन्होंने अभिनय जगत में फिर से कदम रखा। इस प्रस्तुति में उनके गंभीर और सधे हुए अभिनय की समीक्षकों ने जमकर प्रशंसा की। इस वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया कि कला की गहराई समय के अंतराल से कभी फीकी नहीं पड़ती। उनका यह सफर दर्शाता है कि उन्होंने जीवन के हर पड़ाव पर अपनी प्राथमिकताओं का चयन पूरी ईमानदारी के साथ किया और बाद के वर्षों में भी कई उम्दा प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।



















