देश के सबसे विशाल आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीतिक गोटियां बिछाई जाने लगी हैं। चार सौ तीन विधानसभा सीटों वाले इस सियासी मैदान में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे, कानून व्यवस्था और विकास योजनाओं के बूते दोबारा वापसी की तैयारी में जुटी है, वहीं मुख्य विपक्षी खेमा अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधने में व्यस्त है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए फार्मूले के सहारे मैदान तैयार कर रहे हैं। कांग्रेस अपने सहयोगी दल के साथ साझेदारी को और पुख्ता करने की जुगत में है, जबकि बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती अपने पारंपरिक आधार को दोबारा समेटने की जद्दोजहद कर रही हैं। इसी राजनीतिक हलचल के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की तेज होती सक्रियता ने चुनावी मुकाबले को और अधिक पेचीदा बना दिया है।
असदुद्दीन ओवैसी का रुख केवल सत्ताधारी भाजपा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे उन विपक्षी दलों के परंपरागत वोट आधार में भी सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं जो मुस्लिम समाज के समर्थन को अपना स्वाभाविक अधिकार मानते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी लंबे अरसे से इस वर्ग की पहली पसंद के रूप में अपनी मजबूत दावेदारी पेश करती आई है। ओवैसी इसी स्थापित सियासी समीकरण को सीधे चुनौती देकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक दखल को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। हैदराबाद से निकलकर उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में दखल देने की उनकी यह पहल अखिलेश यादव, राहुल गांधी और मायावती जैसे दिग्गजों के लिए नई रणनीतिक चिंताएं खड़ी कर रही है।
अयोध्या के घटनाक्रम से गरमाया सियासी माहौल
चुनावी संग्राम की पृष्ठभूमि में अयोध्या अचानक राजनीतिक बयानों और प्रतीकों के केंद्र में आ गया है। इस पूरे सियासी विवाद की शुरुआत 8 अक्टूबर को हुई, जब समाजवादी पार्टी के विधायक पवन पांडे द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा कार्यक्रम में शामिल होने अखिलेश यादव अयोध्या पहुंचे थे। कथा के मंच से सपा प्रमुख ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की बात कह दी। इस बयान के सामने आते ही राज्य का सियासी तापमान अचानक बढ़ गया और दोनों दलों के बीच सीधी जुबानी जंग शुरू हो गई। राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा होने लगी कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रुख के बाद अखिलेश यादव खुद उनके सामने चुनावी मैदान में उतरने का साहस दिखाएंगे।
हालांकि, इस बयानबाजी के कुछ ही समय बाद सपा प्रमुख के रुख में बदलाव देखने को मिला। अयोध्या का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद जब अखिलेश यादव बलिया पहुंचे, तो उन्होंने अपने पिछले वक्तव्य को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी तरफ से कोई खुली चुनौती नहीं दी गई थी, बल्कि वह केवल मुख्यमंत्री को दी गई एक सामान्य सलाह मात्र थी। बयानों के इस फेरबदल के बाद यह बात साफ हो गई कि वर्ष 2027 के महासमर में अयोध्या के भीतर दोनों शीर्ष नेताओं के बीच सीधे चुनावी मुकाबले की फिलहाल कोई सीधी संभावना नजर नहीं आ रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने अयोध्या को राज्य की मुख्य चुनावी बहस के केंद्र में जरूर ला पटका।
प्रतीकों की सियासत और बयानों पर घमासान
अखिलेश यादव का अयोध्या दौरा केवल उनके चुनावी बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कार्यक्रम के दौरान सामने आई उनकी तस्वीरों और वीडियो ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। श्रीमद्भागवत कथा के धार्मिक मंच पर उपस्थित सपा प्रमुख के हाथों में भगवान शिव का त्रिशूल और भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र देखा गया। संतों और धर्माचार्यों की उपस्थिति में शंख ध्वनि के बीच पीतांबरी वस्त्र ओढ़े त्रिशूल और डमरू थामे उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुईं। इसके अतिरिक्त एक अन्य वीडियो में वे मंच पर गदा थामे हुए भी दिखाई दिए, जिसे लेकर राजनीतिक टीकाकारों और प्रतिद्वंद्वी दलों ने तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं।
अपने इस धार्मिक स्वरूप के साथ अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच X पर एक काव्य रचना भी साझा की। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने लिखा कि जब सत्ता का अत्याचार वंचितों पर भारी पड़ने लगे और युवाओं तथा महिलाओं के अधिकारों पर संकट आए, तब त्रिशूल उठाने और सुदर्शन चक्र धारण करने की आवश्यकता होती है। प्रतीकों के इस प्रदर्शन के बीच भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि अयोध्या की धरती पर मौजूद होने के उपरांत भी सपा प्रमुख राम मंदिर जाकर रामलला के दर्शन करने नहीं पहुंचे। इस आलोचना के जवाब में अखिलेश यादव ने भगवान राम और भगवान कृष्ण की एकात्मता का तर्क पेश करते हुए कहा कि दोनों स्वरूप उनके लिए एक समान हैं और उनमें कोई भेद नहीं है। उनके इस रुख को विश्लेषक बहुसंख्यक मतदाताओं को साधे रखने और साथ ही अपनी पुरानी धर्मनिरपेक्ष छवि को संतुलित करने की कवायद के रूप में देख रहे हैं।
भाजपा की चुनावी ताकत और योगी आदित्यनाथ का ट्रैक रिकॉर्ड
विपक्षी दलों की इन तमाम रणनीतियों के सामने भारतीय जनता पार्टी अपनी प्रशासनिक उपलब्धियों और नेतृत्व की स्थिरता को सबसे बड़ा हथियार मान रही है। वर्ष 2017 में सत्ता की बागडोर संभालने वाले योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में अपनी सत्ता बरकरार रखी। वे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में ऐसे पहले मुख्यमंत्री बने जिन्होंने अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के तुरंत बाद दोबारा सत्ता में वापसी की। वर्ष 2022 के चुनाव परिणामों में भाजपा नीत गठबंधन ने राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 273 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी।
इन नतीजों में अकेले भाजपा ने 255 सीटों पर विजय दर्ज की थी और पार्टी को कुल 41 प्रतिशत के आसपास मजबूत मत प्रतिशत प्राप्त हुआ था। वर्तमान में सत्ताधारी दल योगी सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून एवं व्यवस्था की स्थिति में आए सुधार, प्रशासनिक कठोरता और जनकल्याणकारी विकास परियोजनाओं को जनता के बीच प्रमुखता से रख रहा है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि इस बार के चुनाव में सत्ता पक्ष पहले से भी अधिक प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटेगा। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती योगी आदित्यनाथ के इसी मजबूत राजनीतिक प्रभाव का कोई ठोस तोड़ तलाशने की बनी हुई है।
सपा का पीडीए दांव और ओवैसी के सामने की चुनौतियां
भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व और सुशासन के मॉडल का मुकाबला करने के लिए समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण पर पूरा भरोसा जता रही है। वर्ष 2024 के लोकसभा आम चुनाव में यह फार्मूला पार्टी के लिए काफी प्रभावी साबित हुआ था। उस चुनाव में उत्तर प्रदेश की कुल 80 संसदीय सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर परचम लहराया था, जबकि उसकी सहयोगी कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी। यह परिणाम लोकसभा चुनावों के इतिहास में सपा के अब तक के सबसे उम्दा राजनीतिक प्रदर्शनों में गिना जाता है।
इसी चुनावी सफलता के आधार पर अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ अपनी मौजूदा राजनीतिक साझेदारी को भविष्य में भी बनाए रखने के पक्षधर हैं। 2 अक्टूबर को राजधानी लखनऊ में जब उनसे एआईएमआईएम के साथ किसी संभावित तालमेल के विषय में पूछा गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि जो गठबंधन पहले से मौजूद है, वही आगे भी जारी रहेगा। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को गठबंधन में कोई स्थान न मिलने के बाद यह तय हो गया है कि वे अपने दम पर अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में अपने प्रत्याशी उतारेंगे। यदि ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से को भी अपने पाले में खींचने में सफल रहते हैं, तो इसका सीधा प्रभाव समाजवादी पार्टी के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है, जिससे राज्य का आगामी चुनावी दंगल बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है।






















